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अक्टूबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तिरिया जनम जी के काल....

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  आज दशहरे का पावन पर्व है।ये पर्व प्रतीक है अच्छाई की बुराई पर जीत का,सत्य की असत्य पर विजय का।सवेरे से मोबाइल में टेंहर्रा (नीलकंठ )के दर्शन हो रहे हैं,पर सचमुच इस दिन नीलकंठ का दर्शन मुश्किल होता है।पता नहीं दशहरे के दिन ये पक्षी कहां गायब हो जाते हैं?कहते हैं दशहरे के दिन नीलकंठ देखना शुभ होता है।ये पक्षी सामान्यतः आम दिनों में बिजली के तारों पर अक्सर बैठे दिखाई पड़ते हैं। संभवतः टेंहर्रा को भी दशहरे के दिन अपनी अहमियत का पता होता है ?तभी तो वो दशहरे के दिन आसानी से नजर नहीं आते। संपूर्ण देश में रावण का पुतला दहन कर विजयादशमी मनाने की परंपरा है। छत्तीसगढ़ में भी रावण दहन और रामलीला प्रचलित है।पहले गणेश विसर्जन पश्चात पितृपक्ष से रामलीला का रिहर्सल गांव गांव में चला करता था,लेकिन टीवी,डीवीडी और अब मोबाइल के आगमन से ये परंपरा लगभग-लगभग विलुप्त हो गई और रामलीला का मंचन समाप्त होने के कगार पर है। बड़ी मुश्किल से रावण दहन करने के समय राम रावण का युद्ध दर्शाने के लिए कलाकार मिलते हैं।      लेकिन इसके अलावा भी हमारे अंचल में में इस पर्व का एक क्षेत्रीय पहचान भी है। हमार...

ब्रम्हचारिणी स्वरूपा मां जटियाई

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 जैसा कि मैंने पिछले पोस्ट में बताया था कि मां जटियाई की महिमा के बारे में कुछ भी जानकारी प्राप्त होगी साझा करूंगा ।सो जानकारी प्रस्तुत है।  माता जगदंबे की महिमा निराली है।वह अपने भक्तों की पीड़ा हरने के लिए अनगिनत रूप में स्थान स्थान पर विराजित हैं। छत्तीसगढ़ अंचल में अनेक ग्राम्य देवी-देवताओं की उपासना की जाती है। मातृशक्ति की उपासक इस धान के कटोरा का एक छोटा सा विकास खंड मुख्यालय है छुरा,जो गरियाबंद जिले में अवस्थित है।छुरा से लगभग 9 किमी की दूरी पर स्थित है जटियातोरा ग्राम।इसी गांव से लगा हुआ जटियाई पहाड़ी जिसमें माता जटियाई विराजमान है।धरातल से लगभग-लगभग 400 फीट ऊंची पहाड़ी पर माता का मंदिर स्थित है।ऊपर पहाड़ी तक जाने के लिए किसी भी प्रकार की सीढ़ी आदि का निर्माण नहीं हुआ है।कुछ दूरी तक मुरूम का रास्ता है, लेकिन ज्यादा रास्ता पथरीला है। पहाड़ी पर चढ़ाई आसान नहीं है। चट्टानों के बीच टेढ़े-मेढ़े पगडंडियों से होकर पहाड़ी की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पडती है। जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं सांस फूलने लगती है।किसी को सांस संबंधी कोई परेशानी हो तो पहाड़ी पर चढ़ने का प्रयास बिल्कुल ना करे। मह...

केरापानी की रानी मां

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जगत जननी मां जगदम्बे की आराधना का महापर्व चल रहा है।कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के तांडव के बाद भी आस्था डगमगाई नहीं है,बस स्वरूप बदल गया है। बड़े बड़े पंडालों में देवी मूर्ति स्थापित करने की परंपरा में एक रूकावट सी आ गई। भीड़ इकट्ठी न हो, इसके लिए शासन ने कड़े निर्देश जारी किए हैं इस कारण अपेक्षाकृत धूमधाम कम दिखाई दे रही है। मंदिरों में माता के भजन आदि भी नहीं चल रहे है।अत्यंत सादगीपूर्ण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए साल 2020 इतिहास में सदैव याद रखा जायेगा। साल 2015 में आज ही के दिन यानि पंचमी तिथि को माता रानी माई के दर्शन लाभ का संयोग बना था।मुढीपानी के शिक्षकों के सान्निध्य में ये अवसर प्राप्त हुआ था।उसकी यादें आज भी मानस पटल पर अंकित है। रानी माता का दरबार ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच गौरागढ पहाड़ी श्रृंखला पर अवस्थित है। स्थानीय लोग इसे मलेवा डोंगरी कहते है।ये पहाड़ी ओडिशा की सीमा रेखा तय करती है और छत्तीसगढ़ को स्पर्श करती है।कभी ये क्षेत्र प्राचीन दक्षिण कौशल का अभिन्न हिस्सा था।इसी पहाड़ी पर सोनाबेडा नामक स्थान हैं जो भव्य दशहरे के लिए विख्यात है।साथ ही इस सोनाबेडा का संबंध भुंजि...

जटियाई डोंगर में....

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     इस नवरात्रि के तीसरे दिवस मां जटियाई धाम जाने का प्रोग्राम बनाया।फिर जाने के लिए अपनी मित्र मंडली के ठेलहा(फुरसतिये)लोगों को अपनी मेमोरी में सर्च किया।तब याद आया कि अभी डी कमल उपलब्ध है,उसी को पूछा जाये।फिर दोपहर एक बजे के करीब मैंने अपने चलित दूरभाष यंत्र से कमल को टुनटुनाया।उसकी ओर से आदरणीय अमिताभ बच्चन जी का कोरोना संदेश प्राप्त हो रहा था। संदेश समाप्ति के कगार पे था तभी कमल ने फोन उठाया और बताया कि वो बिल्कुल फ्री है,लेकिन खाना खाके बताता हूं,बोलके फोन रख दिया।दोपहर के लगभग दो बज गये उसका वापसी काल नहीं आया।शायद भाई साहब खा पीके निद्रादेवी के आगोश में चले गए हों।मेरा प्रोग्राम अब फेल होने के करीब था।अकेले जाने में रिस्क था।इस साल कोरोना के कारण देवी तीर्थ स्थलों में नवरात्र पर्व को स्थगित किया गया है।ज्योति प्रज्वलन और जंवारा का कार्यक्रम भी नहीं है। कहीं मंदिर में जाने पर कोई नहीं मिला तो??ये आशंका थी।तब सेंदबाहरा के एक शिक्षक से फोन पर जानकारी लिया तो उन्होंने बताया कि एक ही ज्योति जल रही है।दिन में लोग रूकते हैं शाम तक लौट जाते हैं। इतनी जानकारी साहस दिलाने क...

सुन्ना हे दाई गांव गली खोर....

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माता शेरावाली  आज नवरात्रि का दूसरा दिन है। लेकिन चारों तरफ सन्नाटा सा पसरा हुआ है।ना कहीं मांदर की थाप में जसगीत सुनाई पड़ रही है ना कहीं आरती का स्वर।कोरोना नाम के एक विदेशी दैत्य ने हाहाकार मचा दिया है।इस दैत्य का आतंक देश दुनिया के ऊपर सर चढ़कर बोल रहा है। मीडिया ने इसको इतना खौफनाक बनाकर प्रस्तुत किया कि आज ये हमारी आस्था पर भारी पड़ गया। पावन शारदीय नवरात्र का आनंदोल्लास सरकारी नियमों के दांव-पेंच में उलझकर रह गया। नवरात्र में मूर्ति स्थापना के लिए इतने अधिक शर्तें रख दी गई कि लोगों ने दुर्गोत्सव और मूर्ति स्थापना का विचार ही मन से निकाल दिया। सीसीटीवी कैमरे की अनिवार्यता, मूर्ति स्थापना के लिए अनुमति, रजिस्टर संधारित करना, भीड़ ना होने देने के सख्त निर्देश और भी ना जाने क्या-क्या??? पुरातन काल से जिन मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ा करती थी,आज वहां लोगों को दर्शन की अनुमति नहीं मिल पा रही है।कुल मिलाकर इस वर्ष की नवरात्रि का पर्व कोरोना की भेंट चढ़ गया। इसके पहले चैत्र नवरात्रि में भी जंवारा आदि का कार्यक्रम स्थगित किया गया था।पता नहीं कब तक ये सिलसिला चलेगा? मूर्ति बनाने की...

माता टेंगनही दर्शन

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जैसा कि मैंने पिछले पोस्ट में बताया था कि मैं और ललित मां टेंगनही दरबार की ओर चल पड़े थे,तब रास्ते में ललित भाई पहले और अब कि स्थिति में हुए परिवर्तन के बारे में बता रहे थे।उसने बताया कि पहले सडक के दोनों तरफ खूब पेड़ और झाड़ियां हुआ करती थीं।अकेले इस सडक पर चलने में डर लगता था।जंगली जानवरों के अचानक निकल आने का भय बना रहता था। कुछ बरस पहले यहां के आसपास रहनेवाले ग्रामीणों से पैसेवाले व्यापारियों ने बेहद कम कीमत पर जमीनों को खरीदा और अब उन जमीनों पर उन्होंने फार्म हाउस बना रखे हैं। पहाड़ी के नीचे वाला आसपास हिस्सा वीरान ग्राम टेंगनाभाठा के नाम से राजस्व रिकार्ड में दर्ज है।पर अब यहां भी आबादी का आगमन और बसाहट प्रारंभ हो गया है। बढ़ती जनसंख्या के कारण अब धरती का क्षेत्रफल कम पड़ने लगा है।ऐसे ही दुनिया भर की बातों का सिलसिला रास्ते भर चलता ही रहा थोड़ी देर बाद हम पहाड़ी के नीचे मौजूद थे।  ये पहाड़ी विकासखण्ड मुख्यालय छुरा से लगभग-लगभग 6 किमी की दूरी पर कोसमी-चुरकीदादर रोड के किनारे स्थित है और उंची पहाड़ी पर विराजमान है मां टेंगनही।वैसे ये रोड पड़ोसी राज्य ओडिशा को छत्तीसगढ़ से जोड़त...

पिछले दिनों में....

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      पिछले कुछ दिनों में इतनी व्यस्तता रही की लिखने का संजोग ही नहीं बना।हम दुनियादारी के लिए भले ही वक्त निकाल सकते हैं,मगर खुद के लिए,अपने शौक के लिए वक्त निकालना कभी कभी मुश्किल सा हो जाता है।कुछ ऐसा ही मेरे साथ पखवाड़ा भर होते रहा और मैं कोई नया पोस्ट नहीं डाल पाया। लेकिन इन पिछले दिनों के भीतर एक अच्छी बात ये हुई कि मेरा परिचय छत्तीसगढ़ के मशहूर ब्लागर और छत्तीसगढ़ के पर्यटन क्षेत्र और पुरातत्व में विशेष रुचि रखनेवाले श्री ललित शर्मा जी से हुआ। पिछले महीने ही उनको छत्तीसगढ़ की महामहिम राज्यपाल द्वारा छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों को देश विदेश में पहचान दिलाने लिए उनके योगदान को एक लाख रुपए की सम्मान राशि देकर सराहा गया।फिर उनसे मेरी बातचीत भी हुई। रौबदार व्यक्तित्व है उनका और जानकारी के महासागर भी हैं।उनके ब्लाग ललित डाट काम और अडहा के गोठ को अपार पाठक और प्रसिद्धि मिला है। वर्तमान में न्यूज एक्सप्रेस और दक्षिण कौशल टुडे का संपादकीय दायित्व संभाल रहे हैं।उनसे फोन में बातचीत मात्र से बहुत सी ज्ञानवर्धक जानकारी मिली।ये भी एक मजेदार संयोग है कि मेरे जान पहचान में ललि...