बातें पेट्रोमेक्स की....
समय और तकनीक के बीच में भी अजीब प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।तकनीक हर दम समय के साथ आधुनिक होती जाती है और समय हर बार तकनीकी आविष्कार को पुरानी करती जाती है।जब तकनीकी आविष्कारें समय के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती तो संग्रहालय की शोभा बन जाती है या कूड़े के ढेर का कचरा।एक दौर था,जब हमारे देश के एक बड़े हिस्से का विद्युतीकरण नहीं हुआ था,तब अधिकांश घरों में मिट्टी तेल से जलनेवाली ढीबरी और लालटेन घरों को रौशन किया करती थी। कम उजाले वाले इन साधनों से घर का काम तो चल जाता था। लेकिन जब कोई बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम करना होता था तब काम आती थी पेट्रोमेक्स!! बचपन में पेट्रोमेक्स को देखकर हमें लगता था कि ये लालटेन का बड़ा भाई होगा।इसका भी एक शान होता था,ठाठ होती थी।इसको जलाने के लिए एक जानकार आदमी की जरूरत होती थी।जो हवा के दबाव और मेंटल के बारे में जानकारी रखता था। पेट्रोमेक्स की बाती के तौर पर लगने वाले मेंटल इतना नाजुक होता था कि जरा सी गलती पर फट जाता।जब भी पेट्रोमेक्स में मेंटल बदलने का समय आता, सामनेवाला बंदा एक दो एक्स्ट्रा ही लेकर आता था।हर बार एक दो मेंटल क...