कचना धुरवा गाथा-3
वीर कचना धुरवा गाथा की ये तीसरी कड़ी है जो जनश्रुति पर आधारित है।इस क्रम की पिछले दोनों पोस्ट को मेरे पाठक मित्रों ने सराहा है।मुझे खुशी इस बात की ज्यादा है कि आडियो वीडियो के इस दौर में मैं कुछ लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर पा रहा हूं।किसी जननायक को देवता की उपाधि तब मिलती है,जब वह अपना सर्वस्व जनकल्याण के लिए न्यौछावर कर देता है।जरूर वीर कचनाधुरवा में बुद्धि,बल औल त्याग का गुण कूट-कूट कर भरा रहा होगा। जनश्रुतियां वाचिक हुआ करती है,इसका ऐतिहासिक संदर्भ के साथ तालमेल बिठा पाना संभव प्रतीत नहीं होता है।प्रस्तुत कहानी में वीर कचना धुरवा को प्राप्त अलौकिक शक्ति और उसके बुद्धि बल का परिचय मिलता है। बताते हैं कि जब कचना धुरवा राजा नहीं बना था और एक सामान्य युवक था तब वह कृषि आदि का काम भी करता था।एक दिन जब वह हल जोत रहा था तब उसकी मां उसके लिए खाना लेकर गई।कचना धुरवा जब भोजन करने के लिए एक बांस पेड़ के नीचे बैठा तभी बांस पेड़ में लगे बांदा(अमरबेल की तरह परजीवी पौधा)से थोड़ा सा रस कचना धुरवा के लिए लाए सब्जी पर गिरा।उस दिन उसकी मां उसके लिए मछली पकाकर लाई थी।उस सब्जी में रस गिर...