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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बातें पेट्रोमेक्स की....

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 समय और तकनीक के बीच में भी अजीब प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।तकनीक हर दम समय के साथ आधुनिक होती जाती है और समय हर बार तकनीकी आविष्कार को पुरानी करती जाती है।जब तकनीकी आविष्कारें समय के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती तो संग्रहालय की शोभा बन जाती है या कूड़े के ढेर का कचरा।एक दौर था,जब हमारे देश के एक बड़े हिस्से का विद्युतीकरण नहीं हुआ था,तब अधिकांश घरों में मिट्टी तेल से जलनेवाली ढीबरी और लालटेन घरों को रौशन किया करती थी। कम उजाले वाले इन साधनों से घर का काम तो चल जाता था। लेकिन जब कोई बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम करना होता था तब काम आती थी पेट्रोमेक्स!!        बचपन में पेट्रोमेक्स को देखकर हमें लगता था कि ये लालटेन का बड़ा भाई होगा।इसका भी एक शान होता था,ठाठ होती थी।इसको जलाने के लिए एक जानकार आदमी की जरूरत होती थी।जो हवा के दबाव और मेंटल के बारे में जानकारी रखता था। पेट्रोमेक्स की बाती के तौर पर लगने वाले मेंटल इतना नाजुक होता था कि जरा सी गलती पर फट जाता।जब भी पेट्रोमेक्स में मेंटल बदलने का समय आता, सामनेवाला बंदा एक दो एक्स्ट्रा ही लेकर आता था।हर बार एक दो मेंटल क...

सदाबहार...नदिया के पार

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आज बहुत सालों के बाद नदिया के पार फिल्म देखी।बचपन के दिनों में विडिय में इस फिल्म को बहुत बार देखा था।जब कभी भी गांव में कलर टीवी और वीसीपी आया करती थी तब हर पांच बार में से तीन बार ये फिल्म जरूर आती थी।बचपन की स्मृतियां ताजा हो गई।ये फिल्म ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है और फिल्म की भाषा अवधी हिन्दी है।और गांव के आदमी को गांव से आत्मीय लगाव होता है।वह गांव से जुड़ी चीजों  से सहजता से जुड़ जाता है।इस फिल्म की भाषा हमारी मातृभाषा छत्तीसगढी से बहुत मेल खाती है।जैसे पहुना,भौजी,आदि।इस फिल्म के प्रति छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में जुड़ाव संभवतः फिल्म के ग्रामीण परिवेश से हमारे छत्तीसगढ़ अंचल के ग्रामों से साम्यता होना हो सकता है। फिल्म में ग्रामीण जनजीवन में आज से तीस चालीस बरस पहले जो चीजें मिला करती थी या यूं कहें की गांव की पहचान हुआ करती थी वो सारी चीज़ें दिखाई गई है।मसलन लकड़ी की खाट,बांस की सीढ़ी, लालटेन,बटलोही(खाना पकाने का पात्र),हल, बैलगाड़ी,पटसन की डोरी आंटने का ढेरा, कुआं, मिट्टी के कवेलू(खपरा) वाली छत, मिट्टी से बने घर,पठेरा(आला) आदि। फिल्म में चित्रित शादी के रस्मों ...

लाली बंगला

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छत्तीसगढ़ जनजाति बाहुल्य राज्य है। सन् 2011 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक राज्य के कुल जनसंख्या में एक तिहाई जनसंख्या जनजातियों की है।हमारे प्रदेश में कुल 42 जनजातियां पाई जाती है।जिनकी अपनी विशिष्ट जीवनशैली और रहन-सहन है।वन संपदा से भरपूर छत्तीसगढ़ में सीधे सरल स्वभाव वाले विभिन्न जनजाति समूह छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा में आदिकाल से निवासरत हैं। दुनिया की रेलमपेल से दूर सुदूर वन प्रांतर में निवासरत होती है अधिकांश जनजातियां।दिखावे और ढकोसला से दूर प्रकृति के सामिप्य के संग अपने में मगन।इस भागदौड़ की जिंदगी में बड़े बड़े पैसेवालों के पास भी बंगला नहीं हैं ऐसे में न्यूनतम जरूरत के साथ अपनी गुजर-बसर करने वाले किसी जनजातिय समूह के पास आप बंगला की कल्पना कर सकते हैं।शायद बिल्कुल भी नहीं!!! लेकिन आप मानें या ना मानें प्रकृतिपुत्रों के पास भी होता है उनका बंगला...लाली बंगला।    बंगला शब्द सुनने से ही किसी विशाल अट्टालिका का बोध होता है और सामान्यतः ऐसे भवनों के लिए ही बंगला शब्द का प्रयोग किया जाता है।बंगले आमतौर पर आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों के पास ही होता है।जैसे हमारे फि...