बचपन का सिनेमा.....
फुरसत के पल में पुरानी यादों की जुगाली करने में मुझे बड़ा आनंद आता हैऔर अक्सर मैं अपने बचपन की पुरानी यादों में खो जाता हूं।ये वर्चुअल मतलब आभासी दुनिया में खोने से ज्यादा अच्छा है जो स्मार्ट फोन के हाथ में आते ही हमें वास्तविक दुनिया से बेखबर कर देती है।हम अपनी मोबाइल पर आंखें गड़ाए अपने में मगन और आजू बाजू क्या हो रहा है उसकी कोई खबर ही नहीं।किसी समय पर अमीर खुसरो ने बातूनी स्त्रियों के गपबाजी में व्यस्तता को लेकर एक पंक्ति कही थी-खीर बनाई जतन से ,चरखा दिया चलाय।आया कुत्ता खा गया,तू बैठी ढोल बजाय। आज अगर अमीर खुसरो होते तो शायद पंक्तियां यूं होती-खीर बनाई जतन से, मोबाइल दिया चलाय।आया कुत्ता खा गया,तू बैठी नजर गड़ाय। कुल जमा मतलब ये है कि आज मोबाइल ने सबको जकड़ रखा है और सभी उसके आगे पीछे घूम रहे हैं। उनमें मैं भी शामिल हूं।कभी कभी फुरसत निकालकर पुरानी यादों पर जमी धूल भी झाडनी चाहिए।जैसे वक्त बेवक्त मैं करते रहता हूं।आज मुझे बात करनी है बचपन वाली सिनेमा पर।मतलब विडियो और वीसीपी के जमाने की बातें।वीसीपी नब्बे के दशक की एक जादुई चीज होती थी जिसका इंतजार बच्चे ब...