गुरुवार, 10 सितंबर 2020

कचना धुरवा गाथा-3


 वीर कचना धुरवा गाथा की ये तीसरी कड़ी है जो जनश्रुति पर आधारित है।इस क्रम की पिछले दोनों पोस्ट को मेरे पाठक मित्रों ने सराहा है।मुझे खुशी इस बात की ज्यादा है कि आडियो वीडियो के इस दौर में मैं कुछ लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर पा रहा हूं।किसी जननायक को देवता की उपाधि तब मिलती है,जब वह अपना सर्वस्व जनकल्याण के लिए न्यौछावर कर देता है।जरूर वीर कचनाधुरवा में बुद्धि,बल औल त्याग का गुण कूट-कूट कर भरा रहा होगा।

 जनश्रुतियां वाचिक हुआ करती है,इसका ऐतिहासिक संदर्भ के साथ तालमेल बिठा पाना संभव प्रतीत नहीं होता है।प्रस्तुत कहानी में वीर कचना धुरवा को प्राप्त अलौकिक शक्ति और उसके बुद्धि बल का परिचय मिलता है।

बताते हैं कि जब कचना धुरवा राजा नहीं बना था और एक सामान्य युवक था तब वह कृषि आदि का काम भी करता था।एक दिन जब वह हल जोत रहा था तब उसकी मां उसके लिए खाना लेकर गई।कचना धुरवा जब भोजन करने के लिए एक बांस पेड़ के नीचे बैठा तभी बांस पेड़ में लगे बांदा(अमरबेल की तरह परजीवी पौधा)से थोड़ा सा रस कचना धुरवा के लिए लाए सब्जी पर गिरा।उस दिन उसकी मां उसके लिए मछली पकाकर लाई थी।उस सब्जी में रस गिरने से सब्जी बनाई गई मछली जीवित हो गई।जब कचना धुरवा ने भोजन करने के लिए सब्जी खानी चाही तो सब्जी में जीवित मछली देखकर चौंक गए।फिर अपनी मां के ऊपर गुस्सा करने लगे कि उसने ध्यान से सब्जी नहीं बनाई।उसकी मां भी इस घटना से हतप्रभ थी।बांसबांदा के रस गिरने वाली घटना से दोनों अनभिज्ञ थे।

  कचनाधुरवा माता जगदम्बे का उपासक था।रात में माता कचना धुरवा के स्वप्न में आकर उसको मछली के जीवित होने के कारण के बारे में बताया कि उस बांस बांदा में अमृत रस भरा है जिसके कारण मछली जीवित हो गई थी।अगर तुम उस अमृत रस भरे बांदा का सेवन कर लोगे तो तुम्हारी मृत्यु लगभग असंभव होगी चाहे कोई तुम्हारे शरीर के टुकड़े टुकड़े ही क्यों ना कर दे, सिर्फ़ एक विशेष परिस्थिति में ही तुम्हारी मृत्यु होगी।उस रहस्य के बारे में मैं तुम्हें कल बताउंगी।पर तुम उस रस का सेवन तभी कर पाओगे जब तुम अपनी मां की बलि दोगे।

कचना धुरवा के लिए स्वप्न की बात विस्मयकारी थी।फिर भी उसने माता जगदम्बे की बात पर पूर्ण विश्वास किया और मन में कुछ निश्चय करके अगली सुबह अपने माता की बलि दे दी।फिर वह उस बांस बांदा को ले आया और उसके अमृत रस से सर्वप्रथम अपनी मां को पुनर्जीवित किया तत्पश्चात उसने स्वयं रस का पान किया।रात को माता उसके स्वप्न में आई और उसकी बुद्धि बल की बहुत प्रशंसा की।माता ने बताया कि अपनी मां की बलि देना एक परीक्षा थी। जिसमें तुम शत प्रतिशत सफल हुए।साथ ही कचना धुरवा को उसके मृत्यु का रहस्य भी बताया।

 समय का चक्र चलता रहा और एक साधारण युवक से कचना धुरवा नवागढ का राजा बन गया।उसने अपने अपार बुद्धि बल, पराक्रम और शौर्य से अपनी रियासत का विस्तार किया और प्रजा के बीच अपार ख्याति प्राप्त करने के साथ ही अपने राज्य को सुख समृद्धि से भर दिया।उसकी अपार ऐश्र्वर्य और ख्याति से कुछ दुष्ट राजाओं को जलन होती थी। उन्होंने कचना धुरवा के ऊपर बार बार हमला किया पर वो कचना धुरवा को मार नहीं पाए।उसके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर देने पर भी वह पुनः जुड़ कर पूर्ववत हो जाती थी।तब उसके मृत्यु का उपाय ढूंढने के लिए उन्होंने मदिरा बनाने वाली एक महिला से संपर्क किया।यदा-कदा कचना धुरवा उस महिला के पास मदिरापान के लिए जाते थे। धनराशि का लालच देकर दुष्ट राजाओं ने उस महिला को कचनाधुरवा के मृत्यु का रहस्य पता लगाने का कार्य सौंपा।कुछ दिन पश्चात मदिरापान करने के लिए वीर कचनाधुरवा उस महिला के पास आया। बातों ही बातों में मदिरा के नशे में चूर कचनाधुरवा को शब्द जाल में फंसा लिया।मदिरा बड़े से बड़े विद्वान की मतिभ्रष्ट कर देती है। मदिरापान पश्चात आदमी को उचित-अनुचित का बोध नहीं होता।वीर कचना धुरवा मदिरापान के बाद बहक गए और अपनी मृत्यु का रहस्योद्घाटन करते हुए महिला को बताया कि उसकी मृत्यु तभी होगी जब उसके शरीर के नौ छिद्रों में दामा(बांस से निर्मित कील)ठोंक दी जाए,अन्यथा वो शरीर के हजार टुकड़े होने पर भी जी उठेंगे।

महिला ने वीर कचनाधुरवा की मृत्यु का रहस्य दुष्ट राजाओं को बता दिया।तब उन राजाओं ने पैरी नदी सिरकट्टी के पास वीर कचना धुरवा को घेरकर मार डाला और उसके सिर को काट डाला।फिर उसके बताए रहस्य अनुसार उसके शरीर के नौ छिद्र में दामा ठोंक दिया।बताते हैं कि ये घटना सिरकट्टी कुटेना के पास घटी थी।कचना धुरवा का सिर उस जगह पर कटने के कारण सिरकट्टी प्रचलित हो गया।इस प्रकार से एक पराक्रमी राजा दुष्टों के छल के कारण धोखे से मृत्यु को प्राप्त हुआ।

ये कहानी कपोल कल्पना भी हो सकती है और सत्य भी। इसलिए इस की सच्चाई या कल्पना के संबंध में मैं किसी भी प्रकार का दावा नहीं करता। फिलहाल मैं वीर कचना धुरवा की गाथा संकलन के सफर पर निकला हूं तो मेरे पास जो कहानी हाथ लगेगी,वो अपने ब्लाग पर डालता रहूंगा।किसी की भावना को जाने अनजाने ठेस पहुंचती होगी तो क्षमाप्रार्थी रहूंगा।अगर आपके आसपास इनके संबंध में कोई जानकारी हो तो मुझे जरूर अवगत कराएं।

अगली बार वीर कचनाधुरवा की नहीं बल्कि एक विलक्षण प्रेमगाथा की नायिका कचना और नायक धुरवा पर चर्चा करेंगे।

तब तक राम...राम...

बोलो कचना धुरवा महराज की जय!!!



2 टिप्‍पणियां:

Sanjay Paleshwar ने कहा…

ऐसे कैसे हो सकता है मित्र .... की एक पुत्र अपनी माँ की बलि दे दे...

झांपी-यादों का पिटारा ने कहा…

ये एक जनश्रुति मात्र है। जिसमें कचना धुरवा के बुद्धि कौशल की परीक्षा थी।जिस प्रकार परशुराम जी ने अपनी माता का वध किया था। दोनों प्रकरण में उनकी माता पुनर्जीवित हुई है।

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