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नवंबर 1, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चंदैनी गोंदा....आधी सदी का सफर

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  चंदैनी गोंदा,एक छोटा सा खुशबूदार और सदाबहार पुष्प जो आमतौर गांवों में सहज रूप से कुएं के पास या बाड़ी में मिल जाया करती है।इसके छोटे-छोटे लाल पीले रंगत लिए फूल बड़ी मात्रा में छोटे-से पौधे मे खिलते हैं,जो सामान्यत: देव-पूजा में प्रयुक्त होते हैं।चंदैनी मतलब चांदनी।जिस प्रकार आकाश में एक साथ अनगिनत चांदनी दिखाई पड़ते हैं,उसी प्रकार चंदैनी गोंदा के नन्हें पौधे पर भी अनगिनत फूल खिलते हैं। चंदैनी गोंदा का सौंदर्य देखते ही बनता है।नाम अनुरूप छत्तीसगढ़ का प्रतिष्ठित सदाबहार लोक सांस्कृतिक मंच है"चंदैनी-गोंदा"।दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा रोपित और आदरणीय खुमान लाल साव जी के श्रम से सिंचित"चंदैनी-गोंदा"समय की मार से आज तक कुम्हलाया नहीं है।यह कार्यक्रम छत्तीसगढ़ में राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरण का शंखनाद था। मुझे याद है साल 2002 में हमारे निकटतम कस्बे छुरा में दशहरे के अवसर पर"चंदैनी-गोंदा"का कार्यक्रम आया था।तब मुझे इस संस्था के बारे में ना तो कोई जानकारी थी और ना ही मुझे लोकमंच के कार्यक्रम में विशेष रूचि थी।सोचा था कि रावण दहन के पश्चात एकाध घंटे कार्यक्रम देखक...

चित्रों में छत्तीसगढ़ दर्शन

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 किस्मत,नसीब,तकदीर,भाग्य पता नहीं सचमुच होता भी है कि नहीं ये मुझे समझ नहीं आता।क्योंकि कुछ लोगों को कड़ी मेहनत करके भी कुछ नहीं मिलता और कुछ लोगों को बैठे बिठाए ही सारे सुख मिल जाते हैं।कर्म के हिसाब से सबको फल मिलता है,ऐसा सुनने में आता है।तो क्या सारे धनकुबेरों ने अच्छे कर्म किए हैं?या दुनिया में गरीबों की जो बहुत बड़ी आबादी अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं उन्होंने खराब कर्म किए हैं। पता नहीं उनको किस कर्म का फल भोगना पड़ रहा है।ये गुत्थी मेरे समझ के बाहर है!! परिस्थितियों के आगे इंसान मजबूर होता है। बड़े से बड़े प्रतिभावान की प्रतिभा दब जाया करती है। जरूरतमंदों को समय पर ना तो मार्गदर्शन मिल पाता है और ना किसी किस्म की कोई मदद।फलत:अनेक प्रतिभाएं दम तोड़ देती है। हालांकि सरकारी तंत्र बड़े बड़े दावे जरूर करती है पर वास्तविक हकदार तक प्राय:मदद पहुंचने में देर हो जाती है। हीरा कहीं भी रहे पर अपनी चमक जरूर बिखेरता है,ये शत् प्रतिशत सत्य है।पर हीरे की परख करने वाले और तराशकर गढ़ने वाले जौहरी का होना भी जरूरी है हीरे को मूल्यवान बनाने के लिए। ऐसा ही एक कीमती हीरा है श्री धनेश साहू। तिल्दा-...

मोर भुजा में लाखन लोग पलै,मैं घर हारे जगजीता अंव

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 लक्ष्मण मस्तूरिया छत्तीसगढ़ का जाना-पहचाना नाम है।जो लोग उनको चेहरे से नहीं पहचानते वे उन्हें उनके गाए गीतों और कविता के माध्यम से पहचानते हैं। आकाशवाणी से प्रसारित गीतों से वे छत्तीसगढ़ के गांव गांव में लोकप्रिय हो गए। संभवतः उनके जैसी लोकप्रियता किसी और गायक कवि को नहीं मिला है। बिलासपुर के मस्तूरी में जन्म लेकर रायपुर आने तक का उनका सफर बहुत संघर्षपूर्ण रहा है।उनके समकालीन साहित्यकार रवि श्रीवास्तव जी बताते हैं कि लक्ष्मण मस्तूरिहा ने राजिम में पवन दीवान और कृष्णारंजन जी का सान्निध्य प्राप्त किया था। उन्होंने राजिम में बहुत समय बिताया था और नवापारा में जाकर टेलरिंग का काम भी किया करते थे।इस दौरान उनका काव्य सृजन चलता रहा और वे आकाशवाणी से प्रसारित होने लगे थे। आकाशवाणी से प्रसारित किसी गीत को सुनकर बघेरा वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख उनकी आवाज और गीत से इतने प्रभावित हुए कि वे उनको अपनी लोक सांस्कृतिक प्रस्तुति"चंदैनी-गोंदा" में काम करने के लिए मनाने के लिए राजिम आ गए। "चंदैनी-गोंदा" से जुड़ने के बाद उनके द्वारा लिखित और गाए गीतों को अपार ख्याति मिली।"चंदैनी गों...

बटोरनलाल की कलायात्रा

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  आज का समाचार पत्र देखा तो पता चला कि अंततः राज्य निर्माण के बीसवें वर्ष में हमारे वयोवृद्ध कलाकार श्री शिवकुमार'दीपक' को लोककला में उनके योगदान के लिए राज्य अलंकरण"दाऊ मंदराजी सम्मान"से अलंकृत किया गया है।इस पर पोस्ट लिखने का विचार मन में चल ही रहा था कि ललित भाई का वाट्सएप मैसेज इस विषय पर लिखने के लिए आ गया।"दीपक" जी से मेरी प्रत्यक्ष भेंट तो नहीं है पर मोर मितान चैनल के दिलीप भाई से उनकी बातचीत और उनसे संबंधित मेरी अल्प जानकारी के आधार पर ये पोस्ट लिख रहा हूं। राज्य शासन द्वारा दीपक जी को अलंकृत किया जाना स्वागतेय है पर मुझे लगता है कि उनको ये पुरस्कार मिलने में थोड़ा विलंब हो गया,वरन वे पहले ही इसके अधिकारी थे।खैर,देर आए दुरुस्त आए।सही व्यक्ति को सही सम्मान मिला। इस पुरस्कार के बाद उनको पद्म पुरस्कार भी मिल जाए तो श्रेयस्कर होगा। हालांकि उनसे आयु में कम और कला क्षेत्र में कम अनुभवी लोगों को पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। दुर्ग जिले के पोटिया ग्राम में जन्मे शिवकुमार"दीपक"जी की बचपन से ही अभिनय में रूचि थी।बालपन में अपन...

जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मइया

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       पृथक् छत्तीसगढ़ राज्य का सपना हमारे पुरखों ने देखा था और उस सुनहरे स्वप्न को हकीकत का अमलीजामा पहनाने के लिए संघर्ष और आंदोलन का एक लंबा दौर चला।पं.सुंदरलाल छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के प्रथम स्वप्नदृष्टा थे तत्पश्चात डॉ खूबचंद बघेल,संत पवन दीवान, ठाकुर रामकृष्ण सिंह और श्री चंदूलाल चंद्राकर जैसे अनेकों माटी पुत्रों ने छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में अटल जी की रायपुर में सभा हुई तो उन्होंने छत्तीसगढ़ की जनता से 11 लोकसभा सीट में अपने प्रत्याशियों को जिताने का आग्रह किया और चुनाव जीतने के बाद पृथक् छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का आश्वासन दिया। चुनाव के बाद परिणाम आए। अपेक्षानुरूप अटल जी को सीटें नहीं मिली फिर भी उन्होंने अपना वादा निभाया और 1 नवंबर सन् 2000 से हमारा छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया।स्थापना के पश्चात छत्तीसगढ़ राज्य सफलता के नित नए सोपान तय करता रहा और आज हम बीसवीं वर्षगांठ मना रहे हैं।  छत्तीसगढ़ की शस्य श्यामला धरती रत्नगर्भा है।एक से बढ़कर एक रत्न छत्तीसगढ़ महतारी की कोरा में जन्म लिए हैं।जिन्होने छत्...