भटकने के लिए विवश गौवंश
हम लोग भले ही भौतिक तरक्की कर रहे हैं लेकिन मानवता को शर्मसार भी कर रहे हैं।दानव और मानव के बीच स्वभाव का जो अंतर ईश्वर ने बनाया था उस अंतर को आज मानव भोग की लालसा में मिटा रहा है। आराम और दिखावे की चकाचौंध ने इंसान को अंधा बना दिया है।कुदरत की दी हर नैमत में से अपने हिस्से के अलावा वो बाकी जीव जंतुओं का हिस्सा हड़पने पर आमादा है। फिलहाल मैं गौवंश की दुर्गति देखकर आहत हूं और लिखने के लिए विवश हूं। कितने लोगों तक मेरी बात पहुंचेगी।लोग सहमत होंगे।असहमत होंगे इससे मुझे कोई मतलब नहीं है। एक समय में गौवंश ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधार थी।कृषि आधारित जीवन में बिना गौवंश के ग्रामीण अस्तित्व की कल्पना करना मुश्किल था। आप सब ने गाय का निबंध कक्षा तीसरी में पढ़ा होगा।गाय एक चौपाया जानवर है।काली गाय को श्यामा गाय कहते हैं।आदि... आदि.... भारत की कृषि व्यवस्था में मशीनों का आगमन हुआ और लोगों में दिखावे का चलन बढ़ा तब से गौवंश के लिए समस्या की शुरुआत हुई।खेत जोतने से लेकर बाजार में अनाज के विक्रय तक गौवंश का उपयोग होता था। छोटे बच्चों के पोषण से लेकर व्यंजनों में दूध दही घी का खूब इस्तेमाल होता...