दईहान...एक लुप्त होती परंपरा
छत्तीसगढ़ में गौ-पालन की समृद्ध परंपरा रही है।पहले गांवों में प्राय:प्राय: हर घर में गाय रखी जाती थी और घर में अनिवार्यतः कोठा(गौशाला)भी हुआ करती थी।अब घर से गौशाला गायब है और गौशाला के स्थान पर गाड़ी रखने का शेड बना मिलता है; जहां गाय की जगह मोटरसाइकिल या कार खड़ी होती है। गांवों में पशुओं को चराने के लिए बरदिहा(चरवाहा या ग्वाला)रखा जाता है।गांव वाले उनको सालभर के लिए इस कार्य के लिए नियुक्त करते हैं और पशुओं की संख्या के आधार पर मेहनताना अनाज के रूप में देते है। छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहा जाता है तो पहले भी उनको धान दिया जाता था और आज भी धान ही दिया जाता है। गांवों में पशु चराने का कार्य प्राय: यदुवंशी ही करते हैैं।जो बड़े सवेरे हांक पारकर(उंची आवाज लगाकर) पशुओं को चराने के लिए गौशाला से खोलने का संदेश देते हैं।फिर गली से गौठान तक पशुओं को पहुंचाने का क्रम चल पड़ता है।कुछ अनूठे नियम भी देखने को मिलता है गांवों में।जैसे गांवों में दूध दुहने के लिए लगे चरवाहे(ग्वाले) को हर तीन या चार दिन के बाद पूरा दूध ले जाने का अधिकार होता है।इसे बरवाही कहा जाता है। सामान्यतः गाय ...