टिकट आज मनोरंजन के साधन आप सबकी हाथों में है। तकनीक ने इंटरनेट और मोबाइल के माध्यम से मनोरंजन के तमाम सामग्री को सहजता से उपलब्ध करा दिया है। लेकिन एक दौर वह भी था जब मनोरंजन के लिए लोकनाट्य,बाइस्कोप,सर्कस, खेलकूद और रेडियो ही मनोरंजन का साधन हुआ करती थी।फिल्म देखने के शौकीन लोगों के लिए फिल्मी मनोरंजन का तब एकमात्र साधन होती थी टूरिंग टॉकिज।ये टाकीजें विशेष अवसरों जैसे मेले या धार्मिक उत्सव आदि में आया करती थीं।बाद में टेलीविजन का दौर भी आया जब फिल्मी मनोरंजन की पहुंच घर घर तक हुई।हां तो हम बात करेंगे टूरिंग टॉकिज की।सत्तर अस्सी के दशक तक और उसके बाद भी स्थायी सिनेमा घर छोटे कस्बों में स्थापित नहीं हुए थे। फिल्म के शौकीन लोगों को तब फिल्म देखने के लिए बड़ी शहरों का सफर करना पड़ता था जो उस दौर में काफी महंगा और तकलीफ भरा होता था।छोटे कस्बों के लोगों को तब फिल्म देखने के लिए स्थानीय मेलों का बेसब्री से इंतजार हुआ करती थी जब टूरिंग टाकीज आती थी और फ़िल्म देखने का शौक पूरा होता था। हालांकि तब भी नई रिलीज फ़िल्में देखने को नहीं मिलती थी। पुरानी फिल्मों को देखकर ही फिल्मों के ग्रामीण और...
Sunder jankari he bro
जवाब देंहटाएं