ददा तोला टीके धेनु गाय...
अभी ग्रामीण क्षेत्रों में शादियों का सीजन चल रहा है। लाउडस्पीकर पर शादियों के गीत बज रहे हैं। छत्तीसगढ़ में उत्सवों और पर्व विशेष के लिए गीतों की कमी नहीं है। शादियों में पारंपरिक रूप से गाए जाने वाले गीतों की भरमार है।हर नेंग के लिए अलग-अलग गीत है।
कुछ दिनों पूर्व एक शादी कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला। वहां भी लाउडस्पीकर पर छत्तीसगढ़ी विवाह गीत बज रहे थे और लोग अपने अपने काम में व्यस्त थे। लेकिन मेरा ध्यान उस गीत पर चला गया। जिसके बोल थे... कोन तोला टीके नोनी अचहर पचहर.. कोन तोला टीके धेनु गाय।
गीत जितना मधुर है उतना ही मर्मस्पर्शी भी।इस गीत में पुत्री को पाणिग्रहण के उपरांत माता-पिता के द्वारा दाइज(उपहार)देने की परंपरा का उल्लेख है। जिसमें पहले प्रश्न के स्वरूप में गीत का आरंभ होता है तदंतर उसका उत्तर भी दिया जाता है। छत्तीसगढ़ी में इसे टिकावन गीत कहा जाता है।पूरा गीत कुछ इस प्रकार है-
कोन तोला टीके नोनी अचहर पचहर
अचहर पचहर
कोन तोला टीके धेनु गाय..
दाई तोला टीके नोनी अचहर पचहर
अचहर पचहर
ददा तोला टीके धेनु गाय
गाय अऊ भंइस ले नोनी कोठा तोर भरगे
दुलरु के मन नइ तो आय....
मतलब इस गीत में पिता के द्वारा अपनी पुत्री को धेनु गाय अर्थात दुहानू गाय देने की बात कही गई है।
पहले ग्राम्य जीवन में गौसेवा और गौपालन गृहस्थी का अनिवार्य हिस्सा था।इस कारण ही हमारी संस्कृति में गौ का विशेष स्थान है।
छत्तीसगढ़ में गौपालन की समृद्ध संस्कृति रही है। यहां मनाए जाने वाले हरेली और देवारी(गोवर्धन पूजा) त्योहार विशुद्ध रूप से गौपूजन का ही पर्व है।
भारतवर्ष में विवाह,पिंडदान,यज्ञ आदि में गौदान की श्रेष्ठ परंपरा रही है।बिना गौ दान के किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन को सफल नहीं माना जाता है।
गाय को माता की संज्ञा दी गई है लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गौ की दुर्दशा देखकर मन व्यथित हो जाता है। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि जब धरती रावण के अत्याचार से त्रस्त हो गई तब वो देवताओं और मुनियों के पास मुक्ति के लिए गौ रुप लेकर गई।
धेनु रुप धरि हृदयं बिचारी।गई तहां जहं सुर मुनि झारी।।
धरा पर धर्म की दुर्दशा देखकर भगवान विष्णु ने मनुष्य रूप में जब रामावतार लेना निश्चित किया तब उनके अवतरण होने का उद्देश्य देवता,ब्राम्हण, संतों और गौ की रक्षा करना ही था। गोस्वामी जी लिखते हैं-
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
आगे चलकर जब भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह संपन्न होता है तब राजा दशरथ अपने कुलगुरु वशिष्ठ जी से गौदान करने का आग्रह करते हैं।
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं।देहु धेनु सब भाॅंति बनाईं।।
तब गुरु वशिष्ठ जी ने कामधेनु के समान चार लाख गायों का दान करवाया।
चारि लच्छ बर धेनु मगाईं।काम सुरभि सम सील सुहाईं।।
इस प्रकार से हम देखते हैं कि हमारे पुरातन ग्रंथों में भी गौदान और गौ सेवा का उल्लेख मिलता है।
श्रीराम के बाद भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण अवतार ने तो गौसेवा के उच्चतम शिखर को छुआ है।कवि परमानंद जी कृष्ण की गौभक्ति के ऊपर लिखते हैं-
गोधन पूजें गोधन गावें।
गोधन के सेवक संतत हम, गोधन ही को माथो नावें।।
गोधन मात-पिता गुरु गोधन, देव जानि नित ध्यावें।
गोधन कामधेनु कल्पतरु, गोधन पै माँगे सोई पावें।।
लीलाधर श्रीकृष्ण की गायों के प्रति असीम लगाव था।जब वे छः वर्ष के हुए तो उन्होंने अपनी मां यशोदा से गौचारण के लिए जाने की इच्छा व्यक्त करते हुए कहते हैं-
मैया री! मैं गाय चरावन जैहौं।
तूँ कहि महरि नंदबाबा सों, बड़ो भयो न डरैहौं।।
श्रीदामा लै आदि सखा सब, अरु हलधर सँग लैहौं।
दह्यौ-भात काँवरि भरि लैहौं, भूख लगै तब खैहौं।।
बंसीवट की सीतल छैयाँ खेलत में सुख पैहौं।
परमानंददास सँग खेलौं, जाय जमुनतटन्हैहौं।।
माता यशोदा नन्हें बालकृष्ण की इच्छा को पूरी करने के लिए कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिन से गौचारण की स्वीकृति दे देते हैं।तब से इस तिथि को संपूर्ण भारतवर्ष में गोपाष्टमी पर्व के रूप में मनाया जाता है।भगवान कृष्ण का एक नाम गोपाल गौसेवा के कारण ही पड़ा है।जब इन्द्र ने अपनी पूजा छोड़ कर गोकुल वासियों को गोवर्धन पूजा करते देखा तब उन्होंने पूरे गोकुल को जलमग्न करने का यत्न किया।उस समय भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ अंगुली में गोवर्धन पर्वत को धारण कर पूरे सात दिनों तक गोकुल वासियों और गायों की रक्षा की।अंत में इंद्र ने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और उनको गायों की रक्षा करने के कारण गोविंद नाम दिया।
भगवान श्री कृष्ण ब्रज में जब गाय चारण के लिए जाते थे तो साक्षात कामधेनु भी कृष्ण के हाथों का स्पर्श पाने के लालायित दिखती थीं।किसी कवि ने लिखा है-
कामधेनु तरसत रही मैं न भई व्रज गाय।
राधा लाती दोहनी मोहन दुहते आय।।
लेकिन ये द्वापर युग की बातें हैं जो गौ वंश के लिए स्वर्णिम युग था। वर्तमान कलिकाल में गायों का मान सम्मान जाता रहा है और गाय ही मनुष्यों के लिए भोज्य सामग्री बन गई। गौसेवा के लिए विख्यात भारतभूमि में ही वैधानिक रूप से गौवध होने लगा। शहरीकरण और आधुनिक मशीनीकरण के चलते कृषि कार्य में गौवंश की घटती उपयोगिता ने गौवंश के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। गाएं दर दर भटकने के लिए मजबूर हैं।शहरो के बाद गांवों में भी गौवंश को दुत्कार मिलने लगी है।अगर यही हाल रहा तो गौ दान और गौ सेवा की परंपरा मात्र गीतों और स्मृतियों में ही रह जायेगा।
ईश्वर ने मनुष्य को सर्वोच्च कृति बनाया था ताकि वो सब जीव जंतुओं का ध्यान रखे। लेकिन बिडम्बना है कि मनुष्य अपनी हठ-बुद्धि और लालच के कारण न केवल परमात्मा की रचना को कुरुप बना रहा है वरन् अपने को अमानवीय घोषित कर गौ माता को भी आदर देने में कमी कर दी है। हमें गौवंश की समृद्ध परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
महर्षि वशिष्ठ के शब्दों में–‘नदियां जिस प्रकार समुद्र में जा मिलती हैं, उसी प्रकार सुनहरी श्रृंगोंवाली (सींगों वाली) और दूध देने वाली गौएं मुझे प्राप्त हों। ऐसा हो कि मैं नित्य गौओं को देखूं और गौएं मेरी ओर देखें। कारण, गौएं हमारी हैं और हम गौओं के हैं। गौएं हैं इसीसे हमलोग भी हैं।’


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