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ए पानवाला बाबू.....

बहुत दिनों के बाद आज खुल्ला पान खरीदने के लिए पानठेला (पान बेचने के खोमचे) में जाना हुआ। दुकानदार ने बड़ी उम्मीद से पूछा-कौन सा पान बनाऊं?तो मैंने उनको मायूस करने वाला जवाब दिया-भाई मुझे खुल्ले पान चाहिए,कुछ काम है।तो उन्होंने दस रूपए लेकर मुझे बंगला पान के चार पत्ते कागज में लपेटकर थमा दिए। मैं भी पान लेकर लौट आया।मुझे ताज्जुब हुआ कि उसने बिना पूछे मुझे बंगला पान ही क्यों दिया? अगले दिन उनके दुकान पर फिर जाना हुआ तो मैंने उनसे अपने मन की बात कही।तो उन्होंने बताया कि ज्यादातर पूजा पाठ के लिए बंगला पान का ही उपयोग होता है, इसलिए बिना पूछे ही दे दिया।ये होता है कामन सेंस!!! वैसे पानवाले भाई साहब की याददाश्त की दाद देनी चाहिए क्योंकि उनको अपने ग्राहकों के टेस्ट और पसंद हमेशा याद रहती है।फलाने साहब की पसंद ये है,ढेकाने साहब ये बनवाते हैं।एकदम कंम्प्यूटर के मेमोरी में जैसे फिट कर दी हो। बचपन में जब किसी को पान मंगाना होता था तो वो सामनेवाले पान दुकान का नाम बता दिया करते थे और हम जाकर पानवाले को उन सज्जन का नाम बता दिया करते थे तब वो फौरन  ही सामने वाले बंदे की मनपसंद पान बना दिया ...