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जून, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बचपन का सिनेमा.....

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  फुरसत के पल में पुरानी यादों की जुगाली करने में मुझे बड़ा आनंद आता हैऔर अक्सर मैं अपने बचपन की पुरानी यादों में खो जाता हूं।ये वर्चुअल मतलब आभासी दुनिया में खोने से ज्यादा अच्छा है जो स्मार्ट फोन के हाथ में आते ही हमें वास्तविक दुनिया से बेखबर कर देती है।हम अपनी मोबाइल पर आंखें गड़ाए अपने में मगन और आजू बाजू क्या हो रहा है उसकी कोई खबर ही नहीं।किसी समय पर अमीर खुसरो ने बातूनी स्त्रियों के गपबाजी में व्यस्तता को लेकर एक पंक्ति कही थी-खीर बनाई जतन से ,चरखा दिया चलाय।आया कुत्ता खा गया,तू बैठी ढोल बजाय। आज अगर अमीर खुसरो होते तो शायद पंक्तियां यूं होती-खीर बनाई जतन से, मोबाइल दिया चलाय।आया कुत्ता खा गया,तू बैठी नजर गड़ाय।    कुल जमा मतलब ये है कि आज मोबाइल ने सबको जकड़ रखा है और सभी उसके आगे पीछे घूम रहे हैं। उनमें मैं भी शामिल हूं।कभी कभी फुरसत निकालकर पुरानी यादों पर जमी धूल भी झाडनी चाहिए।जैसे वक्त बेवक्त मैं करते रहता हूं।आज मुझे बात करनी है बचपन वाली सिनेमा पर।मतलब विडियो और वीसीपी के जमाने की बातें।वीसीपी नब्बे के दशक की एक जादुई चीज होती थी जिसका इंतजार बच्चे ब...

टीकटाक गाथा...

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जब से हमारे देश में इंटरनेट की सुविधा का विस्तार हुआ और स्मार्ट फोन आम आदमी के बजट में आया तब से सोशल मीडिया नाम के एक लत का प्रवेश भारतीय जनमानस में हुआ। प्रारंभिक दौर में फेसबुक का आगमन हुआ और देश के एक छोटे से गांव में रहने वाले आम आदमी की पहुंच वैश्विक स्तर पर हुई और अंतर्राष्ट्रीय मित्रता की शुरुआत हुई। फेसबुक के बदौलत जिनका पड़ोस में भी दोस्त नहीं था उनकी दोस्ती दुनिया भर के लोगों से होने लगी।फिर आया वाट्सएप...ये भी फेसबुक का अनुगामी था और आगे चलकर फेसबुक के अधिकार क्षेत्र अंतर्गत आ ही गया।फिर आया सबसे प्रलंयकारी एप...टीकटाक।जिसने भारत में धूम मचा दिया।इस एप के बदौलत एक से बढ़कर एक छुपे रूस्तम कलाकार निकलकर बाहर आए।टीकटाक के कारण ही एक से बढकर एक डांसर,सिंगर, आर्टिस्ट और बहुमुखी प्रतिभा के धनी लोगों का अभ्युदय हुआ।   वैसे टीकटाक का जन्म हमारे पड़ोसी देश चीन में हुआ और उसका सबसे बेहतर पालन-पोषण हमारे यहां हुआ।शंघाई के दो युवा मित्रों ने मिलकर मनोरंजन के उद्देश्य से इस अद्भुत और अलौकिक एप्प का निर्माण किया। शुरूआती दौर में इसका नाम Musically था जिसे एक प्रसिद्ध चीनी कंपनी ...

टूरिंग टाकीज की यादें....

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टिकट आज मनोरंजन के साधन आप सबकी हाथों में है। तकनीक ने इंटरनेट और मोबाइल के माध्यम से मनोरंजन के तमाम सामग्री को सहजता से उपलब्ध करा दिया है। लेकिन एक दौर वह भी था जब मनोरंजन के लिए लोकनाट्य,बाइस्कोप,सर्कस, खेलकूद और रेडियो ही मनोरंजन का साधन हुआ करती थी।फिल्म देखने के शौकीन लोगों के लिए फिल्मी मनोरंजन का तब एकमात्र साधन होती थी टूरिंग टॉकिज।ये टाकीजें विशेष अवसरों जैसे मेले या धार्मिक उत्सव आदि में आया करती थीं।बाद में टेलीविजन का दौर भी आया जब फिल्मी मनोरंजन की पहुंच घर घर तक हुई।हां तो हम बात करेंगे टूरिंग टॉकिज की।सत्तर अस्सी के दशक तक और उसके बाद भी स्थायी सिनेमा घर छोटे कस्बों में स्थापित नहीं हुए थे। फिल्म के शौकीन लोगों को तब फिल्म देखने के लिए बड़ी शहरों का सफर करना पड़ता था जो उस दौर में काफी महंगा और तकलीफ भरा होता था।छोटे कस्बों के लोगों को तब फिल्म देखने के लिए स्थानीय मेलों का बेसब्री से इंतजार हुआ करती थी जब टूरिंग टाकीज आती थी और फ़िल्म देखने का शौक पूरा होता था। हालांकि तब भी नई रिलीज फ़िल्में देखने को नहीं मिलती थी। पुरानी फिल्मों को देखकर ही फिल्मों के ग्रामीण और...

गोधन न्याय योजना

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छत्तीसगढ़ गांवों का प्रदेश है। यहां शहरी आबादी कम है ग्रामीण आबादी ज्यादा है और गांवों की आय का प्रमुख स्रोत होता है कृषि और पशुपालन।बीते कुछ वर्षों से छत्तीसगढ़ ने कृषि कार्य में यांत्रिक स्वरूप लिया है।फलत:कृषि कार्यों में उपयोग होनेवाला हमारा पशुधन अनुपयोगी और तिरस्कृत हो गया।कभी गौठानों और घर के गौशाला की शोभा बढ़ाने वाला पशुधन लावारिस अवस्था में यत्र-तत्र भटकने पर विवश हुआ। आधुनिक जीवनशैली के कारण होने वाले गंभीर बिमारियां अब गांवों तक पहुंच रही है।लोग धनलिप्सा के चक्कर में स्वयं यंत्रवत व्यवहार करने लगे है।कभी गांवों में दूध की नदिया बहा करती थी अब वहां दारु का गंदा नाला बहता है। छत्तीसगढ़ के गांवों का स्वरूप अब कुछ विकृत सा होता जा रहा है।   कल छत्तीसगढ़ शासन द्वारा एक महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की गई है-गोधन न्याय योजना।पूरे देश में अपनी तरह की यह अनूठी योजना है जिसके अंतर्गत गांव के पशुपालकों से गांव में कार्यरत स्व सहायता समूह के माध्यम से गोबर खरीदने का कार्य किया जायेगा।यह छत्तीसगढ़ शासन के सत्ता प्राप्ति के समय की योजना नरवा गरवा घुरवा बारी योजना का ही एक अंग है...