समय और तकनीक के बीच में भी अजीब प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।तकनीक हर दम समय के साथ आधुनिक होती जाती है और समय हर बार तकनीकी आविष्कार को पुरानी करती जाती है।जब तकनीकी आविष्कारें समय के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती तो संग्रहालय की शोभा बन जाती है या कूड़े के ढेर का कचरा।एक दौर था,जब हमारे देश के एक बड़े हिस्से का विद्युतीकरण नहीं हुआ था,तब अधिकांश घरों में मिट्टी तेल से जलनेवाली ढीबरी और लालटेन घरों को रौशन किया करती थी। कम उजाले वाले इन साधनों से घर का काम तो चल जाता था। लेकिन जब कोई बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम करना होता था तब काम आती थी पेट्रोमेक्स!!
बचपन में पेट्रोमेक्स को देखकर हमें लगता था कि ये लालटेन का बड़ा भाई होगा।इसका भी एक शान होता था,ठाठ होती थी।इसको जलाने के लिए एक जानकार आदमी की जरूरत होती थी।जो हवा के दबाव और मेंटल के बारे में जानकारी रखता था। पेट्रोमेक्स की बाती के तौर पर लगने वाले मेंटल इतना नाजुक होता था कि जरा सी गलती पर फट जाता।जब भी पेट्रोमेक्स में मेंटल बदलने का समय आता, सामनेवाला बंदा एक दो एक्स्ट्रा ही लेकर आता था।हर बार एक दो मेंटल का फटना लगभग तय होता था।जो आदमी पेट्रोमेक्स को जलाना जानता था,उसकी बड़ी इज्जत हुआ करती थी ऐसे मौके पर, बिल्कुल गोधन की तरह।अब ये गोधन कौन है?आगे बताऊगा।
वैसे पेट्रोमेक्स को हम लोग गैस बोलते थे।अजूबा ही चीज थी बचपन के दिनों में हमारे लिए।छोटा सा चीज एकदम सफेद उजाला दिया करता था,आज के सीएफएल बल्ब की तरह और आवाज भी आती थी सन्न...सन्न की जलते तक।आम तौर पर गांवों में किसी धनी व्यक्ति के यहां ही पेट्रोमेक्स होती थी।ज्यादातर शादी, गणपति या रामलीला,नाचा वगैरह के समय पेट्रोमेक्स किराए से लाई जाती थी।
उस समय केरोसिन सस्ती थी।शायद सवा रू लीटर के आसपास। पेट्रोमेक्स का किराया भी बीस रु के आसपास हुआ करती थी। कुछ अजीब किस्म के लोग मेंटल की राख भी खा लिया करते थे।पर क्यों खाते थे ये उस समय भी मेरे लिए रहस्य की बात थी और आज भी है। पेट्रोमेक्स की बात ही अलग थी।जो दुकानदार पेट्रोमेक्स किराए पे देता था वो बहुत सी पेट्रोमेक्स को अपने दुकान के सामने लटका के रखता था।जिसे देखकर हमारी बालबुद्धि सोचती थी कि दुनिया का सबसे अमीर आदमी यही होगा।
ऊपर मैने गोधन का जिक्र किया था।असल में ये फणेश्वरनाथ रेणु जी की कहानी "पंचलैट"के एक पात्र का नाम है।रेणुजी ने एक कहानी ही पेट्रोमेक्स यानि पंचलैट पर लिख डाली थी। भोजपुरी में पेट्रोमेक्स को पंचलैट या पंचलाइट कहा जाता था। कहानी बड़ी मजेदार है।इस कहानी का नायक गोधन गांव की एक लड़की मुनरी से प्रेम करता था और उसे देखकर कुछ फिल्मी गाने भी गा लेता था।तब इस बात की शिकायत उसकी मां पंचायत में कर देती है।फिर पंचायत बैठती है और दण्ड स्वरूप गोधन का हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है मतलब उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है।कुछ समय के बाद उसी जाति विशेष के लोगों के द्वारा सार्वजनिक उपयोग के लिए पेट्रोमेक्स खरीदा जाता है।सब बड़े उत्साह से ले आते हैं लेकिन जब उसे जलाने का समय आता है,सब एक दूसरे का मुंह ताकने लगते हैं।क्योंकि किसी को भी पेट्रोमेक्स जलाना नहीं आता था।सबके लिए ये शर्मिंदगी वाली बात हो जाती है।किसी दूसरे समाज के आदमी द्वारा पेट्रोमेक्स का जलाया जाना बेहद शर्मनाक बात होने वाली थी।जब ये बात मुनरी को पता चलती है तो वह गोधन का नाम अपनी सहेली को सुझाती है क्योंकि उसके समाज में पेट्रोमेक्स का वही एक जानकार था।सहेली के माध्यम से बात मुखिया तक पहुंचती है।फिर उस पर विचार विमर्श होता है और अंततः गोधन की सामाजिक बहिष्कार को खत्म कर दिया जाता है और उसे पेट्रोमेक्स जलाने के लिए बुलाया जाता है।गोधन पेट्रोमेक्स यानि पंचलैट जला देता है और उसको फिल्मी गीत गाने की छूट मिल जाती है।उसका सामाजिक रूतबा बढ़ जाता है।इस कहानी पर शायद फिल्म भी आई थी। यूट्यूब में तलाशें,शायद मिल जाए।नदिया के पार फिल्म के शादी वाले दृश्य में भी पेट्रोमेक्स को दिखाया गया है।
पेट्रोमेक्स का संबंध छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकनाट्य नाचा से भी रहा है। पेट्रोमेक्स के आने तक छत्तीसगढ़ में खड़े साज का नाचा प्रचलित था। जिसमें कलाकार मशाल की रौशनी में खड़े होकर चिकारा,तबला और खंजेरी के स्वर में नाचा की प्रस्तुति देते थे।सन् 1929 के आसपास छत्तीसगढ़ नाचा के पितामह दाऊ दुलारसिंह मंदराजी के द्वारा नाचा को संगठित किया गया। सर्वप्रथम दाऊ मंदराजी ने नाचा में मशाल के स्थान पर पेट्रोमेक्स का प्रयोग किया।ये सन् 1936 के आसपास की बात है।सन् 1940 के आते-आते लगभग चार पेट्रोमेक्स का प्रयोग नाचा में होने लगा और नाचा का नवीन स्वरूप सामने आया।
मेरी जानकारी अनुसार सन् 1996 तक केरोसिन वाले पेट्रोमेक्स का चलन था। धीरे-धीरे देश में विद्युतीकरण का दायरा बढ़ा और इसका चलन घटने लगा।तब तक सिलेंडरवाली पेट्रोमेक्स भी आ गई थी।लेकिन वो ज्यादा नहीं चल पाई।
फिल्म नदिया के पार के एक दृश्य में पेट्रोमेक्स