सोमवार, 16 दिसंबर 2024

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के


 

लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!!

आज छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकगायक स्व. मिथलेश साहू जी की पुण्यतिथि है।5 वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 2019 को वे छत्तीसगढ़ी लोककला जगत में कभी ना भरने वाली रिक्तता छोड़कर परलोक गमन कर गए।उनके गायन में माधुर्य का आकर्षण था।लोकगीतों के विविध छटाओं को उन्होंने अपने स्वर से सजाया है। प्रेमगीत,हास्यगीत, पारंपरिक उत्सव गीत,विवाह गीत आदि में उनके गायन का अंदाज बेहतरीन था।साल 1977 में उन्होंने सोनहा बिहान लोककला मंच से अपनी कला यात्रा की शुरुआत करी थी। उनके पिता स्व श्री जीवनलाल साहू भी एक लोक कलाकार थे। इसलिए कला के प्रति उनका झुकाव नैसर्गिक था।नाचा के विख्यात कलाकार मदन निषाद की कलाकारी ने उनको लोककला के सम्मोहन में बांधा था।इस सम्मोहन से बंधकर वे कला पथिक बन गए। वर्ष 1978 से वे आकाशवाणी रायपुर से पंजीकृत लोकगायक के रूप में प्रसारित हुए।फिर कभी रुके नहीं। श्रोताओं का प्यार उन्हें सदैव मिला।

पिछले कुछ सालों में मैं निरंतर दुखद प्रसंगों का साक्षी रहा हूं। इसलिए ऊपर वर्णित गीतों के अतिरिक्त जो गीत मुझे सबसे ज्यादा पसंद आते हैं,वो गीत हैं उनके गाए निर्गुण भजन।लाग लपेट से दूर सीधे मर्मस्थल तक पहुंचने वाली कबीरवाणी।जिस प्रकार हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार के रोमांटिक गीतों का श्रोता वर्ग होने के साथ उनके सैड गीतों को पसंद करने वाले श्रोताओं की संख्या भी अच्छी खासी है। मैं भी मिथलेश सर के इन भजनों का प्रशंसक हूं। किशोर सुख और दुख के दोनों गीतों को सहजता से गाते थे वैसे ही हमारे मिथलेश साहू जी भी प्रेमगीत और भजन गाने में महारत रखते थे।

लोकगायक कुलेश्वर ताम्रकार जी के साथ उनकी जोड़ी खूब जमती थी। आडियो कैसेट के दौर में उनके नाचा और जोक्कड़गीत को श्रोताओं ने सराहा। लोककला मंच लोकरंग अर्जुंदा में दोनों ने बहुत दिनों तक एक साथ प्रस्तुति दिया।जब उनके अनुज भूपेंद्र साहू ने पृथक लोककला मंच"रंग सरोवर" बनाया तब वे अलग हुए।

हां,तो मैं बात कर रहा था मिथलेश साहू सर जी के गाए भजनों की। मिथलेश जी के भजन गीतों का एक संकलन भूपेंद्र साहू जी के निर्देशन में निकला था"सुमिरन" नाम से। क्षेत्र के भिन्न-भिन्न स्थानों पर उसकी विडियो शूटिंग हुई थी। इस संकलन में एक से बढ़कर एक लोक भजन संग्रहित है। उसमें के एक गीत का साग रांधो संवलिया...की शूटिंग स्थानीय छुरा बाजार में हुई थी। उनके गाए गीतों में हीरा गंवा गयो कचरे में,दिन चारी मइहरवा में मुझे बेहद पसंद है। विशेष रूप से दिन चारी मइहरवा में....

इस गीत की दार्शनिकता अद्भुत है।जीव का संसार से लगाव,संसारी रीति रिवाज और आडंबर,जीवन का सार तत्व इसमें निहित है।इस गीत की एक पंक्ति विशेष उल्लेखनीय है। अउॅंठ हाथ के काया जरगे। भुइंया में मिलही रासा।।

इस पंक्ति में एक छत्तीसगढ़ीशब्द आया है "अउॅंठ"।आजकल ये शब्द प्रचलन में नहीं है। लेकिन लोकजीवन में ये शब्द लंबाई का मात्रक है।अउॅंठ मतलब साढ़े तीन यानि पूर्ण चार में आधा कम। कहते हैं कि हर व्यक्ति के शरीर का नाप उसके खुद के हाथ में साढ़े तीन हाथ ही होता है।इसी गीत की दूसरी पंक्ति हाड़ जलै तोर बन कस लकड़ी केस जरै बनघासा महादेव हिरवानी द्वारा गाए भजन कैसा खेल रचाया रचाने वाला में भी है।संतोष शुक्ला द्वारा गाए गीत तोर नांव अमर कर ले गा भैय्या का राखे हे तन मा... में भी भाव साम्यता है।

मैंने इस गीत के दो वर्जन को सुना है।एक कुलेश्वर ताम्रकार और मिथलेश साहू के स्वर में है और दूसरा सिर्फ मिथलेश सर के स्वर में।दो गायकों के स्वर वाले गीत में कुल चार अंतरा है और एकल स्वर वाले गीत में तीन अंतरा है। दोनों ही मधुर हैं लेकिन युगल स्वर वाला ज्यादा बेहतर है।इस आलेख के लिए मेरे पास स्व. मिथलेश साहू जी का फोटो नहीं था।आनलाइन फोटो अच्छी क्वालिटी में नहीं मिल पा रहा था तो मैंने उनके भतीजे मलयज साहू जी से संपर्क किया तो उन्होंने सहर्ष सर का फोटो उपलब्ध कराया। इसके लिए उनको हृदय से धन्यवाद!!!

मिथलेश साहू सर ने छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को नया आयाम दिया है।जब तक छत्तीसगढ़ी गीतप्रेमी छत्तीसगढ़ी गीत सुनते रहेंगे मिथलेश साहू सर लोककला जगत से विस्मृत नहीं हो सकते।उनकी पुण्यतिथि पर उनको सादर भावभीनी श्रद्धांजलि...

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024

उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई....

 


पिछले दिनों एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया तो उनके दशगात्र कार्यक्रम में शामिल हुआ। छत्तीसगढ़ में दशगात्र के दिन मृतक की आत्मशांति के लिए विशिष्ट पूजा किया जाता है।

निकटतम परिजनों और ग्रामीणों के द्वारा तालाब में जाकर 5 अंजुरी पानी अर्पित कर देह त्यागने वाली आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।इस अवसर पर कहीं कहीं भजन कीर्तन आदि का कार्यक्रम रखा जाता है। लोकजीवन में परंपरागत लोकभजन के माध्यम से शरीर की नश्वरता और प्रभु भक्ति की श्रेष्ठता का गायन किया जाता है।

वहां पर भी ऐसा ही कुछ गीत लोकधुन में खंजरी,तमूरा और झांझ की मधुर आवाज़ के साथ कुछ बुजुर्ग गा रहे थे... उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई...।बिना तामझाम के ताली की थाप और तीन वाद्ययंत्रों का संगम गीत को सरस बना रहा था।भजन के बाद एक बुजुर्ग दृष्टांत और कथा का वाचन करता था। तत्पश्चात पुनः वही भजन चल पड़ता था।

मैं भी कुछ समय के लिए उनके पास बैठ गया।जो बुजुर्ग टीका कहकर दृष्टांत वाचन कर रहे थे वो भक्ति की श्रेष्ठता और संत सेवा की महानता के बारे में बता रहे थे। उसने कथा प्रसंग में शबरी की गुरुवचनों के प्रति आस्था के बारे में बताया।जब मतंग ऋषि ने शबरी को ये बताया कि तुम प्रभु की प्रतीक्षा करो...वो जरुर आयेंगे।दिन,सप्ताह,माह और वर्ष बीतते गया।शबरी प्रभु की प्रतीक्षा में तरुणी से वृद्ध हो गई पर उन्होंने गुरुवचनों पर संदेह नहीं किया।वो गुरुवचनों पर आस्था रखकर प्रतीक्षा करती रही.. अंततः प्रभु श्रीराम उनके पास स्वयं चलकर आए।इसके बारे में उन्होंने बताया कि मनुष्य अधीर होता है।वह किसी की भी प्रतीक्षा लंबे समय तक नहीं करता है।अपना मार्ग और विचार बदल देता है। लेकिन शबरी एकटक प्रभु का ही राह निहारती रही।इस अवधि में ना तो वह किसी तीर्थ दर्शन के लिए गई और ना ही किसी देवी-देवता की भक्ति में जप तप किया।उसका एकमात्र लक्ष्य था त्रिलोक अधिपति के सम्मुख दर्शन करना। इसलिए भगवान को स्वयं उसके पास आना पड़ा।

ग्रामीण बुजुर्ग के मुख से इस प्रकार का अद्भुत टीका सुनना मेरे लिए अद्भुत था। इसके बाद पुनः वही भजन चल पड़ा..

धोखा धोखा मा खोई डारे उमरिया ला

धोखा धोखा मा खोई डारे भाई

ना भाव भक्ति करे,ना संत सेवा जाने

न तो करे करम कमाई भाई

उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई...

इस भजन का भावानुवाद कुछ इस तरह है कि मनुष्य मेरे पास बहुत समय बाकी है सोचकर राग रंग में व्यस्त रहता है। फिर अकस्मात जब उसकी मृत्यु का समय आ जाता है तब वह पछतावा करता है कि उसने ना तो किसी का सेवा किया और ना ही किसी प्रकार का सद्कर्म किया।इस प्रकार पछतावा लिए जीव पुनः जन्म मरण के चक्कर में फंस जाता है।

इसलिए अगर समय रहते मनुष्य चेत जाए तो वह अपने जीवन को अनुकरणीय बना सकता है।

जय जगन्नाथ 

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

कोणार्क.. अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य

 

   




पुरी में रात्रि विश्राम पश्चात लगभग सुबह साढ़े बजे हमने होटल छोड़ दिया और चल पड़े भगवान साक्षी गोपाल के दर्शन के लिए। वहां पर पंडे पहुंचने के बाद तुरंत बही खाता में नाम दर्ज करवाने के लिए बोलने लगे। उसके लिए कुछ दानराशि देनी पड़ती है। मैंने और घनश्याम ने नहीं लिखवाया। भगवान हमको यहां तक लाए हैं वो खुद साक्षी हैं करके।
वहां की मूर्ति बहुत सुंदर हैं। कहते हैं बांके बिहारी जी खुद चलकर जगन्नाथ धाम में पहुंचे हैं।कथा लंबी है इसलिए नहीं लिख रहा हूं।साक्षी गोपाल जी के दर्शन पश्चात हम लोग कोणार्क सूर्य मंदिर देखने चले गए। अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य है। कोणार्क का मेरा ये पहला दर्शन था। उससे पहले 20 रु के नोट में ही कोणार्क मंदिर के चक्के का दर्शन किया था।
शिकार, कामक्रीड़ा और जीवन के विविध प्रसंगों को बहुत ही सुन्दर ढंग से कलाकारों ने पत्थर पर उकेरा है। बताते हैं कि 12 साल तक 1200 श्रमिकों ने दिन रात एक करके इस मंदिर को तैयार किया था।अकबर के इतिहासकार अबुल फजल के मुताबिक इन 12 वर्षों में उत्कल राज्य के संपूर्ण राजस्व को इसके निर्माण में लगा दिया गया था।
दोपहर 2 बजे के लगभग कोणार्क से घर वापसी के लिए निकले।इस बार रास्ता हमने बदल लिया था। खुर्दा होते हुए सरायपाली मार्ग का रास्ता हमने लिया था। रास्ते भर मिलने वाले चटर पटर व्यंजनों का भोग लगाते आ रहे थे। जहां कुछ नया नजर आता, गाड़ी रुक जाती थी। रात्रि में एक जगह 100 रु पत्तल की दर से स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया।फोटो देख सकते हैं।
कुछ मिलाकर जीवन की एक अनोखी और यादगार यात्रा थी,श्री जगन्नाथ पुरी की यात्रा।अवसर मिले तो चूकिए मत...।पुरी यात्रा वृत्तांत का समापन यहीं कर रहा हूं। मिलते हैं अगले पोस्ट में किसी नई पुरानी यादों के संग...जय जगन्नाथ!!!


गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

हरि बोलो....जय जगन्नाथ!!!







 एक लंबी और नानस्टाप यात्रा से थकान स्वाभाविक थी।रात भर का रात्रि जागरण भी हुआ था तो धाम में पहुंचने के बाद जल्दी से कोई ठहरने की जगह खोजने कार्यक्रम था। तीर्थ क्षेत्र में धर्मशाला,यात्री लाॅज और होटलों की कमी नहीं होती।इन विकल्पों का विचार करने के बजाय पूर्व अनुभवियों के मतानुसार होटल में ठहरना तय हुआ और वो भी समुद्र के किनारे। हालांकि समुद्री बीच के किनारे के होटल थोड़े महंगे होते हैं  बताए लेकिन समुद्र में स्नान पश्चात सादे पानी से स्नान करने की सुविधा को देखते हुए वहीं ठहरना ज्यादा उचित लगा।अब हमारी गाड़ी गोल्डन बीच की ओर दौड़ पड़ी। गोल्डन बीच का नजारा अद्भुत था चारों तरफ दुकान समुद्री उत्पाद बेचने वालों की भीड़ और लोगों का जमावड़ा। मैं पहली बार सागर के दर्शन कर रहा था। इसलिए उतरते ही थोड़ी देर खड़ा होकर दृश्य को निहारने लगा।चार सदस्य होटल ढूंढने निकल पड़े और घनश्याम भाई गाड़ी को किनारे कर वहीं खड़े रहे। बमुश्किल 2 मिनट नजारों का दर्शन करके लौटा तब तक एक कर्तव्यनिष्ठ ट्रैफिक आफिसर हमारी गाड़ी की फोटो खींच रहा था।पता चला वहां बीच के किनारे गाड़ी खड़ी करने की अनुमति नहीं है।हमसे चूक हो गई थी। घनश्याम और मैंने उनसे मान मनौव्वल किया कि बड़ी दूर से आए हैं...रहम कीजिए प्रभु!!!पर प्रभु मानने के लिए तैयार नहीं थे।बोले- आनलाइन चालान घर पहुंचेगा। गाड़ी हटाओ और आगे निकलो। पत्थर में सिर पटकने वाली बात थी।आज के समय  में इतने घनघोर टाईप ईमानदार कर्मचारी मिलने की उम्मीद नहीं थी। निकलते समय गाड़ी के सारे दस्तावेज अप टू डेट करके निकले थे कि कोई परेशानी ना हो।और ये अलग टाईप की परेशानी आ गई थी।फिर भी हमने हिम्मत करके पूर्व अनुभवों के आधार पर उनसे अनुनय-विनय किया तो उनका कठोर हृदय पसीजा तत्पश्चात भाव ताव की रस्म अदायगी हुई और अंततः कांड का समापन हुआ। हमने कहा जय जगन्नाथ!!संकट टली। फिर गाड़ी आगे बढ़ाकर पुनः वापिस हुए और साथियों से संपर्क किया तो उन लोगों ने होटल का पता बताया और वर्मा सर खड़े मिले मार्गदर्शन के लिए। गाड़ी होटल के सामने खड़ी करके फ्रेश हुए।फिर लहरा लेने(समुद्री स्नान)के लिए प्रस्थान किया। समुद्र का नजारा अद्भुत था। बड़ी जलराशि के नाम पर अब तक सिर्फ गंगरेल बांध के दर्शन किए थे तो अथाह समुद्र की विशालता, लहरों का वेग और गर्जन मेरे लिए रोमांचक अनुभव था।वैसे हमारा शरीर 70% पानी से बना होता है तो पानी के प्रति प्रेम स्वाभाविक है। समुद्र के किनारे मृत जेली फिश बिखरे पड़े थे। स्थानीय लोगों के अनुसार हमेशा ऐसा नहीं होता है बताए कभी-कभी ऐसा हो जाता है क्योंकि जेलीफिश समुद्र के गहरे हिस्से में पाई जाती है।कुछ मस्त मिजाज के लोग जेलीफिश को ताज के समान सर पर रखकर फोटो खींचवा रहे थे।किसी ने बताया कि जेलीफिश का अगर बदन से स्पर्श हो जाए तो खुजली होती है।इतना सारा जनरल नालेज इकट्ठा करने बाद हम सबने समुद्र में छलांग लगाया और समुद्री लहरों ने हमें उछाल कर जहां का तहां पहुंचा दिया।यही बार बार की उछलकूद ही समुद्र स्नान का आनंद है। लगभग एक डेढ़ घंटे तक नहाने के बाद वापस हो रहे थे तो शंख और  मोती बेचने वाले खरीदने के लिए मनुहार करने लगे। मोती का रहस्य मैं जान चुका था इसलिए बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। लेकिन शंख खरीदने की इच्छा थी। लेकिन साथियों ने मना कर दिया कि बाद में खरीद लेंगे।एक शंख वाला 200 रु में 3 शंख देने के लिए तैयार हो गया था। लेकिन साथियों ने मना किया और बोले कि बाद में इससे सस्ते में मिलेगा। लेकिन मिला नहीं। कभी-कभी पहले किया सौदा ही ज्यादा लाभदायक होता है बजाय बाद के सौदे के।अवसर बार बार नहीं मिलता।खैर, स्नान पश्चात दोबारा स्नान हुआ।जो खाद्य सामग्री लाए थे उससे पेट पूजा किए और दोपहर 11 से 3 बजे तक होटल के एसी रुम में घोड़ा बेचकर सोए।जो घोड़ा हमने बेचा था उसे कुछ लोग समुद्र के किनारे पर्यटकों को घुमा रहे थे।हा..हा..हा..ये मजाक था।

3 बजे सोकर उठने के बाद समुद्र के किनारे एक रेस्टोरेंट में भोजन करने गए।शीशे के दरवाजे और एसी की सुविधा से लैस ऐसे रेस्टोरेंट में पर्यटक भोजन के लिए कम उस सुविधा के लिए भुगतान ज्यादा करते हैं।ऐसा मुझे लगता है। किनारे पर जली हुई रुखी रोटी,फ्राई दाल और पुनश्च मिक्स वेज का भक्षण किया। भोजन में रस नहीं था इसलिए रसपान करना नहीं लिखा हूं। भोजन उपरांत फिर होटल आए और अपनी गाड़ी से ट्रैफिक में उलझते जाने के बजाय रिक्शे या आटो से जाना तय किया।आटो वाले ने भगवान जगन्नाथ स्वामी के मार्ग वाली गली में लाकर छोड़ दिया। गली से ही मंदिर का शिखर दिखाई दे रहा था।नील चक्र के दर्शन हुए तो आटो से उतरते ही हम सबने समवेत स्वर में जय जगन्नाथ का उद्घोष किया।आटो वाले को पैसा देकर मंदिर के सामने वाली गली पर आगे बढ़ने  लगे।महाडिक सर ने प्रभु जगन्नाथ से कोई मनौती मांगी रही होगी, इसलिए एक नाई के पास जाकर केशकर्तन करवाने  लगे और तब तक हम लोग आस-पास के मकान और दुकान का जायजा लेने लगे। ज्यादातर लोगों ने अपने घर के कुछ हिस्सों को जीवन यापन के लिए लाॅज बना रखा है।नीचे दुकानें बनी है। जिसमें से ज्यादातर खाजा(जगन्नाथ पुरी की विशेष मिठाई जो प्रभु को भोग लगता है)की दुकान और पूजा सामग्री  और सजावटी सामान बेचने की दुकाने हैं।मंदिर में मोबाईल वर्जित था इसलिए महाडिक सर के आने के बाद मंदिर के सामने के एक दुकानदार के यहां 120 रु में मोबाईल और चप्पल रखकर दर्शन के लिए कतारबद्ध हो गए।बाजू में ही पंडाल लगा था जिसमें भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथ यात्रा के लिए रथ तैयार हो रहा था।रथ के लिए विशाल पहिए वहां रखे थे और कारीगर अपने कार्य में लगे हुए थे। कुछ देर के बाद मंदिर परिसर में प्रवेश हुआ तो भगवान जगन्नाथ स्वामी के एकल मूर्ति के दर्शन हुए। फिर सीढियां चढ़ते हुए मुख्य मंदिर तक पहुंचे। सीढ़ियों पर मात्र 10 रु में भगवान जगन्नाथ के लिए तुलसी का माला पंडे बेच रहे थे।उसी समय कुछ दंडधारी हरि बोल का उद्घोष करते ओड़िया भजन करते जत्थे के साथ पहुंचे। मंदिर की बनावट अद्भुत है। देखने लगे तो बस देखते ही रह गए। भारतीय वास्तुकला का अद्भुत प्रत्यक्ष प्रमाण सम्मुख था।जब हम मंदिर परिसर में पहुंचे उसी समय मंदिर के ध्वज को बदलने का रस्म चल रहा था।एक व्यक्ति उलटे ही देखते देखते मंदिर के शिखर तक जा पहुंचा। उसने अपने कमर में नये ध्वज को बांध रखा था। उसने शीर्ष पर पहुंच कर पुराने ध्वज को उतारा और उसमें बंधे हुए तुलसी पत्र को ऊपर से जनसमूह के  लिए नीचे फेंक दिया।लोग उस प्रसाद को पाने के लिए टूट पड़े।किस्मत वालों को मिला,शेष को नहीं।इस रस्म के दौरान एक व्यक्ति साथ में और रहता है। इतने ऊंचे मंदिर के शिखर पर रोज चढ़ना उतरना किसी हिम्मत वाले का ही काम है।इस काम को करने वालों को नमन। ध्वज को बदलने का क्रम बारहों मास निर्बाध चलता रहता है। कहते हैं अगर ध्वज नहीं बदला गया तो मंदिर के पट 18 साल के लिए बंद हो जायेगा। हालांकि ऐसा अवसर आज तक नहीं आया है।

इस दर्शन के पश्चात भगवान जगन्नाथ जी के मूल मंदिर में दाखिल हुए तो वहां हनुमानजी के दर्शन हुए। भगवान जगन्नाथ के सम्मुख हनुमान जी की जो मूर्ति है , उसमें उन्होंने गदा के साथ ही तलवार भी धारण किया है,जो आमतौर पर देखने को नहीं मिलता।दूसरी तरफ गरुड़ जी की मूर्ति बनी है। गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ,माता सोहद्रा और भगवान बलभद्र का विग्रह मन को मोहित कर देता है।ऐसा लगता है कि बस खड़े रहें और भगवान की मनोहारी छवि के दर्शन करते रहें। लेकिन भक्तों की अपार भीड़ के कारण ज्यादा देर तक वहां नहीं रुक सकते। फिर भी जितनी देर तक अवसर मिला एकटक देखते रहे।उसके बाद मंदिर परिसर से मैं जैसे ही निकला एक पंडे ने बेत की छड़ी पीठ पर मारी और दक्षिणा मांगने लगे।वह युवा था और मैंने जो दिया सो रख लिया। उसने मेरे इस भ्रम को भी दूर कर दिया जो लोगों से सुन रखा था कि जगन्नाथ मंदिर के पंडे लूटते हैं। उसने बताया कि मैं आपके लिए भगवान को भोग लगी मिठाई ला सकता हूं अगर आप राशि दें। मैंने पूछा कितने रुपए का आयेगा।वो बोले कि 100 रु से शुरू हो जाता है। मैंने उसे 150 रु दिए। फिर वो थोड़ी देर में मुझे ताड़ की टोकरी में भोग प्रसादी लाकर दे दिए। फिर हम सब लोगों ने परिसर के अन्य मंदिरों के भी दर्शन किए। वहां स्थित वट वृक्ष के पास राह चलते एक पंडे ने जबरदस्ती मेरे हाथ में रुद्राक्ष रख दिया और बोले भगवान कृपा करेंगे दक्षिणा दो। मैंने तुरंत उनको उनका रुद्राक्ष ये कहते हुए थमा दिया कि उनकी कृपा है तभी यहां तक पहुंचे हैं,और आगे निकल गया। श्रद्धालुओं के धार्मिक भावना का ऐसा शोषण मुझे सही नहीं लगता। वटवृक्ष के नीचे गणेशजी की सुंदर विशाल प्रतिमा है। वहीं पर पुनश्च जगन्नाथ प्रभु के एक और विग्रह के दर्शन हुए। फिर हम लोग आनंद बाजार चले गए। आनंद बाजार उस जगह को बोलते हैं जहां भगवान जगन्नाथ की महाप्रसादी का बाजार लगता है।श्रद्धालुगण अपनी कार्यक्षमता अनुसार प्रभु भोग का आनंद लेते हैं। अनेकानेक पकवानों से सुसज्जित दुकाने हैं।हर दुकानदार चखने के लिए महाप्रसाद देता है।कोई अगर सभी दुकानों तक घूमे तो उनका पेट भर जायेगा। हमने भी महाप्रसाद के भोग का रसपान किया और घर परिवार व इष्ट मित्रों, परिजनों के लिए महाप्रसाद और मिठाइयां खरीदीं। कहते हैं कि भगवान विष्णु बद्री धाम में स्नान करते हैं,द्वारिका धाम में वस्त्र श्रृंगार करते हैं, पुरी धाम में भोजन करते हैं और रामेश्वर धाम में शयन करते हैं। सचमुच पुरी धाम में भोजन की इतनी किस्में हैं कि भगवान खाते खाते छक जाते होंगे। मिठाई की भरमार है पुरी धाम में।चूंकि महाप्रसाद खाकर तृप्त हो गए थे इसलिए और  खाना नहीं खाया।वापसी के बाद फिर समुद्र तट पर टहलने निकल पड़े। वहां पर एक सैंड आर्टिस्ट ने मां दुर्गा की बेहतरीन कलाकृति बनाई थी।साथ ही अपनी कला प्रदर्शन के लिए स्वैच्छिक सहयोग मांग रहे थे।पुरी मशहूर सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक की कर्मभूमि है तो यहां ऐसे कलाकारों का मिलना स्वाभाविक है।एक डिब्बा सामने रखा था।लोग अपनी इच्छानुसार सहयोग कर रहे थे। यहां पर रात में घूमना और समुद्री लहरों पर घूमना आनंददायक होता है। थोड़ी देर घूमने के बाद सो गए। अगले दिन कोणार्क सूर्य मंदिर के दर्शन और वापसी का प्रोग्राम था।उसकी बात अंतिम किस्त अगले पोस्ट में...जय जगन्नाथ!!!

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

रात का सफर





 जैसा कि मैंने पिछले पोस्ट में बताया था कि छत्तीसगढ़ से निकलते निकलते ही शाम ढलने लगा था। लगभग सवा 7 बजे के आसपास हम लोग खरियार रोड पहुंचे।खरियार रोड छत्तीसगढ़ और ओड़िशा दोनों के लिए महत्वपूर्ण कस्बा है। यहां दोनों जगहों से लोग खरीददारी करने आते हैं।कभी खरियाररोड अविभाजित दक्षिण कौसल का हिस्सा रहा है।जब सिरपुर दक्षिण कौसल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की राजधानी थी तब खरियार, नुआपड़ा  और कालाहांडी का क्षेत्र छत्तीसगढ़ में  समाहित था। वर्तमान में अब ये सारे ओडिशा राज्य के अंतर्गत आते है। यहां हमारी छत्तीसगढ़ी बोली और समझी जाती है। हालांकि उनकी स्थानीय मातृभाषा ओडिया का भी यहां चलन है। शासकीय प्रक्रिया भले ही दो प्रांतों में सीमा निर्धारण कर देती है, लेकिन सांस्कृतिक मेल मिलाप उनको जोड़े रहती है। यहां की दशहरा विख्यात है। छत्तीसगढ़ के बड़े बड़े लोककला मंचों का उस दिन यहां प्रदर्शन होता है। रामलीला होती है।रावण दहन में खूब आतिशबाजी होती है।

जैसा कि आपको ज्ञात है यात्रा के शुरुआत में निकलते ही हमारी गाड़ी पंचर हो गई थी इसलिए उसकी मरम्मत कराना जरुरी था।खरियार रोड पहुंचते ही सर्वप्रथम एक आटो दुकान  में पंचर टायर का रिपेयरिंग करवाए और वहीं पास में एक ठेले पर नींबू सोडा का आनंद लिया।राह चलते जायजा लेने पर लगा कि वहां जैन मारवाडियों का व्यापार में बढ़िया दखल है।भोजन या नास्ता अगले शहर नुआपड़ा में करने की योजना थी, इसलिए बातचीत करते हमारा कारवां बढ़ गया। नुआपड़ा पहुंचे तो पता चला कहीं पर खाने लायक उचित व्यवस्था नहीं है। तो फिर आगे बढ़ गए। हमारी टीम के तरुण वर्मा सर तकनीकी विशेषज्ञ हैं। मोबाईल के अच्छे ज्ञाता हैं। उन्हीं के मार्गदर्शन में गूगल मैप के भरोसे आगे बढ़ रहे थे। बहुत सारे छोटे छोटे गांवों को पार करने के बाद एक शहर आया-सोहेला।शायद हमें जाना दूसरे मार्ग पर था लेकिन हम लोग दूसरा कोई रास्ता पकड़ लिए थे।तब तक रात के 10 बज गए थे और सबको जोरों की भूख लग रही थी। वहां पर ढाबा तलाशने लगे तो एक ढाबा नजर आया-मास्टर ढाबा!!! हमारे ग्रुप में ज्यादातर लोग पेशे से मास्टर ही थे,सो मास्टर प्रेम तो होगा ही। इसलिए इसी ढाबा में जम गए। सबने मिलकर तय किया कि रोटी,दाल फ्राई और मिक्स वेज आर्डर करते हैं। आर्डर देने के आधे घंटे के बाद हमारा भोजन टेबल पर सर्व हुआ।उसके पहले मुंहदिखाई में रखे खीरा,प्याज के सलाद का कार्यक्रम संपन्न हो गया था।भूखे थे इसलिए टूट पड़े।खाना खाने और डकार लेने के बाद समझ में आया कि सब्जी ज्यादा टेस्टी नहीं था। मिक्स वेज वैसे भी नाम बड़े दर्शन छोटे वाली डिश है। रेस्टोरेंट में बचे सब्जियों को काट फिट कर परोस दिया जाता है। छत्तीसगढ़ी में मिंझरा साग बोलने से छोटे दर्जे का समझा जाता है और वही सब्जी अंग्रेजी में मिक्स वेज बोलने से प्रतिष्ठित हो जाती है।खैर,जो था जैसा था बढ़िया था।भोजन उपरांत ढाबे के मिश्री सौंफ को चबाते हुए गाड़ी पर सवार होकर फिर निकल पड़े।भोजन पश्चात ड्राइविंग की कमान महाडिक सर ने संभाल  लिया था।।ऐसे करते करते लगभग डेढ़ बजे रात तक सब लोग जागते ही रहे।लंबी दूरी  के बाद रास्ते में एक छोटा-सा चाय का टपरा दिखा तो तत्काल गाड़ी के पहिए थम गए।रात का सफर अब तक सुहाना ही था। चायवाले  को चाय के लिए आदेशित  किया फिर थोड़ी देर में चाय के डिस्पोजल कप हमारे हाथों में थे।अच्छी बात ये थी कि ग्रुप के सारे सदस्य चायप्रेमी ही थे और चाय के मामले में मैं  उन सबका सरदार था।चाय बढ़िया बनी थी। चायपान के बाद ड्राइविंग से महाडिक सर ने रेस्ट लिया और गाड़ी की स्टेयरिंग वर्मा सर ने संभाल लिया।बताता चलूं कि सोहेला के बाद हमने सोनेपुर वाला रोड ले लिया था यात्रा के लिए,जो आगे बौड नयागढ़ होते हुए पुरी जाती है।इस बीच घनश्याम के साथ त्रिवेदी भैय्या और बोस भैय्या ने हल्की झपकी ले लिया और मैं, महाडिक सर बात करते रहे  और वर्मा सर ने रिमिक्स गाना आन कर दिया ताकि नींद ना आए ।इस तरह दुनिया भर की गपशप करते चलते रहे। सवेरे सवेरे हम लोग बौड पहुंच चुके थे।उसके आगे नयागढ़ आनेवाला था।उसके बाद पुरी धाम का नंबर था।
गर्मी के दिनों वहां का मौसम बड़ा अजीब था।बादल छाए थे और भरपूर ऊमस थी।बदन का चिपचिपापन बड़ा अजीब लग रहा था। नयागढ़ में रास्ते के दोनों ओर सूखी मछलियों की दुकान लगी थी।हम लोग ऐसी जगह देख रहे थे जहां ब्रश वगैरह करके कम से कम चाय पी सकें। लेकिन गूगल के दिखाए रास्ते ने हमें मेन रोड से हटाकर गांव के रास्ते में डाल दिया था।मैप पुरी शहर को  नजदीक दिखाता था लेकिन दूर दूर तक कहीं नजर ही नही आता था।अब आयेगा तब आयेगा करते करते सुबह के 8 बज गए।अंततः कुछ देर के बाद पुरी मेन रोड का बोर्ड  नजर आया और पुरी की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग पर हमारी गाड़ी दौड़ने लगी।जिस तरह अंधा क्या चाहे दो आंखें उसी तरह उनींदें थके लोग क्या चाहें-चाय!!! तो  चाय तलाशती हमारी आंख को रास्ते में एक जगह चाय का टपरा दिखा तो रुक गए। वहां के मौसम में बहुत ज्यादा ऊमस थी इसलिए कुछ लोगों ने वहां कपड़े  चेंज कर शार्ट पहन लिया और ब्रश करने के लिए पानी मांगकर ब्रश किया।चाय बेचने वाला दुकानदार एक किशोरवय लड़का था।उसकी मुस्कान बड़ी प्यारी थी।हम लोग वहां छत्तीसगढ़ी में ही बात कर रहे थे। बीच बीच में हिंदी में भी वार्तालाप होता था।हंसी मजाक जारी था।उस लड़के ने हमारी विनोदप्रियता को शायद भांप लिया था। इसलिए चाय के पैसे देने के बाद जब मैं बोला कि वापसी का चाय अपनी ओर से पिला देना।तो वो हंसते हुए बोला-ठीक है पिला देगा।आप लोग मजाक बहुत करता है।खैर,ना हम उस रास्ते पर लौटे और ना ही वहां दोबारा चाय पीने का मौका मिला। वैसे भी सफर में मिले लोग हर बार कहा ं साथ होते हैं।
लगभग-लगभग साढ़े आठ बजे हम लोग चारों धाम में से एक जगन्नाथ पुरी धाम की पुण्य धरा पर थे। मार्ग में ही भगवान जगन्नाथ जी के वाहन गरुड़ की एक विशाल मूर्ति लगी थी।जिस दिशा की ओर वे देख रहे थे।उसे देखकर समझ आ गया था कि मंदिर किस दिशा में है। लेकिन रातभर के उनींदे थे इसलिए सबसे पहले हम लोगों ने होटल खोजकर आराम करना ज्यादा उचित समझा और वहीं बस स्टैंड से पूछकर होटल की खोज में निकल पड़े.... ज्यादा लंबे पोस्ट से उबासी आ जाएगी इसलिए अगले पोस्ट में दर्शन लाभ का वर्णन करुंगा....जय जगन्नाथ!!!!

शनिवार, 28 सितंबर 2024

पुरी धाम की ओर





 जय जगन्नाथ!!!

कल विश्व पर्यटन दिवस था।ये पोस्ट मैं कल ही डालने वाला था लेकिन कुछ कारण से नहीं हो पाया। पर्यटन का मतलब होता है घूमना।नये नये जगहों की सैर।ये स्थान धार्मिक स्थल भी हो सकते हैं या प्राकृतिक या कृत्रिम भी। कुछ लोग कुदरत की बनाई चीजें देखकर आनंदित होते हैं तो कुछ लोग मानव निर्मित कलाकृति देखकर खुश हो जाते हैं।वैसे मैं स्वभाव से ज्यादा घुमक्कड़ नहीं हूं। ज्यादातर घर में रहकर ही समय गुजारता हूं। मेरे जैसे प्राणियों के लिए छत्तीसगढ़ी में एक शब्द है घरखुसरा।बस वही समझिए।
मेरी हार्दिक इच्छा थी कि भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन से ही घुमक्कड़ी की शुरुआत करुं।लेकिन ये संभव नहीं हो पाया। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की ये संभव नहीं हो पाया।साल 2022-2023 मेरे जीवन में कड़वी यादों का साक्षी बना।मन व्यथित और दुखी था। कड़वी यादों से इतर मन बहलाने के लिए और मानसिक शांति की चाह में मैं भगवान जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए आतुर था।यात्रा के लिए परिचितों से चर्चा किया तो संयोग से मुझे 5 साथियों का सहयोग भी पुरी यात्रा के लिए मिल गया।सड़क मार्ग से नीजी वाहन पर जाने का प्लान बना। जितने लोग जा रहे थे उसमें  से तीन लोगों  ने पूर्व में जगन्नाथ जी का दर्शन कर लिया था।तीन लोगों के लिए पहला अवसर था।छुरा से 5 लोग थे एक सर राजिम से थे।उनको पहले कई बार पुरी यात्रा का अवसर मिला था पर किन्हीं कारणों से नहीं जा सके थे, इसलिए वे भी लालायित थे। राजिम से महाडिक सर के आने के बाद हम छः लोग 16 मई की शाम को मित्र की गाड़ी में सड़क मार्ग से चल पड़े।निवास से निकलने के बाद 5 किमी ही आए थे कि गाड़ी का एक पहिया पंचर हो गया। लेकिन किसी ने इस घटना को नकरात्मक रुप से नहीं लिया। सबने एक स्वर में कहा कि चलो संकट टला और अब आगे कि यात्रा निर्विघ्न संपन्न होगी।हम छः लोग साथ चले थे उसमें से 4 कुशल ड्राइवर थे इसलिए कोई दिक्कत होने की संभावना नहीं थी लंबी यात्रा के दौरान।खरियार रोड नुआपड़ा मार्ग से होकर जाने का निर्णय लिया और चल पड़े।रास्ते में कोमाखान से होते हुए नर्रा गांव पहुंचे तब हमारे ग्रुप के महाडिक सर ने बताया कि महान मराठा शासक बिंबाजी भोंसले की समाधि इसी ग्राम में है। इतिहासकार बताते हैं कि बिंबाजी भोंसले मराठा शासन के दौरान यहां के सर्वेसर्वा थे। धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। रतनपुर के पास रामटेकरी में इन्होंने विशाल राम मंदिर बनवाया था। गाड़ी के संग मराठा शासन की उपलब्धि के बारे में बातें चलती रही।महाडिक सर स्वयं मराठा हैं अतः इस चर्चा के दौरान उनकी गर्वानुभूति स्वाभाविक थी।गर्मी का महीना था और शाम ढलने लगी थी। हम लोग छत्तीसगढ़ की सीमा को पार कर ओड़िशा की सीमा को स्पर्श करने वाले थे।तभी घनश्याम ने कहा कि चलो कुछ नास्ता कर लें। फिर उसने घर से लाया चना मुरमुरा और पोहे का जबरदस्त भेल तैयार किया। घनश्याम हमारी टीम के भोजन प्रभारी थे। उसके साथ रहो तो कभी भूखे नहीं सकते।बाहर निकलने के बाद वो भरपूर स्टाक लेकर चलते है खाने पीने की चीजों का।हल्का नास्ता के बाद निकल पड़े ओडिशा की ओर... भगवान जगन्नाथ स्वामी की दर्शन अभिलाषा लिए... शेष अगले पोस्ट में 

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

परछी

 


ग्रामीण भारत की बात ही अनूठी होती है। सर्वजनहिताय सर्वजन सुखाय की भावना से भरपूर ग्राम्यांचलों के उच्च आदर्शों को देखकर भारत की ग्राम्य संस्कृति पर गर्व होता है।

वैसे भी भारत को गांवों का देश कहा जाता है। छत्तीसगढ़ तो ग्राम्य संस्कृति के उच्च आदर्शों से सराबोर प्रदेश है। कुछ वर्ष पहले तक जब सरकारी योजनाओं से पक्के मकान नहीं बन रहे थे और लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तब ज्यादातर मकान कवेलू(खपरा) वाले होते थे। मिट्टी और लकड़ी से बने इन मकानों में रहने का आनंद पूछिए ही मत।हर दीवाली और तीज त्योहारों पर उसमें मिट्टी का लेपन और उसके बाद सफेद मिट्टी(छुही) से लिपाई पुताई होने के बाद मिट्टी की खुशबू से सराबोर घर की रौनक ही अलग होती थी। दीवारें बातें करती थीं।भले ही अब केमिकल युक्त रंग कंपनियां दीवारें बोल उठेंगी बताकर अपने उत्पाद का प्रचार कर रही है लेकिन उसमें तब वाली बात नहीं है।

 घर भले ही मिट्टी की होती थी पर भोले भाले ग्रामीणों के नेक विचार  आसमान की बुलंदियों को छूता था।ऐसे मिट्टी के घरों में सिर्फ परिवार की जरुरतों को ध्यान नहीं रखा जाता था अपितु जानवरों के लिए,घर के सदस्यों के लिए और घुमंतू जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए भी व्यवस्था होती थी।घर के मुख्य द्वार के सामने या अगल बगल में परछी बनाई जाती थी।जो बाहरी आगंतुकों के लिए एक तरह का रैन-बसेरा था। भिक्षाटन करने वाले लोग या बाहरी व्यापारी रात बिताने के लिए इन्हीं परछी का सहारा लेते थे।

परछी एक प्रकार का चौपाल होता था। जहां फुर्सत के क्षणों में विचारों का आदान-प्रदान,हास परिहास की बातें होती थीं। खेती-बाड़ी की बातें होती थीं। कितने ही योजनाएं और सपने इसी परछी में जन्म लेती थीं। बुजुर्गों के लिए तो घर का ये हिस्सा सबसे कीमती था। अपने हमउम्र लोगों के साथ बीड़ी का सुट्टा लगाते उनके आनंद की कोई सीमा नहीं होती थी। बरसात के दिनों में परछी में पाटे पर बैठकर चाय पीने का आनंद अलौकिक होता था।जूट के रेशे से रस्सी अटने का यंत्र लिए बुजुर्गों का समय इसी परछी में बीत जाता था। बच्चियां कभी मिट्टी के खिलौने से खेलने आती तो कभी अट्ठा चॅंगा का रोमांच आजकल के लूडो से कहीं अधिक हुआ करता था। बरसात के दिनों में बैलगाड़ी के चक्के,बेलन आदि और बरसात के बाद हल आदि यहीं रख दिए जाते थे।

मैंने अपने बचपन के दिनों में बहुधा घुमंतू लोगों को परछी में रात्रि विश्राम करते देखा है।दिन के समय कभी कभी इसमें कसेर,बनिया और मनिहारी वाले भी अपना दुकान लगाया करते थे।इन रात्रि पथिकों के लिए गृहस्वामी भी सब्जी, लकड़ी आदि की व्यवस्था कर दिया करते थे।तब असुरक्षा की भावना नहीं थी।तब आज की तरह आधार कार्ड जैसे पहचान दस्तावेजों की जरूरत नहीं होती थी।

अब बनने वाले मकानों में जानवरों और बाहरी लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।परछी की जगह आजकल पोर्च बनाने का चलन है। जिसमें गृहस्वामी अपनी चौपहिया वाहन खड़ी करके अपनी आर्थिक समृद्धि का परिचय देता है और जिनके पास चारपहिया वाहन नहीं भी होता तो वो इस उम्मीद में पोर्च बनवा लेता है कि कभी ना कभी वो भी चारपहिया वाहन का मालिक बनेगा। सिर्फ मैं और मेरा वाले आज के दौर में इन परछियों की स्मृति ही शेष है।कभी कभी किसी गांव में इसका दिख जाना एक सुखद एहसास दिलाता है।शेष शुभ.... मिलते हैं अगले पोस्ट में 

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज ...