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आने वाले साल को सलाम...

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आज फिर से नए साल का आगाज़ हुआ।अनवरत चलते समय के प्रवाह में एक वर्ष और जुड़ गया। वैश्विक रूप से इसी नए साल को मान्यता प्राप्त है।वैसे अलग-अलग धर्मों और जातियों में भी अपने-अपने नववर्ष को मनाने का चलन है।हमारे भारतीय पंचांग के अनुसार नववर्ष का आरंभ चैत्र महिने से होता है।उस समय को भी हम उत्सव के रूप में मनाते हैं।  खैर,हम इस मुद्दे से अलग हटते हैं और बात करते हैं बाहें पसारे खड़े नववर्ष के स्वागत की।हर नया साल उम्मीदों की एक बड़ी झोली लेकर आता है।ऐसा लगता है कि हमारे मानस में पैठी तमाम इच्छाओं की पूर्ति नए साल में जरूर हो जाएगी।हर साल का बदलता कैलेंडर मन में उम्मीद की एक लौ जरूर जलाती है।लेकिन साल पूरा होते-होते आधे-अधूरे सपनों के साथ ही साल बीत जाता है।हम हर पर्व में संकल्प लेते हैं।अपने भीतर की फलां बुराई को दूर करुंगा,समय की कद्र करूंगा,रिश्तों को सम्मान दूंगा आदि-आदि इत्यादि।लेकिन कुछ महीनों के बाद वही ढाक के तीन पात।     हम अपने संकल्पों पर अडिग नहीं रह पाते।जीवन में आनेवाले समय का उतार-चढ़ाव हमें या तो अपने संकल्पों को भूलने के लिए बाध्य कर देते हैं या हम स्वमेव ...