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आस्था हर मुश्किल को आसान बना देती है

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  फोटो गूगल से साभार  पिछले दिनों गुजरात के विश्व विख्यात द्वारिकाधीश मंदिर में महादेव देसाई नाम के एक व्यक्ति ने अपनी 25 गायों के साथ भगवान द्वारिकाधीश के मंदिर की परिक्रमा किया और प्रभु का प्रसाद भी ग्रहण किया।ये अनूठा अवसर था जब गौमाता के साथ एक भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए मंदिर प्रशासन ने अपना नियम बदला और आधी रात को भगवान द्वारिकाधीश के गर्भगृह का पट खुला।चूंकि भगवान द्वारिकाधीश स्वयं गौसेवक थे इसलिए मंदिर प्रशासन ने अपने नियमों को सरल बना दिया और एक भक्त की वांछित मनोकामना पूर्ण हुई। इस अद्भुत घटना के पीछे ईश्वर के प्रति आस्था की बहुत सुंदर तस्वीर है।गौपालक देसाई जी के अनुसार पिछले वर्ष लंपी वायरस के प्रकोप के चलते उनकी सारी गायें बीमार पड़ गईं‌।ऐसी विषम परिस्थिति में देसाई जी ने ईश्वर की शरण लिया और मन ही मन संकल्प लिया कि अगर उनकी गाएं बीमारी के प्रकोप से बच जाती है तो वे उन गायों को लेकर भगवान द्वारिकाधीश के दर्शन को जायेंगे।उन्होंने अपनी परेशानी ईश्वर को सौंप दिया और बीमार गायों के ईलाज में लगे रहे। कुछ समय के पश्चात बीमारी का बुरा दौर खत्म हुआ और उनकी एक भी ग...

सुख कहां है?

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  जनम से लेकर मरण तक इंसान सिर्फ एक ही चीज पाने के लिए संघर्ष करता है।सोचिए क्या?....धन.. सम्मान... स्वास्थ्य....!!जी! सही समझे आप!इसका सही जवाब है सुख। इंसान सिर्फ सुख पाना चाहता है। सुख पाने के तौर तरीके और नजरिया भिन्न भिन्न हो सकते हैं।एक ही तरीका किसी के लिए सही तो किसी के लिए गलत हो सकता है।चोर चोरी करके सुख पाता है। पुलिस चोर को पकड़ कर सुख पाता है।शेर हिरण का शिकार करके सुख पाता है तो वही हिरण शेर से अपने प्राण बचाकर सुख पाता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सुख के अपने अपने मायने है। पिछले दिनों एक अच्छी सोच वाले व्यक्ति से मुलाकात हुई।डेली नीड्स का दुकान चलाते हैं।खाने पीने की कई प्रकार की चीजें रखते हैं। खासकर बच्चों की मनपसंद चीजें केक,चाकलेट्स, बिस्कुट आदि। चूंकि दुकानदार है इसलिए मुनाफे की बात का हमेशा ध्यान रखते हैं।लेकिन बच्चों को लेकर उनका नजरिया थोड़ा अलग है। उन्होंने बताया कि वे बच्चों को कभी भी निराश नहीं करते।चाहे उनके पास पसंद की चीजें खरीदने लायक पैसे हों या नहीं।वो बताते हैं कि कभी बच्चे शौक से केक खरीदने आते हैं जो आमतौर पर डेढ़ सौ के आसपास की कीमत की रहती ...

अजब समय के पांव....

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  समय की यात्रा अनवरत जारी रहती है।समय किसी के लिए ना कभी रुका था,ना रुका है और ना ही रुकेगा।बचपन में स्कूल की किताबें अरुचिकर लगती है।संभवतः आप में से भी कोई सहमत हो।उस समय संत, कवियों के दोहे,सीख वाली कहानियां और सूक्तियां पढ़कर खिन्नता होती थी।हालांकि ये सब मूल्यवान तब भी थी,अब भी है और भविष्य में भी होगा।‌लेकिन बचपन में पढ़ी बहुत सी बातों का मर्म अब समझ में आ रहा है। स्कूली किताबों के पाठ्यक्रम में शामिल रहीम और कबीर के दोहे उस समय हमारी बालबुद्धि में समझ के बाहर थे।सोचते थे इन सबसे कब मुक्ति मिले?कब किताबों का ये जंजाल छूटे! कब बड़े हों!!! कबीर का एक दोहा याद आ रहा है- काल करे सो आज कर,आज करे सो अब!! पल में परलय होएगी,बहुरि करेगा कब!! मतलब ये है कि जो काम करना है वो तत्काल करनी चाहिए। बाद में शायद वक्त उस काम के लिए वक्त ही ना दे तो।कवि प्रदीप का लिखा एक गीत भी खूब चलता था।कभी उलटे कभी सीधे पड़ते अजब समय के पांव...कभी धूप तो कभी छांव.... सच में!कितनी गहरी बात है।समय कब बीत जायेगा या समय कब अपना मिजाज बदल ले कुछ कह नहीं सकते। हममें से ज्यादातर ने आज का काम कल पर टालने की आदत बन...