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दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

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  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकगायक स्व. मिथलेश साहू जी की पुण्यतिथि है।5 वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 2019 को वे छत्तीसगढ़ी लोककला जगत में कभी ना भरने वाली रिक्तता छोड़कर परलोक गमन कर गए।उनके गायन में माधुर्य का आकर्षण था।लोकगीतों के विविध छटाओं को उन्होंने अपने स्वर से सजाया है। प्रेमगीत,हास्यगीत, पारंपरिक उत्सव गीत,विवाह गीत आदि में उनके गायन का अंदाज बेहतरीन था।साल 1977 में उन्होंने सोनहा बिहान लोककला मंच से अपनी कला यात्रा की शुरुआत करी थी। उनके पिता स्व श्री जीवनलाल साहू भी एक लोक कलाकार थे। इसलिए कला के प्रति उनका झुकाव नैसर्गिक था।नाचा के विख्यात कलाकार मदन निषाद की कलाकारी ने उनको लोककला के सम्मोहन में बांधा था।इस सम्मोहन से बंधकर वे कला पथिक बन गए। वर्ष 1978 से वे आकाशवाणी रायपुर से पंजीकृत लोकगायक के रूप में प्रसारित हुए।फिर कभी रुके नहीं। श्रोताओं का प्यार उन्हें सदैव मिला। पिछले कुछ सालों में मैं निरंतर दुखद प्रसंगों का साक्षी रहा हूं। इसलिए ऊप...