गणपति बप्पा मोरया
पावन भाद्रपद महिना चल रहा है। जगह-जगह पर गणेश जी विराजमान हैं।भव्य टेंट, भव्य पंडाल और भव्य सजावट से गणपति पंडाल की शोभा देखते ही बनती है। भक्ति गीतों के नाम पर कानफोडू संगीत भी बजता है।सब कुछ सही है।बस एक चीज में अंतर आया है। पहले श्रद्धा और भक्ति का भाव रहता था गणेशोत्सव में।अब सिर्फ दिखावा और फोटो खेंचू परंपरा ही चल रही है। किसी किसी पंडाल में तो बप्पा अकेले ही दिनभर बैठे रहते हैं। उनके भक्त सिर्फ शाम और सवेरे ही उनको टाईम देते हैं। कुछ जगह तो पूजा से ज्यादा विसर्जन के लिए उत्साह रहता है ताकि डीजे की धुन पर खूब नाच गा सकें। नशापान करके भी भक्ति के इस महापर्व का स्वरूप विकृत करने से भी कोई गुरेज नहीं है आज की पीढ़ी को। गणेशोत्सव का पुराना दौर हमने देख रखा है तो आज का ये दौर हमें मायूस करता है।तब अर्थ की कमी भी भक्ति की भावना को सबल रखती थी लेकिन आजकल आर्थिक स्थिति में मजबूती के बाद भी भक्ति निर्बल प्रतीत होती है।सेल्फी नाम की महामारी से अमूमन पूरा भारत ग्रसित है। यत्र तत्र सर्वत्र रीलबाजी और सेल्फीबाजी। 90 के दशक में बडी मुश्किल से पंडाल के लिए कपड़े की व्यवस्था होती थी। सामर्थ्...