पनवाड़ी की दुकान


 


आज सभ्य असभ्य शिक्षित अशिक्षित सबके हाथों में मोबाइल है। लाखों वेब न्यूज पोर्टल है जिससे सब समाचार त्वरित रूप से मिल जाता है। लेकिन साल 2000 से पहले तक मामला अलग था।टीवी समाचार, आकाशवाणी समाचार और अखबार के बाद समाचार प्राप्ति का चौथा स्थान था पान की दुकान।पान की दुकान को गांव कस्बे में प्रायः पान ठेला कहा जाता था।ठेले का मालिक गांव कस्बे की मशहूर शख्सियत हुआ करती थी।पान के दुकान इनके व्यक्तिगत नाम या जाति के नाम से चला करती थी।भले ही दुकान में उनके बच्चे ही क्यों ना बैठे हों। बाबूलाल पान ठेला, गोपाल पान ठेला,साहू पान ठेला... अमुक अमुक आदि इत्यादि।पान ठेले पर कुछ हो ना हो पर एक जलती हुई छोटी लैंप और आईना जरुर होता था।जलती हुई छोटी लैंप पर सिगरेट के डिब्बे की कतरन जलाकर धुम्रपान प्रेमी अपना बीड़ी या सिगरेट जलाते थे और आईना देखकर अपने बाल संवारते थे।ठेलेवाले छोटी लैंप दिनभर जलाते थे जो कि उनका माचिस का खर्च बचाते थे।ग्राहक दिनभर माचिस मांगते तो ठेलेवालों का दिवाला निकल जाता।सवा रु लीटर की भाव में मिलने वाली घासलेट 15 पैसे में मिलने वाले माचिस डिब्बी की बनिस्बत ज्यादा किफायती था। ज्यादातर ठेले वाले में एक खूबी और होती थी।वो ज्यादातर संगीत-प्रेमी होते थे।रील वाले आडियो कैसेट का खजाना उसके सिगरेट वाले रैक के एक हिस्से मे करीने से सजी होती थी और ठेले पर दिनभर लेटेस्ट बालीवुड मूवी के गीत गूंजते रहते थे।तब इनके ग्राहक भी अजीबोगरीब हुआ करते थे।इलायची,लौंग,सौंफ,तंबाकू, चूना और उधार मांगने वालों की कमी नहीं होती थी। फिर भी बेचारे पान ठेले वाले किसी चक्रवर्ती सम्राट की तरह दिनभर ये सारी चीजें मुफ्त में बांटते रहते थे।पान में चूना दुकानदार लगाता था लेकिन कुछ लोग अपना होठ लाल कर दुकानदार को भी चूना लगा देते थे।पान ठेले पर अखबार पढ़ने वालों का तांता लगा रहता था।कुछ ज्ञानी किस्म के ग्राहक वर्ग पहेली भरने के लिए अखबार पढ़ते थे तो कुछ स्थानीय छबिगृह(टाकीज) में लगे फिल्मों की जानकारी टटोल लेते थे।ठेले पर कदम रखते ही चमन,चटनी,रिमझिम,किमाम वाले पान का आर्डर देने के बाद ग्राहक और दुकानदार के बीच देश दुनिया की जानकारी का आदान-प्रदान हो जाता था जो आज के इंटरनेट से भी तेज स्पीड से फैलती थी।फिर दुकानदार दूसरे पान में चूना कत्था लगाने लग जाता और ग्राहक पान के बीड़े को एकंगी गाल में दबाकर पेमेंट करके या उधारी लिखवाकर ठेले के बाजू में ही मुंह से लाल रंग की फुहार छोड़ता निकल जाता। हमारे लिए तो पान दुकान की एक लाल लाल दिखती कतरी ही काम की चीज थी।

गुटखा संस्कृति ने पानठेले की खूबसूरती को बदसूरती में बदल दिया।पान सेहतमंद था जबकि गुटखा और पान मसाला सिर्फ और सिर्फ हानिकारक है।पहली कक्षा में पढ़ाई जाने वाली स अक्षर के प्रतीक सरौता के प्रथम दर्शन मुझे पान ठेले में ही हुआ।पान दुकान में स्टील की डिब्बों में सजी कतरी,दो किसम की सुपारी,सौंफ,लौंग,इलायची ,खोपरा का सौंदर्य देखते ही बनता।छोटी छोटी डिब्बियों में जर्दा,चमन बहार,चटनी,ठंडाई सजी रहती।मेरी दादी तंबाकू में चमन बहार मलकर खाती थी। इसलिए पान ठेले के इस चमन बहार से मेरा पुराना परिचय है।जब छोटा था तब ढाई रु डिब्बे की कीमत पर मिलने वाली चमन बहार की डिब्बी को मैंने अंतिम बार शायद 35 या 40 रु में कुछ महीने पहले दादी के लिए खरीदा था। वैसे भी शौक बड़ी चीज है।अंतिम दिनों तक मेरी दादी चमन बहार खाती रही।बचपन में उनकी नजर हटते ही मैं कभी कभी उसका ढक्कन चांट लेता था। ठंडी मीठी स्वाद आती थी।उस समय उस पर लिखे रोज पाउडर का मतलब मुझे समझ नहीं आता था।90 साल की आयु पूर्ण कर कुछ दिनों पहले ही मेरी दादी हम सब को छोड़कर चली गई लेकिन इस उम्र तक भी उन्होंने  तंबाकू में चमन बहार मलकर खाना नहीं छोड़ा था।खैर,दौर गुजर जाते हैं लेकिन स्मृतियां  नहीं गुजरती वो सदैव अमिट होती हैं।


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