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पीड़ा की तैयारी कर लो सुख का आमंत्रण आया है

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 ब्लॉग लिखना तकरीबन बंद ही कर चुका हूं। क्योंकि लिखने के लिए अब उत्साह नहीं रहा।अब मन जब व्याकुल होता है तभी यहां हाजिर होता हूं ‌ बीते हफ्ते में घटी दो घटनाओं ने मन को व्यथित कर रखा है।रोड एक्सीडेंट में 2 प्रियजनों की अकस्मात निधन ने जीवन में कभी भी कुछ भी अनापेक्षित घट सकता है।इस कठोर सत्य को उजागर कर दिया।दोनों के छोटे-छोटे बच्चों का करुण क्रंदन देख असहनीय पीड़ा हुई। जिंदगी एक ही पल में किस कदर बिखर जाती है ये पुनश्च देखने को मिला। पूर्व के ऐसे ही कटु अनुभवों ने जीवन को देखने के मेरे नजरिए को बदल कर रख दिया है। ईश्वर का विधान समझ से बाहर लगने लगा है। मैंने महसूस किया है कि जैसे ही किसी के जीवन में खुशियां आती है। कुछ समय के बाद कोई ना कोई दुर्घटना जरुर घट जाती है। फिर सारे परिवार को उससे उबरने में सालों लग जाते हैं। कुछ कमियां कभी भी नहीं भर सकती। कहते हैं कि मनुष्य कर्म बंधन से आबद्ध है। उसके जन्म की हर एक घटना का उसके पूर्व कर्मों से संबंध होता है। लेकिन कभी कभी कुछ समझ में नहीं आता।जिस बच्चे ने अनाथ के रूप में अपना जीवन संघर्षों से गुजर कर निकाला क्या उसके बच्चे को भी फि...

राजस्थान यात्रा-1

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  जीवन भी एक यात्रा है।हर जीव जिसने जन्म लिया है वो इस मार्ग के पथिक है। जीवन की यात्रा किस्मत और कर्म के वाहन पर सुख और दुख के पडा़वों को पार कर अंततः मृत्यु के गंतव्य पर पहुंचकर विराम पाती है। मनुष्य का जीवन तो वैसे भी बहुत कठिन होता है।ऐसा अब तक के अपने नीज अनुभव के आधार पर कह सकता हूं। साल 2022 मेरे जीवन के कठिनतम वर्षों में एक साल था। दुर्भाग्यपूर्ण। राजस्थान वैभव और वीरता की भूमि है। वहां जाने की बहुत इच्छा थी। लेकिन जिन परिस्थितियों में राजस्थान की यात्रा करनी पड़ी उसकी कड़वाहटें आज भी महसूस करता हूं। एक मेडिकल इमरजेंसी में मुझे और मेरे एक अनुज को राजस्थान की यात्रा करनी पड़ी।वो मेरे गुरु पुत्र थे। दोनों एक ही दर्द से गुजर रहे थे। दोनों की मंजिल एक थी। फिर क्या था... ईश्वर को स्मरण करके ठान लिया लक्ष्य तक पहुंचने का। लक्ष्य तक पहुंचना आसान नहीं था। राजस्थान छत्तीसगढ़ से लगभग 1200 किमी दूर था। सड़क मार्ग से होकर जाना दुष्कर हो सकता था। प्लानिंग थी कि रेल से जाएं। लेकिन जो वक्त हमने चुना था वो शीतकालीन छुट्टियां मनाने का समय था।दूर दूर तक टिकट मिलने की कोई संभावना नहीं थी। फिर...

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

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  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकगायक स्व. मिथलेश साहू जी की पुण्यतिथि है।5 वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 2019 को वे छत्तीसगढ़ी लोककला जगत में कभी ना भरने वाली रिक्तता छोड़कर परलोक गमन कर गए।उनके गायन में माधुर्य का आकर्षण था।लोकगीतों के विविध छटाओं को उन्होंने अपने स्वर से सजाया है। प्रेमगीत,हास्यगीत, पारंपरिक उत्सव गीत,विवाह गीत आदि में उनके गायन का अंदाज बेहतरीन था।साल 1977 में उन्होंने सोनहा बिहान लोककला मंच से अपनी कला यात्रा की शुरुआत करी थी। उनके पिता स्व श्री जीवनलाल साहू भी एक लोक कलाकार थे। इसलिए कला के प्रति उनका झुकाव नैसर्गिक था।नाचा के विख्यात कलाकार मदन निषाद की कलाकारी ने उनको लोककला के सम्मोहन में बांधा था।इस सम्मोहन से बंधकर वे कला पथिक बन गए। वर्ष 1978 से वे आकाशवाणी रायपुर से पंजीकृत लोकगायक के रूप में प्रसारित हुए।फिर कभी रुके नहीं। श्रोताओं का प्यार उन्हें सदैव मिला। पिछले कुछ सालों में मैं निरंतर दुखद प्रसंगों का साक्षी रहा हूं। इसलिए ऊप...

उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई....

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  पिछले दिनों एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया तो उनके दशगात्र कार्यक्रम में शामिल हुआ। छत्तीसगढ़ में दशगात्र के दिन मृतक की आत्मशांति के लिए विशिष्ट पूजा किया जाता है। निकटतम परिजनों और ग्रामीणों के द्वारा तालाब में जाकर 5 अंजुरी पानी अर्पित कर देह त्यागने वाली आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।इस अवसर पर कहीं कहीं भजन कीर्तन आदि का कार्यक्रम रखा जाता है। लोकजीवन में परंपरागत लोकभजन के माध्यम से शरीर की नश्वरता और प्रभु भक्ति की श्रेष्ठता का गायन किया जाता है। वहां पर भी ऐसा ही कुछ गीत लोकधुन में खंजरी,तमूरा और झांझ की मधुर आवाज़ के साथ कुछ बुजुर्ग गा रहे थे... उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई...।बिना तामझाम के ताली की थाप और तीन वाद्ययंत्रों का संगम गीत को सरस बना रहा था।भजन के बाद एक बुजुर्ग दृष्टांत और कथा का वाचन करता था। तत्पश्चात पुनः वही भजन चल पड़ता था। मैं भी कुछ समय के लिए उनके पास बैठ गया।जो बुजुर्ग टीका कहकर दृष्टांत वाचन कर रहे थे वो भक्ति की श्रेष्ठता और संत सेवा की महानता के बारे में बता रहे थे। उसने कथा प्रसंग में शबरी की गुरुवचनों के प्रति आस्था के बा...

कोणार्क.. अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य

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      पुरी में रात्रि विश्राम पश्चात लगभग सुबह साढ़े बजे हमने होटल छोड़ दिया और चल पड़े भगवान साक्षी गोपाल के दर्शन के लिए। वहां पर पंडे पहुंचने के बाद तुरंत बही खाता में नाम दर्ज करवाने के लिए बोलने लगे। उसके लिए कुछ दानराशि देनी पड़ती है। मैंने और घनश्याम ने नहीं लिखवाया। भगवान हमको यहां तक लाए हैं वो खुद साक्षी हैं करके। वहां की मूर्ति बहुत सुंदर हैं। कहते हैं बांके बिहारी जी खुद चलकर जगन्नाथ धाम में पहुंचे हैं।कथा लंबी है इसलिए नहीं लिख रहा हूं।साक्षी गोपाल जी के दर्शन पश्चात हम लोग कोणार्क सूर्य मंदिर देखने चले गए। अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य है। कोणार्क का मेरा ये पहला दर्शन था। उससे पहले 20 रु के नोट में ही कोणार्क मंदिर के चक्के का दर्शन किया था। शिकार, कामक्रीड़ा और जीवन के विविध प्रसंगों को बहुत ही सुन्दर ढंग से कलाकारों ने पत्थर पर उकेरा है। बताते हैं कि 12 साल तक 1200 श्रमिकों ने दिन रात एक करके इस मंदिर को तैयार किया था।अकबर के इतिहासकार अबुल फजल के मुताबिक इन 12 वर्षों में उत्कल राज्य के संपूर्ण राजस्व को इसके निर्माण में लगा दिया गया था। दोपहर 2 बजे के लगभग को...

हरि बोलो....जय जगन्नाथ!!!

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 एक लंबी और नानस्टाप यात्रा से थकान स्वाभाविक थी।रात भर का रात्रि जागरण भी हुआ था तो धाम में पहुंचने के बाद जल्दी से कोई ठहरने की जगह खोजने कार्यक्रम था। तीर्थ क्षेत्र में धर्मशाला,यात्री लाॅज और होटलों की कमी नहीं होती।इन विकल्पों का विचार करने के बजाय पूर्व अनुभवियों के मतानुसार होटल में ठहरना तय हुआ और वो भी समुद्र के किनारे। हालांकि समुद्री बीच के किनारे के होटल थोड़े महंगे होते हैं  बताए लेकिन समुद्र में स्नान पश्चात सादे पानी से स्नान करने की सुविधा को देखते हुए वहीं ठहरना ज्यादा उचित लगा।अब हमारी गाड़ी गोल्डन बीच की ओर दौड़ पड़ी। गोल्डन बीच का नजारा अद्भुत था चारों तरफ दुकान समुद्री उत्पाद बेचने वालों की भीड़ और लोगों का जमावड़ा। मैं पहली बार सागर के दर्शन कर रहा था। इसलिए उतरते ही थोड़ी देर खड़ा होकर दृश्य को निहारने लगा।चार सदस्य होटल ढूंढने निकल पड़े और घनश्याम भाई गाड़ी को किनारे कर वहीं खड़े रहे। बमुश्किल 2 मिनट नजारों का दर्शन करके लौटा तब तक एक कर्तव्यनिष्ठ ट्रैफिक आफिसर हमारी गाड़ी की फोटो खींच रहा था।पता चला वहां बीच के किनारे गाड़ी खड़ी करने की अनुमति नहीं है।...

रात का सफर

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 जैसा कि मैंने पिछले पोस्ट में बताया था कि छत्तीसगढ़ से निकलते निकलते ही शाम ढलने लगा था। लगभग सवा 7 बजे के आसपास हम लोग खरियार रोड पहुंचे।खरियार रोड छत्तीसगढ़ और ओड़िशा दोनों के लिए महत्वपूर्ण कस्बा है। यहां दोनों जगहों से लोग खरीददारी करने आते हैं।कभी खरियाररोड अविभाजित दक्षिण कौसल का हिस्सा रहा है।जब सिरपुर दक्षिण कौसल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की राजधानी थी तब खरियार, नुआपड़ा  और कालाहांडी का क्षेत्र छत्तीसगढ़ में  समाहित था। वर्तमान में अब ये सारे ओडिशा राज्य के अंतर्गत आते है। यहां हमारी छत्तीसगढ़ी बोली और समझी जाती है। हालांकि उनकी स्थानीय मातृभाषा ओडिया का भी यहां चलन है। शासकीय प्रक्रिया भले ही दो प्रांतों में सीमा निर्धारण कर देती है, लेकिन सांस्कृतिक मेल मिलाप उनको जोड़े रहती है। यहां की दशहरा विख्यात है। छत्तीसगढ़ के बड़े बड़े लोककला मंचों का उस दिन यहां प्रदर्शन होता है। रामलीला होती है।रावण दहन में खूब आतिशबाजी होती है। जैसा कि आपको ज्ञात है यात्रा के शुरुआत में निकलते ही हमारी गाड़ी पंचर हो गई थी इसलिए उसकी मरम्मत कराना जरुरी था।खरियार रोड पहुंचते ही सर्वप्रथ...