एक कुएं की मौत....
कुआं शब्द से हम सब परिचित है।जब दुनिया मे ट्यूबवेल या नलकूप का अस्तित्व नहीं था तब कुआं ही पेयजल का प्रमुख साधन हुआ करता था।बीते कुछ वर्षों से कुआं अब बडी तेजी से पाटे जा रहे हैं।नल और ट्यूबवेल जैसे पानी की घर पहुंच या कहें किचन पहुंच सेवा ने कुएं के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।कुआं की उपयोगिता और अस्तित्व शनैःशनैः खत्म हो रहा है। पिछले दिनों ही हमारे पडोस के एक सज्जन ने मकान बनाने के नाम पर अपना पुश्तैनी कुआं पटवा दिया।मुझे लगता है कि कुछ सालों के बाद गूगल बाबा ही कुआं के बारे मे बता पाएंगे।वास्तविकता मे तो अब कुएँ विलुप्ति के कगार पर है।पर कुएं से जुडी यादों को स्मृति पटल से कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता। बडे बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जिन लोगों के पास थोडी संपत्ति होती थी वे लोग सडक किनारे या गांव के सामूहिक उपयोग के लिए कुआं खुदवाया करते थे।परलोक सुधारने की आकांक्षा लिए लोग कुआं खुदवाकर पुण्य अर्जित कर लेते थे।यह स्वर्ग मे स्थान सुरक्षित करने का सहज और सुगम मार्ग होता था।सडक किनारे राहगीरों के लिए कुएँ खुदवाए जाते थे ताकि कोई राहगीर प्यासा न रहे।साथ ...