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जो बीत गई सो बात गई...

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 लिखना मेरा शौक रहा है, और उसे शौक से ऊपजा था ये ब्लॉग।नये साल पर हमेशा कुछ ना कुछ लिखता रहा। पर पिछले साल की त्रासदी ने मुझे कुछ लिखने लायक ही नहीं छोड़ा।जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो बहुत कुछ बदल जाती है।जीने का नजरिया,तौर तरीका और भी बहुत कुछ... जीवन चलने का नाम है।जीवन पथ पर जो भी जैसे भी मोड़ आए सबको पार करते हंसते रोते आगे बढ़ना ही जिंदगी है। ज़ेहन में बार बार एक गीत आता है।शायद सफर फिल्म का गीत है... नदिया चले चले रे धारा चंदा चले चले रे तारा.... तुझको चलना होगा...तुझको चलना होगा... इस गीत की पंक्तियों में जीवन दर्शन समाया सा लगता है। जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है आंधी से तूफां से डरता नहीं है तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें मंजिल को तरसेंगी तेरी निग़ाहें... तुझको चलना होगा... बस इसी के धुन में चले जा रहे हैं। वक्त के साथ बदलना कभी कभी इंसान की मजबूरी हो जाता है।वो चाहकर भी खुद को हमेशा एक सा नहीं रख सकता। कुछ कमियां जीवन भर पूरी नहीं होती। लेकिन इंसान को कमियों के साथ भी जीना है..आगे बढ़ना है।नये साल या पुराने साल का उमंग उत्साह अब गुदगुदाता नहीं है।आज सोच लिया था कि कुछ ल...

वक्त से डरकर रहें...

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 व्यस्तता इतनी अधिक है कि लेखन गतिविधियां लगभग अवरूद्ध सा है। इसलिए ब्लाॅग अभी थम सा गया है। लेकिन कल और आज में दो लोगों की जिंदगी में आए मोड़ को देखकर ताज्जुब में हूं‌।कल जनजातीय ग्राम कनफाड़ में जाना हुआ। वहां एक धाकड़ और वजनदार व्यक्तित्व वाले जनजाति नेता थे। पिछले दो सालों से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी।सोचा आया हूं तो हालचाल पूछता चलूं। फिर उनके घर के सामने जाकर आवाज लगाया।जब दो तीन बार पुकारने पर भी कोई जवाब  नहीं आया तो उनके खुले द्वार से झांककर देखा तो आंगन नजर आया जहां वो बुजुर्ग मुझे अपने हाथ पैर से घिसटते नजर आए। मैं स्तब्ध था, एक दौर था जब वो शख्स धड़धड़ाते हुए किसी भी कार्यालय में चला जाता था और साइकिल में ही कई किलोमीटर की दूरी नाप देता था।आज घिसटकर चलने पर मजबूर है। उनकी दशा देखकर दुख हुआ। गांव वालों से पूछने पर पता चला कि पिछले साल भर से उनकी ऐसी ही दशा है। वक्त भी अजीब सितम ढाता है। आज नजदीकी गांव सेम्हरा में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लोक कला मंच लोरिक चंदा की प्रस्तुति देखने गया तो वहां भी एक आश्चर्य मेरा इंतजार कर रहा था। वहां लगभग पागलों जैसी हालत में एक शख्...

ये जीवंत देव प्रतिमाएं...

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 आज अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस है।जीवन की विदाई बेला पर खड़े अनुभव के पिटारे को सम्मानित करने का दिन।साल 1991 से 1 अक्टूबर को बुजुर्गों के सम्मान के लिए समर्पित किया गया है। लेकिन इस एक दिन को छोड़ बाकी दिनों में क्या बुजुर्गों का सम्मान नहीं किया जाना चाहिए। मनुष्य में एक बड़ी गंदी आदत है, जो चीज उनके काम की रहे या जब तक उनसे कोई लाभ मिल रहा हो तभी तक वह उसकी कद्र करता है। भौतिकतावादी इस युग में अब बुजुर्गों को भी किसी सामग्री की तरह उपयोगी और अनुपयोगी में वर्गीकृत कर दिया गया है। शारीरिक शक्ति से हीन और मानसिक रूप से खिन्न बुजुर्गों को आज हाशिये पर रखा जा रहा है।आज घर घर में बुजुर्गों का अपमान होता है।किसी के पास धन संपत्ति हो तब बात अलग हो जाती है। बचपन के दिनों में पढ़ी मुंशी प्रेमचंद की लिखी दो कहानियों "पंच परमेश्वर" और "बूढ़ी काकी" की दोनों बुजुर्ग पात्रों की तस्वीर आज भी आंखों के आगे बरबस आ जाता है। विशेष रूप से बूढ़ी काकी की वो दीन-हीन बुजुर्ग, जिसका अत्यंत मार्मिक चित्रण मुंशीजी ने किया है। कहानी पढ़ते पढ़ते ही बरबस आंखें छलक आती है। बुढ़ापे में जीभ से स्...

विद्रोह जरूरी है!!!

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 कुछ महीनों से ब्लॉग लेखन बंद था।कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा था।वैसे मेरे लेख को पसंद करने वाले लोग सतत मेरा उत्साह वर्धन ब्लाग पर आकर या मेरे निजी नंबर से संपर्क कर करते रहते हैं,जो मेरे ब्लाग लेखन में निरंतरता के लिए टानिक का काम करता है।लेखन का कार्य भी दिमाग के ऊपर आश्रित होता है।कभी कभी लिखने के लिए जगह और विषय मायने नहीं रखती, धाराप्रवाह मन का आवेग शब्दों में उतर जाता है और कभी कभी पूरी तैयारी के साथ भी लिखने के लिए बैठो तो कुछ भी नहीं सूझता।मेरे मित्रों ने लेखन के लिए सदैव मेरा उत्साह बढ़ाया है।उनका सतत सहयोग भी मुझे मिलता है।मैं मित्रों को परेशान करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूं और जब वे सीधे नहीं मानते तो बरपेली(जबरदस्ती)उनको सहयोग देने के लिए बाध्य करता हूं।  पिछले दिनों एक परिचित से मुलाकात हुई। पिछले वर्ष वे अकस्मात पक्षाघात के शिकार हुए और उसके चेहरे के दांये भाग और हाथ को लकवा मार गया था। लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और प्राकृतिक उपचार की ताकत से अब अच्छी हालत में हैं।दैनिक दिनचर्या को स्वयं कर लेते हैं अकेले साइकिल चला पा रहे हैं...