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छुरा दशहरा की यादें

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  मेरे पिछले ब्लॉग को बहुत से पाठकों ने पसंद किया। क्रिकेट आयोजन की पुरानी यादों ने सबको अतीत के गलियारों में फिर से घूमा दिया।आज ऐसी ही एक और यादगार आयोजन की स्मृति ताजा करने की कोशिश कर रहा हूं।छुरा दशहरे की यादें...  छत्तीसगढ़ में बस्तर दशहरे के बाद फिंगेश्वर और खरियार रोड की दशहरे को भव्य माना जाता है।संयोग से मैं अभी तक तीनों दशहरा आयोजन में शामिल नहीं हुआ हूं। मेरे स्मृति पटल में निज ग्राम के बाद सिर्फ छुरा दशहरे की छवि अंकित है।छुरा दशहरा भी एक जमाने में बहुत बढ़िया हुआ करता था।वैसे तो छुरा राजघराने द्वारा रावण की सीमेंट की मूर्ति बहुत पहले से बनाई जा चुकी थी लेकिन उन दिनों उस मूर्ति के पास रावण वध नहीं किया जाता था। दशहरे के दिन रावण का विशाल पुतला वर्तमान थाने की दीवाल से सटे हुए जगह पर बस स्टैंड के पास बनाया जाता था। वहीं रावण दहन होता था।अभी की स्थिति में उस जगह पर नगर पंचायत का काम्प्लेक्स खड़ा है। रात को खाने के बाद दादाजी के कंधे पर बैठकर दादी के साथ दशहरा देखने जाया करता था।छुरा में दशहरा विजयादशमी के दिन नहीं बल्कि एक दो दिन बाद होता था।कारण क्या था? मुझे नहीं ...

विजय क्रिकेट क्लब छुरा

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 ये मेरा 100 वां ब्लॉग है।कुल जमा 8 वर्ष खप गए शतक पूरा करने में।इन बीते 8 सालों में मैंने बहुत कुछ गंवाया है।कुछ उपलब्धियां भी हासिल हुई लेकिन जिन अनमोल निधियों को मैंने गंवाया है उसकी भरपाई दुनिया की कोई चीज पूरी नहीं कर सकती। ब्लॉग लिखने का शौक था बस वही पूरा कर रहा हूं।इस दौरान जमाना काफी बदल चुका है। पढ़ने का दौर खत्म हो चुका है अब देखने का दौर आ गया है।लिखित ब्लॉग की जगह विडियो ब्लॉग बनाने का दौर अपने चरम पर है। लोग अपने नीजी जीवन को लोगों के सामने परोसने के लिए आतुर जान पड़ते हैं। शौचालय और शयन कक्ष की गतिविधियां ही अब सार्वजनिक होना बाकी रह गया है।हो सकता है ये मर्यादा भी आगे कुछ वर्षों में टूट जाए और आदमी यत्र तत्र सर्वत्र रीलबाजी के चक्कर में अपना इज्जत तक नीलाम करने से बाज ना आए।खैर, दुनिया का काम आगे बढ़ना है वो बढ़ती जाएगी।चाहे पतन हो या उत्कर्ष.... आज के ब्लॉग में मैं छुरा के क्रिकेट आयोजन को याद करना चाहूंगा।जैसे ही शरद ऋतु का आगमन होता था छुरा में क्रिकेट आयोजन की तैयारियां शुरू हो जाती थी।रोड रोलर से क्रिकेट पिच का समतलीकरण कार्य शुरू हो जाता था और आसपास की झाड़ियो...

आदर्श स्कूल छुरा की यादें....

साल 1996 में पहली बार आदर्श स्कूल छुरा के दर्शन हुए जब पांचवीं बोर्ड का परीक्षा दिलाने गया।परीक्षा के ठीक 2 महिने बाद जुलाई माह में उसी स्कूल में दाखिला भी हो गया। नीले शर्ट और जामुनी रंग के छात्र समुद्र में मेरा भी विलय हो गया।तब आदर्श स्कूल सिर्फ लड़कों के लिए था ।आज की स्थिति में वहां लड़के-लड़कियां एक साथ शिक्षा ग्रहण करते हैं। स्कूल का बहुत सुंदर स्वागत द्वार था।एक गस्ती का पेड़,एक हाल,एक मंच और एक आफिस था।दो बड़े कमरे और तीन छोटे कमरे और भी थे। आफिस के ठीक नाक के सीध में एक छोटा कमरा था।एक बगल में था और एक हाल से लगा हुआ। उस समय हर 3 किमी के दायरे में मीडिल स्कूल की सुविधा नहीं थी। आसपास के गांव कोसमबुडा,दादरगांव,कसहीबाहरा,हरदी,खुसरुपाली,रावनाभाठा,सेम्हरा,टेंगनाबासा,खरखरा, विजयपुर,तिलाईदादर,पंडरीपानी,डांगनबाय और छुरा के बच्चे एक साथ पढ़ते थे।और भी दूर दराज के बच्चे भी पढ़ते थे लेकिन हास्टल में रहकर। हाल में राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के टीन चादर वाली बोर्ड लगे थे जिसमें मेरी पढ़ाई वहां जारी रहने तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में दिग्विजय ...

गणपति बप्पा मोरया

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 पावन भाद्रपद महिना चल रहा है। जगह-जगह पर गणेश जी विराजमान हैं।भव्य टेंट, भव्य पंडाल और भव्य सजावट से गणपति पंडाल की शोभा देखते ही बनती है। भक्ति गीतों के नाम पर कानफोडू संगीत भी बजता है।सब कुछ सही है।बस एक चीज में अंतर आया है। पहले श्रद्धा और भक्ति का भाव रहता था गणेशोत्सव में।अब सिर्फ दिखावा और फोटो खेंचू परंपरा ही चल रही है। किसी किसी पंडाल में तो बप्पा अकेले ही दिनभर बैठे रहते हैं। उनके भक्त सिर्फ शाम और सवेरे ही उनको टाईम देते हैं। कुछ जगह तो पूजा से ज्यादा विसर्जन के लिए उत्साह रहता है ताकि डीजे की धुन पर खूब नाच गा सकें। नशापान करके भी भक्ति के इस महापर्व का स्वरूप विकृत करने से भी कोई गुरेज नहीं है आज की पीढ़ी को। गणेशोत्सव का पुराना दौर हमने देख रखा है तो आज का ये दौर हमें मायूस करता है।तब अर्थ की कमी भी भक्ति की भावना को सबल रखती थी लेकिन आजकल आर्थिक स्थिति में मजबूती के बाद भी भक्ति निर्बल प्रतीत होती है।सेल्फी नाम की महामारी से अमूमन पूरा भारत ग्रसित है। यत्र तत्र सर्वत्र रीलबाजी और सेल्फीबाजी। 90 के दशक में बडी मुश्किल से पंडाल के लिए कपड़े की व्यवस्था होती थी। सामर्थ्...

आठे गोकुल और तेंदू सीथा की खीर

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 बचपन की जन्माष्टमी भी क्या खूब होती थी।सुबह जल्दी उठकर दोस्तों और बड़े भाईयों के संग नदी नहाने जाना।उपवास रखना और रात को भजिया बड़ा और तेंदू सीथा की खीर का फलाहार करना। अभी के समय में भांति-भांति के फल और मिठाई रेडीमेड बाजार में उपलब्ध है।पैसा फेंको और तमाशा देखो।मतलब खरीद लो। हमारे बचपन के दिनों में गांव में अक्सर अभावग्रस्तता होती थी।उस समय बचपन से ही ये संस्कार बच्चों को सीखा दिए जाते थे कि नाहक खर्च ही नहीं करना है। हमारे गांव में  श्री राधा कृष्ण का बहुत पुराना मंदिर है। बताते हैं कि मंदिर की नींव भारत के स्वतंत्रता वर्ष यानी 1947 में ही रखी गई थी जो लगभग दो तीन वर्षों में पूरी हुई। मंदिर निर्माण कर्ता के वंशज बताते हैं कि उनके पिता जी रेल से नवापारा के एक सेठ के साथ मूर्ति खरीदने जयपुर गए थे। राधाकृष्ण की मूर्ति खरीदने का एक दिलचस्प वाकया उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण की काली और श्यामल दोनों मूर्तियां थीं। जिसमें काली मूर्ति की कीमत कम थी और श्यामल संगमरमर की मूर्ति की कीमत ज्यादा।तो भी उन्होंने श्यामल संगमरमर की मूर्ति को खरीदा। जयपुर पहुंच कर उन्होंने कृष्ण मूर्ति को ...

रथदूतिया, दूजडोल और रथयात्रा

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  महाप्रभु आज अपने भक्तों का हाल जानने स्वयं रथ पर विराजमान होकर अपने बड़े भाई और बहन के साथ निकले हैं। जगन्नाथ स्वामी की ये रथयात्रा मंगलकारी होने के साथ साथ अद्भुत भी है। स्नान पूर्णिमा के बाद महाप्रभु अस्वस्थ हो जाते हैं। फिर 15 दिन के विराम और स्वास्थ्य लाभ लेने के पश्चात जगत के नाथ जगन्नाथ पुनः अपने भक्तों का कुशलक्षेम जानने निकल पड़ते हैं। रथयात्रा की परंपरा ओडिशा में है। लेकिन संपूर्ण भारतवर्ष में प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है।हमारा छत्तीसगढ़ तो ओड़िशा से लगा हुआ ही है तो रथयात्रा की ये परंपरा छत्तीसगढ़ में भी उतनी ही भक्ति भाव और श्रद्धा से निभाई जाती है। आज हमारे छुरा नगर में भी भव्य रथयात्रा निकाली गई है। ओडिशा की भजन मंडली और झांकी ने आयोजन को भव्य बना दिया है। प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा देखकर मुझे एक बुजुर्ग कलाकार नेहरू पेंटर की स्मृति अनायास ही हो आई है।वे भी प्रभु जगन्नाथ के भक्त थे।वे नि: संतान थे।तब छुरा में फोटो फ्रेमिंग करने वाले और गणेश प्रतिमा बनाने वाले वे इकलौते कलाकार थे। छोटी-छोटी गणेश जी की प्रतिमा बनाते थे।1995-96 में जब मैं छठी कक्षा में था मेर...

गोरस, गोरसी और गोरोचन

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  गौमाता के सीरीज में ये मेरा तीसरा ब्लॉग है। पिछले ब्लॉग को मात्र 10-15 लोगों ने ही पढ़ा। मुझे इस पर ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि जब लोगों को गौमाता और गौपालन में ही रुचि नहीं है तो गौ पर लिखे ब्लॉग को पढ़ने में क्या ही रुचि लेंगे। ये ब्लॉग मैं सिर्फ आप लोगों के ज्ञानवर्धन के लिए लिख रहा हूं ताकि आपको पता चले कि गौमाता से संबद्ध चीजें आपकी जिंदगी से कैसे जुड़ी है। क्या आपको पता है कि ग्रामीण अंचलों में दूध को आज भी गोरस कहा जाता है। इसमें ये भेद नहीं रखा जाता कि दूध किस पशु का है? अपितु मां के छाती से निकले दूध को भी गोरस ही कहा जाता है। गोरस से ही जुड़ा एक मिट्टी के पात्र का नाम है गोरसी।जो छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में ठंड के दिनों में सिगड़ी की तरह हाथों को सेंकने के लिए और छोटे बच्चों को मालिश करने के बाद सेंकने के लिए उपयोग किया जाता है।ये गोरसी का अन्य उपयोग है। मूलतः गोरसी गोरस यानि दूध को गोबर के कंडे पर धीमी-धीमी आंच में पकाने का पात्र है। मतलब ऐसा पात्र जिसमें गोरस पकता है। आप लोगों में से बहुतायत लोगों को पता होगा कि किसी विशिष्ट प्रकार के मृग के नाभि में एक बहु...