सोमवार, 13 जुलाई 2020

बातें पेट्रोमेक्स की....


 समय और तकनीक के बीच में भी अजीब प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।तकनीक हर दम समय के साथ आधुनिक होती जाती है और समय हर बार तकनीकी आविष्कार को पुरानी करती जाती है।जब तकनीकी आविष्कारें समय के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती तो संग्रहालय की शोभा बन जाती है या कूड़े के ढेर का कचरा।एक दौर था,जब हमारे देश के एक बड़े हिस्से का विद्युतीकरण नहीं हुआ था,तब अधिकांश घरों में मिट्टी तेल से जलनेवाली ढीबरी और लालटेन घरों को रौशन किया करती थी। कम उजाले वाले इन साधनों से घर का काम तो चल जाता था। लेकिन जब कोई बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम करना होता था तब काम आती थी पेट्रोमेक्स!!
       बचपन में पेट्रोमेक्स को देखकर हमें लगता था कि ये लालटेन का बड़ा भाई होगा।इसका भी एक शान होता था,ठाठ होती थी।इसको जलाने के लिए एक जानकार आदमी की जरूरत होती थी।जो हवा के दबाव और मेंटल के बारे में जानकारी रखता था। पेट्रोमेक्स की बाती के तौर पर लगने वाले मेंटल इतना नाजुक होता था कि जरा सी गलती पर फट जाता।जब भी पेट्रोमेक्स में मेंटल बदलने का समय आता, सामनेवाला बंदा एक दो एक्स्ट्रा ही लेकर आता था।हर बार एक दो मेंटल का फटना लगभग तय होता था।जो आदमी पेट्रोमेक्स को जलाना जानता था,उसकी बड़ी इज्जत हुआ करती थी ऐसे मौके पर, बिल्कुल गोधन की तरह।अब ये गोधन कौन है?आगे बताऊगा।
    वैसे पेट्रोमेक्स को हम लोग गैस बोलते थे।अजूबा ही चीज थी बचपन के दिनों में हमारे लिए।छोटा सा चीज एकदम सफेद उजाला दिया करता था,आज के सीएफएल बल्ब की तरह और आवाज भी आती थी सन्न...सन्न की जलते तक।आम तौर पर गांवों में किसी धनी व्यक्ति के यहां ही पेट्रोमेक्स होती थी।ज्यादातर शादी, गणपति या रामलीला,नाचा वगैरह के समय पेट्रोमेक्स किराए से लाई जाती थी।
 उस समय केरोसिन सस्ती थी।शायद सवा रू लीटर के आसपास। पेट्रोमेक्स का किराया भी बीस रु के आसपास हुआ करती थी। कुछ अजीब किस्म के लोग मेंटल की राख भी खा लिया करते थे।पर क्यों खाते थे ये उस समय भी मेरे लिए रहस्य की बात थी और आज भी है। पेट्रोमेक्स की बात ही अलग थी।जो दुकानदार पेट्रोमेक्स किराए पे देता था वो बहुत सी पेट्रोमेक्स को अपने दुकान के सामने लटका के रखता था।जिसे देखकर हमारी बालबुद्धि सोचती थी कि दुनिया का सबसे अमीर आदमी यही होगा।
   ऊपर मैने गोधन का जिक्र किया था।असल में ये फणेश्वरनाथ रेणु जी की कहानी "पंचलैट"के एक पात्र का नाम है।रेणुजी ने एक कहानी ही पेट्रोमेक्स यानि पंचलैट पर लिख डाली थी। भोजपुरी में पेट्रोमेक्स को पंचलैट या पंचलाइट कहा जाता था। कहानी बड़ी मजेदार है।इस कहानी का नायक गोधन गांव की एक लड़की मुनरी से प्रेम करता था और उसे देखकर कुछ फिल्मी गाने भी गा लेता था।तब इस बात की शिकायत उसकी मां पंचायत में कर देती है।फिर पंचायत बैठती है और दण्ड स्वरूप गोधन का हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है मतलब उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है।कुछ समय के बाद उसी जाति विशेष के लोगों के द्वारा सार्वजनिक उपयोग के लिए पेट्रोमेक्स खरीदा जाता है।सब बड़े उत्साह से ले आते हैं लेकिन जब उसे जलाने का समय आता है,सब एक दूसरे का मुंह ताकने लगते हैं।क्योंकि किसी को भी पेट्रोमेक्स जलाना नहीं आता था।सबके लिए ये शर्मिंदगी वाली बात हो जाती है।किसी दूसरे समाज के आदमी द्वारा पेट्रोमेक्स का जलाया जाना बेहद शर्मनाक बात होने वाली थी।जब ये बात मुनरी को पता चलती है तो वह गोधन का नाम अपनी सहेली को सुझाती है क्योंकि उसके समाज में पेट्रोमेक्स का वही एक जानकार था।सहेली के माध्यम से बात मुखिया तक पहुंचती है।फिर उस पर विचार विमर्श होता है और अंततः गोधन की सामाजिक बहिष्कार को खत्म कर दिया जाता है और उसे पेट्रोमेक्स जलाने के लिए बुलाया जाता है।गोधन पेट्रोमेक्स यानि पंचलैट जला देता है और उसको फिल्मी गीत गाने की छूट मिल जाती है।उसका सामाजिक रूतबा बढ़ जाता है।इस कहानी पर शायद फिल्म भी आई थी। यूट्यूब में तलाशें,शायद मिल जाए।नदिया के पार फिल्म के शादी वाले दृश्य में भी पेट्रोमेक्स को दिखाया गया है।
  पेट्रोमेक्स का संबंध छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकनाट्य नाचा से भी रहा है। पेट्रोमेक्स के आने तक छत्तीसगढ़ में खड़े साज का नाचा प्रचलित था। जिसमें कलाकार मशाल की रौशनी में खड़े होकर चिकारा,तबला और खंजेरी के स्वर में नाचा की प्रस्तुति देते थे।सन् 1929 के आसपास छत्तीसगढ़ नाचा के पितामह दाऊ दुलारसिंह मंदराजी के द्वारा नाचा को संगठित किया गया। सर्वप्रथम दाऊ मंदराजी ने नाचा में मशाल के स्थान पर पेट्रोमेक्स का प्रयोग किया।ये सन् 1936 के आसपास की बात है।सन् 1940 के आते-आते लगभग चार पेट्रोमेक्स का प्रयोग नाचा में होने लगा और नाचा का नवीन स्वरूप सामने आया।
मेरी जानकारी अनुसार सन् 1996 तक केरोसिन वाले पेट्रोमेक्स का चलन था। धीरे-धीरे देश में विद्युतीकरण का दायरा बढ़ा और इसका चलन घटने लगा।तब तक सिलेंडरवाली पेट्रोमेक्स भी आ गई थी।लेकिन वो ज्यादा नहीं चल पाई।
फिल्म नदिया के पार के एक दृश्य में पेट्रोमेक्स

रविवार, 5 जुलाई 2020

सदाबहार...नदिया के पार


आज बहुत सालों के बाद नदिया के पार फिल्म देखी।बचपन के दिनों में विडिय में इस फिल्म को बहुत बार देखा था।जब कभी भी गांव में कलर टीवी और वीसीपी आया करती थी तब हर पांच बार में से तीन बार ये फिल्म जरूर आती थी।बचपन की स्मृतियां ताजा हो गई।ये फिल्म ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है और फिल्म की भाषा अवधी हिन्दी है।और गांव के आदमी को गांव से आत्मीय लगाव होता है।वह गांव से जुड़ी चीजों  से सहजता से जुड़ जाता है।इस फिल्म की भाषा हमारी मातृभाषा छत्तीसगढी से बहुत मेल खाती है।जैसे पहुना,भौजी,आदि।इस फिल्म के प्रति छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में जुड़ाव संभवतः फिल्म के ग्रामीण परिवेश से हमारे छत्तीसगढ़ अंचल के ग्रामों से साम्यता होना हो सकता है। फिल्म में ग्रामीण जनजीवन में आज से तीस चालीस बरस पहले जो चीजें मिला करती थी या यूं कहें की गांव की पहचान हुआ करती थी वो सारी चीज़ें दिखाई गई है।मसलन लकड़ी की खाट,बांस की सीढ़ी, लालटेन,बटलोही(खाना पकाने का पात्र),हल, बैलगाड़ी,पटसन की डोरी आंटने का ढेरा, कुआं, मिट्टी के कवेलू(खपरा) वाली छत, मिट्टी से बने घर,पठेरा(आला) आदि। फिल्म में चित्रित शादी के रस्मों रिवाज भी छत्तीसगढ़ की वैवाहिक रस्मों से मिलती जुलती है। फिल्म की भाषा लगभग-लगभग छत्तीसगढ़ी बोली का स्पर्श देती है।बचपन में फिल्म की कथावस्तु भले ही समझ में नहीं आती थी पर गीत संगीत और फिल्म के दृश्यों को देखकर मजा आता था। फिल्म थी ही ऐसी जो मंत्रमुग्ध कर देती थी।वैसे फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में स्थित विजयपुर गांव में हुई थी।आज भी फिल्म से संबंधित कुछ स्थल वहां मौजूद है जिसे आप यूट्यूब में देख सकते हैं।
 ये फिल्म सन् 1982 में प्रदर्शित हुई थी।तब तो हमारा जन्म भी नहीं हुआ था।जब हम नौ दस साल के हुए तब विडियो कैसेट से फिल्म को गांव में देखा था। पारिवारिक और साफ सुथरी फिल्म की परिभाषा इस फिल्म से दी जा सकती है। फिल्म में रवींद्र  जैन का गीत और संगीत था जिसकी मधुरता आज भी कानों में रस घोलती है।जसपाल सिंह,हेमलता और सुरेश वाडेकर के मधुर कंठ से निकले गीत आज भी सदाबहार हैं।मुझे तो इस फिल्म के सारे गाने बहुत पसंद हैं।कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया और जब तक पूरे ना हो फेरे सात का आज भी कोई टक्कर नहीं है।जब सुनो तब लाजवाब।इस फिल्म में एक गीत है हम दोनों में दोनों खो गए। सुरेश वाडेकर और हेमलता की आवाज में।इस गीत में एक पंक्ति आती है-बूढे बरगद की माटी को शीश धरले..दीपासत्ती को सौ सौ परनाम कर ले।इस गीत में आए दीपासत्ती के बारे में इस फिल्म के मूल उपन्यास में बताया गया है।वो भी इसे गुंजा ही बताती है चंदन को।वास्तव में दीपासत्ती एक चौदह साला की बालिका रहती है जिसकी शादी एक पैंतालीस साल के बुजुर्ग से कराया जा रहा था।जब दीपा नाम की वो बालिका चुपके से वर को देख लेती है तो घर से भाग जाती है और बरगद के पेड़ में फांसी लगाकर जान दे देती है और तब से वह एक देवी के रूप में स्थापित हो जाती है।उसके बाद जब भी गांव में कोई विवाह का प्रसंग आता वर-वधू दीपासत्ती का आशीर्वाद लेने जाते।ऐसा कुछ कुछ तो हमारे यहां भी होता है।हर गांव की अपनी-अपनी किंवदंती और दंतकथाएं हुआ करती है।कुछ दुर्घटना जन्य स्थान लोक श्रद्धा का केन्द्र बन जाया करते हैं।जैसे हमारे यहां के कचना धुरवा महराज की लोकगाथा।नदिया के पार फिल्म के गीतों का एक एक शब्द और संगीत अद्भुत है।शायद इसी कारण फिल्म के प्रदर्शन के सैंतीस साल बाद भी नदिया के पार फिल्म के गीतों का जादू बरकरार है।इस फिल्म में मुख्य भूमिका सचिन,साधना सिंह,मिताली,इंदर कुमार,लीला मिश्रा और राम मोहन ने निभाई थी। फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश में स्थित बलिहार और चौबेछपरा गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित है जहां फिल्म के नायक चंंदन और नायिका गुंंजा के भैय्या और दीदी की शादी होती है।शादी के कुछ महीनों बाद अपनी दीदी के प्रसवास्था के दौरान देखभाल के लिए नायिका का अपने दीदी के ससुराल में आगमन होता है।जहां फिल्म के नायक चंदन से गुंंजा से आपसी नोंकझोंक के दौरान प्रेम का प्रस्फुटन होता है और कहानी में अनेक मोड़ आते हैं।प्रसव के कुछ समय बाद दुर्घटना वश नायिका के दीदी की मौत हो जाती है। घटनाक्रम तेेेजी से बदलता है और  परिस्थितियां ऐसी निर्मित होती है कि फिल्म की नायिका को अपनी दीदी के देहांत के बाद अपने जीजा से शादी करने की नौबत आ जाती है। लेेकिन बहुत से भावनात्मक मोड़ से गुजरते हुए फिल्म अंततः चन्दन और गुुंजा की शादी पर खतम होती है। फिल्म का हैप्पी एंडिंग होता हैं।
   इसी कहानी को आधार बनाकर इसका शहरीकरण करते हुए इस फिल्म का रिमेक राजश्री प्रोडक्शन द्वारा सन् 1994 में पुनः प्रस्तुत किया गया-हम आपके हैं कौन नाम से।इस बार फिल्म में सलमान खान,माधुरी दीक्षित, रेणुका सहाणे,मोहनीश बहल और अनुपम खेर जैसे सितारे थे।नदिया के पार की तरह इस फिल्म को भी दर्शकों ने सराहा और इस फिल्म ने कामयाबी के झंडे गाड़े। फिल्म के गीत संगीत को भी सराहा गया।इस फिल्म के बाद सलमान खान राजश्री प्रोडक्शन के स्थायी कलाकार बन गए और राजश्री प्रोडक्शन की बहुत से फिल्मों में नजर आए।हम आपके हैं कौन फिल्म के बाद राजश्री प्रोडक्शन और सूरज बड़जात्या पारिवारिक फिल्म का प्रतीक बन गए।बाद के वर्षों में हम साथ-साथ हैं,विवाह,एक विवाह ऐसा भी और प्रेम रतन धन पायो जैसी फिल्मों का निर्माण करके राजश्री प्रोडक्शन ने अपनी परिपाटी को निभाया भी।ये तो हुई फिल्म की बात। लेकिन अब बात करते हैं फिल्म की मूल पटकथा यानि उपन्यास की।नदिया के पार फिल्म वास्तव में एक साहित्यिक रचना पर आधारित है।
 ये फिल्म केशव प्रसाद मिश्र जी द्वारा लिखित उपन्यास "कोहबर की शर्त" की मूल कहानी पर आधारित है जिसमें थोड़ी सी फेरबदल की गई है। फिल्म की कहानी में फिल्म का अंत सुखांत होता है जबकि उपन्यास की मूल कहानी का अंत दुखद है। फिल्म में कहानी नायक नायिका के प्रेम और बलिदान पर आधारित है जबकि उपन्यास में नायिका का बलिदान ही सर्वस्व प्रतीत होता है। उपन्यास की नायिका गुंजा ही मूल पात्र है जिसके इर्द-गिर्द उपन्यास की कहानी घूमती है। फिल्म में जहां नायक नायिका का मिलन होता हैं वहीं उपन्यास में गुंजा की पीड़ा का अंतहीन सफर दिखाई देती है।नियति के हाथों की कठपुतली बनकर गुंजा पल-पल छली जाती है। उपन्यास पढ़ते समय गुंजा और चंदन की व्यथा पाठक को टीस पहुंचाते हैं। आंखों से आंसू झरने लगते हैं।
उपन्यास में गुंजा के त्याग और चंदन के मौन का कोई विकल्प नहीं है। कदम कदम पर गुंजा के ऊपर दुखों का पहाड़ टूटता है जिसका सामना करते करते वो स्वयं टूट जाती है। उपन्यास में गुंजा एक अल्हड़ ग्रामीण बाला,फिर एक प्रेमिका,फिर पत्नी और अंत में एक विधवा के रूप में दुखों को झेलते झेलते मृत्यु को प्राप्त होती है।जब आप उपन्यास पढ़ना शुरू करेंगे तो कहानी दिमाग में चल चित्र के भांति चलते ही रहता है।गुंजा का चरित्र बलिदान की पराकाष्ठा है।अपनी दीदी की मौत के बाद उसके बच्चे के लालन-पालन के लिए परिस्थितिवश वह अपने जीजा की पत्नी बन जाती है।जिस गुंजा को चंदन पत्नी के रुप में देखना चाहता था वो उसकी भौजाई के रुप में आ जाती है।चंदन के प्रति अपने पवित्र प्रेम को गुंजा ताउम्र रखे रहती है लेकिन मर्यादा के साथ।अपार कष्ट झेलते दोनों अपनी-अपनी मर्यादा में रहकर अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। उपन्यास में नारी के त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति है गुंजा।उसका रोम रोम बलिदान के लिए लालायित जान पड़ता है।चंदन का चरित्र भी बलिदान की पराकाष्ठा है। आमतौर पर जब कोई स्त्री  या पुरुष शरीर से अशक्त हो जाता है तो समाज में स्त्रियां ही सेवा  सुश्रुषा करती है।लेकिन इस उपन्यास में एक पुरुष निश्छल भाव से नारी की सेवा सुश्रुषा करता दिखाई देता है।शरीर से अशक्त गुंजा की दिनचर्या को चंदन संपादित करवाता है।अंत में गुंजा शरीर त्याग देती है और गंगा मैय्या की लहरों में समा जाती है।इस उपन्यास के रचनाकार केशव प्रसाद मिश्र जी की लेखनी को प्रणाम है।ग्रामीण पृष्ठभूमि की इस रचना में आंचलिकता भरपूर है।साथ है देह से परे अलौकिक पवित्र प्रेम का दर्शन और एक स्त्री का अतुल्य बलिदान!!समय मिले तो जरूर पढ़ें-कोहबर की शर्त।

चित्र-साभार राजश्री प्रोडक्शन



शनिवार, 4 जुलाई 2020

लाली बंगला


छत्तीसगढ़ जनजाति बाहुल्य राज्य है। सन् 2011 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक राज्य के कुल जनसंख्या में एक तिहाई जनसंख्या जनजातियों की है।हमारे प्रदेश में कुल 42 जनजातियां पाई जाती है।जिनकी अपनी विशिष्ट जीवनशैली और रहन-सहन है।वन संपदा से भरपूर छत्तीसगढ़ में सीधे सरल स्वभाव वाले विभिन्न जनजाति समूह छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा में आदिकाल से निवासरत हैं। दुनिया की रेलमपेल से दूर सुदूर वन प्रांतर में निवासरत होती है अधिकांश जनजातियां।दिखावे और ढकोसला से दूर प्रकृति के सामिप्य के संग अपने में मगन।इस भागदौड़ की जिंदगी में बड़े बड़े पैसेवालों के पास भी बंगला नहीं हैं ऐसे में न्यूनतम जरूरत के साथ अपनी गुजर-बसर करने वाले किसी जनजातिय समूह के पास आप बंगला की कल्पना कर सकते हैं।शायद बिल्कुल भी नहीं!!! लेकिन आप मानें या ना मानें प्रकृतिपुत्रों के पास भी होता है उनका बंगला...लाली बंगला।
   बंगला शब्द सुनने से ही किसी विशाल अट्टालिका का बोध होता है और सामान्यतः ऐसे भवनों के लिए ही बंगला शब्द का प्रयोग किया जाता है।बंगले आमतौर पर आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों के पास ही होता है।जैसे हमारे फिल्म स्टारों के बंगले प्रतीक्षा,जलसा,मन्नत, आशीर्वाद आदि-आदि इत्यादि। धनकुबेरों के संदर्भ में बंगला की बात समझ आती है लेकिन आर्थिक रूप से विपन्न जनजातिय समूह  के पास बंगला की बात थोड़ी अजीब लगती है।लेकिन है ये सोला आना सच!!हमारे छत्तीसगढ़ में रहनेवाली एक विशिष्ट जनजाति के पास बंगले की बात भी सच है।चलिए आगे पढ़ते और समझते हैं।
   मैंने जिस बंगले की बात ऊपर की है वो किसी बड़ी सी भव्य भवन की नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में मिलने वाली भुंजिया जनजाति के रसोईघर के बारे में की है।ये विशिष्ट जनजाति अपने दृढ़ सामाजिक नियमों और रीति-रिवाजों के लिए जानी जाती है।इस जनजाति को शासन ने विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा दिया है और इनके विकास के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।ये जनजाति छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले  के छुरा,गरियाबंद व मैनपुर विकासखंड ,धमतरी जिले के सिहावा नगरी क्षेत्र और महासमुंद के बागबाहरा विकासखंड में निवास करती है।ये जनजाति चिंडा,चोकटिया या चौखुटिया और खोल्हारजिहा उपजाति में विभक्त है। जिसमें मैनपुर क्षेत्र में चिंडा भुंजिया, गरियाबंद छुरा क्षेत्र में चोकटिया भुंजिया और महासमुंद के बागबाहरा विकासखंड अंतर्गत खल्लारी क्षेत्र में खोल्हारजिहा भुंजिया जनजाति निवासरत है।
    यूं तो उपरोक्त सभी उपजाति में मूल भुंजिया रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है लेकिन विशेष रूप से चोकटिया भुंजिया अपने विशिष्ट सांस्कृतिक प्रतीक लाली बंगला के लिए जाना जाता है।वैसे तो बनावट के आधार पर प्रकृति प्रदत्त सामग्री से ही इस बंगले का निर्माण किया जाता है लेकिन इस लाली बंगले के नियमों के कारण इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।इस बंगले का निर्माण छत्तीसगढ़ी कवि मीर अली मीर की पंक्तियों के जैसे ही होता है-माटी के भितिया,खदर के छानी गोबर पानी पाय।मतलब लाली बंगला मिट्टी की दीवार,घास फूस की छत और गोबर से लीपकर बनाई जाती है। दीवारों को लाल रंग देने के लिए पहले लाल मुरूम को घोलकर पोता जाता था।बाद में सहूलियत के लिए गेरू से पुताई की जाने लगी।इस रसोईघर के निर्माण के दौरान भोजन पकाने में सहायक सभी सामग्री और यंत्रों को रखने के लिए स्थान और भोजन करने के लिए पर्याप्त स्थान का भी ध्यान रखा जाता है।जब हालर मिल नहीं हुआ करती थी तब ढेंकी और जांता भी लाली बंगला का अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थी।अब समय के साथ ये विलुप्त होते जा रहे हैं।कोई भी जनजाति वर्ग अब आधुनिकता से बच नहीं सकता तो स्वाभाविक रूप से इस जनजाति के ऊपर भी प्रभाव अवश्य पड़ेगा। शासन के योजना के तहत अब पक्के मकान का निर्माण किया जा रहा है। फिर भी चोकटिया भुंजिया जनजाति द्वारा लाली बंगला को संरक्षित रखने का कार्य किया जा रहा है।
    सन् 1924 में प्रकाशित रायपुर गजेटियर में भुंजिया जनजाति की विशेषता को उल्लेखित किया गया है। जिसमें बताया गया है कि रायपुर जिले में भुंजिया जनजाति पाई जाति है जिसकी झोपड़ी को ब्राम्हण भी छू दे तो वह अपवित्र हो जाती है और वो उसको जला डालते हैं।भोजन पकाने के मामले में तो ये कान्यकुब्जों के भी कान काटते हैं।
 लाली बंगला की बहुत सी विशिष्टता है जैसे कि भुंजिया जाति के अलावा कोई उसे छू भी नहीं सकता और अन्य जाति वर्ग का लाली बंगला में प्रवेश पूर्णतः निषेध रहता है।भूलवश भी अगर कोई अन्य जातिवर्ग का व्यक्ति हाथ लगा दे तो उसको तत्काल आग लगा दी जाती है और नये लाली बंगला का निर्माण किया जाता है।रजस्वला स्त्रियां भी इस बंगले में प्रवेश नहीं कर सकती।इस जनजाति में कांड विवाह का नियम होता है।जिस पर आगे किसी पोस्ट पर चर्चा करेंगे।कांड विवाह के पश्चात बालिका लाली बंगला में ही भोजन ग्रहण करती है। लेकिन जब लड़की की शादी हो जाती है और वह ससुराल चली जाती है तब वह अपने मायके के लाली बंगला में प्रवेश नहीं कर सकती। जूता-चप्पल पहनकर भी इस बंगला में नहीं घुस सकते।
  अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जिस शुद्धता और पवित्रता का ध्यान रसोईघर में इस जनजाति के द्वारा रखा जाता है वैसा तो बड़े से बड़े तथाकथित उच्च वर्गों में देखने को नहीं मिलता।जिस प्रकार बंगला बेशकीमती होता है उसी प्रकार भुंजिया जनजाति के लिए उनका रसोईघर अनमोल होता है।शायद इसीलिए उन्होंने इसका नामकरण लाली बंगला किया होगा।इस जनजाति की बहुत सी विशिष्टताओं पर अगले पोस्ट में जरूर चर्चा करूंगा।इस पोस्ट को लिखने में मेरे मित्र द्वय रामनाथ मरकाम और शत्रुहन नेताम का भी सहयोग प्राप्त हुआ है। उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया है। दोनों को हृदय से धन्यवाद।इस लेख को लिखने के दौरान मुझे लोकरंग अर्जुंदा का एक प्रसिद्ध गीत याद आ रहा है-लाली बंगला में गा,मोर जोड़ीदार करले करार लाली बंगला में.....
पर ये लाली बंगला शायद मेरे लेख वाले लाली बंगला से अलग है।क्योंकि जिस लाली बंगला की बात मैंने की है वो एक देवालय है, जहां पवित्र भोजन बनता है।प्रेम की खिचड़ी नहीं पकती।तो फिर मिलेंगे अगले पोस्ट में...जय-जोहार


   

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज ...