तुलसी नर का क्या बडा... समय बड़ा बलवान


 समय कभी किसी को क्षमा नहीं करता।वह अवसर देता है लेकिन कर्म की परिणति भविष्य में क्या होगा वह कर्ता के विवेक आधारित कर्म पर छोड़ देता है।द्वापर युग का एक प्रसंग है।

महाभारत के भीषण रक्तपात के बाद जब कुरुक्षेत्र की भूमि शांत हुई, तो एक नए विनाश की पटकथा लिखी जा रही थी। गांधारी का कृष्ण को दिए शाप और ऋषियों का कोप यदुवंश पर वज्र बनकर गिरा। देखते ही देखते, प्रभास क्षेत्र की धरती अपनों के ही रक्त से लाल हो गई। द्वारका का वैभव, जो कभी देवताओं के लिए भी ईर्ष्या का विषय था, अब डूबने की कगार पर था।

भगवान श्रीकृष्ण ने जान लिया था कि धरा पर उनका अवतार कार्य पूर्ण हो चुका है। देह त्यागने से पूर्व उन्होंने संदेश भेजकर अपने प्रिय सखा अर्जुन को द्वारका बुलाया। जब अर्जुन वहां पहुँचे, तो द्वारका की गलियों में उत्सव की जगह मातम का सन्नाटा था। श्रीकृष्ण जा चुके थे, बलराम ने समाधि ले ली थी और द्वारका के वृद्ध पिता वसुदेव ने भी प्राण त्याग दिए थे।

अपने भौतिक शरीर को नश्वर जानकर लीलाधर ने अर्जुन को बुलाया।

श्रीकृष्ण का अंतिम निर्देश स्पष्ट था: "अर्जुन, द्वारका अब समुद्र में समा जाएगी। यहाँ की स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों को सुरक्षित हस्तिनापुर ले जाओ।"

माधव की आज्ञा पाकर अर्जुन हजारों स्त्रियों और अपार स्वर्ण संपदा के साथ हस्तिनापुर की ओर बढ़ रहे थे। उनके कंधे पर वही गांडीव धनुष था, जिसकी टंकार मात्र से कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना कांप उठती थी। मार्ग में 'पंचनद' (आधुनिक पंजाब) के पास, वहां के लुटेरों (आभीर/भील) की दृष्टि इस विशाल जनसमूह पर पड़ी।

लुटेरों ने देखा कि एक अकेला धनुर्धर इतनी सारी सुंदरी स्त्रियों और धन की रक्षा कर रहा है। उन्होंने अट्टहास किया और अर्जुन के काफिले पर धावा बोल दिया।

अर्जुन ने क्रोध में भरकर जैसे ही अपने तरकश से बाण निकालने चाहे, उनके हाथ कांपने लगे। उन्होंने उन दिव्यास्त्रों का आवाहन करना चाहा, जिनसे उन्होंने इंद्र तक को परास्त किया था, लेकिन... विस्मृति का अंधेरा छा गया।अर्जुन उन मंत्रों को भूल गए जो अस्त्रों को जागृत करते थे।

वरुण देव द्वारा प्रदत्त वह तरकश, जिसके बाण कभी समाप्त नहीं होते थे, उस दिन एक साधारण थैला बनकर रह गया।

वह धनुष जिसे उठाना भी असंभव था, आज अर्जुन के हाथों में एक मामूली लकड़ी के टुकड़े जैसा भारी और बेजान लग रहा था।

समय का खेल देखिए साधारण भील लाठियों और पत्थरों से हमला कर रहे थे और विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मिट्टी की मूरत बना खड़ा था। वे लुटेरे रानियों और धन को लूटकर ले गए, और अर्जुन केवल अपनी विवशता पर आंसू बहाते रह गए।

इस घटना के बाद अपमान और ग्लानि से भरे अर्जुन जब महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुँचे, तो वे फूट-फूटकर रो पड़े। अर्जुन ने कहा— "ऋषिवर! वही बाण हैं, वही गांडीव है और मैं वही अर्जुन हूँ, जिसने कुरुक्षेत्र जीता था। पर आज मैं साधारण दस्युओं से हार गया। मेरी शक्ति कहाँ चली गई?"

व्यास जी ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया:"अर्जुन! शोक मत करो। वह शक्ति कभी तुम्हारी थी ही नहीं।वह तो श्रीकृष्ण की सत्ता थी जो तुममें होकर प्रवाहित हो रही थी। जैसे बिजली चले जाने पर यंत्र निष्प्राण हो जाते हैं, वैसे ही उनके जाने के बाद तुम केवल एक देह मात्र रह गए हो।समय ही व्यक्ति को नायक बनाता है और समय ही उसे शून्य कर देता है।"

 इसी घटना को आधार बनाकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह अमर दोहा लिखा है:

 "तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।

भिलां लूटी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण।।"

 इसका आशय है कि मनुष्य को कभी अपने पद, बल या बुद्धि पर अहंकार नहीं करना चाहिए। अर्जुन जैसा महायोद्धा भी समय के विपरीत होने पर हार गया। हम जो कुछ भी हैं, वह उस ईश्वरीय कृपा और सही समय का परिणाम है।

इस घटना ने पांडवों की आँखें खोल दीं। उन्हें समझ आ गया कि संसार का मोह अब समाप्त हो चुका है। उन्होंने बालक परीक्षित को राजपाट सौंपा और स्वयं 'महाप्रस्थान' यानी हिमालय की अंतिम यात्रा पर निकल गए।

अगर आप भी घमंड के पर्वत शिखर पर खड़े होकर दूसरों को छोटा समझने की भूल कर रहे हैं तो सावधान हो जाइए।समय आपके लिए तैयार खड़ा है...मौका मिलते ही धरातल पर पटकने के लिए...... 

जय श्री कृष्ण 

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