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अजब समय के पांव....

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  समय की यात्रा अनवरत जारी रहती है।समय किसी के लिए ना कभी रुका था,ना रुका है और ना ही रुकेगा।बचपन में स्कूल की किताबें अरुचिकर लगती है।संभवतः आप में से भी कोई सहमत हो।उस समय संत, कवियों के दोहे,सीख वाली कहानियां और सूक्तियां पढ़कर खिन्नता होती थी।हालांकि ये सब मूल्यवान तब भी थी,अब भी है और भविष्य में भी होगा।‌लेकिन बचपन में पढ़ी बहुत सी बातों का मर्म अब समझ में आ रहा है। स्कूली किताबों के पाठ्यक्रम में शामिल रहीम और कबीर के दोहे उस समय हमारी बालबुद्धि में समझ के बाहर थे।सोचते थे इन सबसे कब मुक्ति मिले?कब किताबों का ये जंजाल छूटे! कब बड़े हों!!! कबीर का एक दोहा याद आ रहा है- काल करे सो आज कर,आज करे सो अब!! पल में परलय होएगी,बहुरि करेगा कब!! मतलब ये है कि जो काम करना है वो तत्काल करनी चाहिए। बाद में शायद वक्त उस काम के लिए वक्त ही ना दे तो।कवि प्रदीप का लिखा एक गीत भी खूब चलता था।कभी उलटे कभी सीधे पड़ते अजब समय के पांव...कभी धूप तो कभी छांव.... सच में!कितनी गहरी बात है।समय कब बीत जायेगा या समय कब अपना मिजाज बदल ले कुछ कह नहीं सकते। हममें से ज्यादातर ने आज का काम कल पर टालने की आदत बन...