शनिवार, 28 सितंबर 2024

पुरी धाम की ओर





 जय जगन्नाथ!!!

कल विश्व पर्यटन दिवस था।ये पोस्ट मैं कल ही डालने वाला था लेकिन कुछ कारण से नहीं हो पाया। पर्यटन का मतलब होता है घूमना।नये नये जगहों की सैर।ये स्थान धार्मिक स्थल भी हो सकते हैं या प्राकृतिक या कृत्रिम भी। कुछ लोग कुदरत की बनाई चीजें देखकर आनंदित होते हैं तो कुछ लोग मानव निर्मित कलाकृति देखकर खुश हो जाते हैं।वैसे मैं स्वभाव से ज्यादा घुमक्कड़ नहीं हूं। ज्यादातर घर में रहकर ही समय गुजारता हूं। मेरे जैसे प्राणियों के लिए छत्तीसगढ़ी में एक शब्द है घरखुसरा।बस वही समझिए।
मेरी हार्दिक इच्छा थी कि भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन से ही घुमक्कड़ी की शुरुआत करुं।लेकिन ये संभव नहीं हो पाया। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की ये संभव नहीं हो पाया।साल 2022-2023 मेरे जीवन में कड़वी यादों का साक्षी बना।मन व्यथित और दुखी था। कड़वी यादों से इतर मन बहलाने के लिए और मानसिक शांति की चाह में मैं भगवान जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए आतुर था।यात्रा के लिए परिचितों से चर्चा किया तो संयोग से मुझे 5 साथियों का सहयोग भी पुरी यात्रा के लिए मिल गया।सड़क मार्ग से नीजी वाहन पर जाने का प्लान बना। जितने लोग जा रहे थे उसमें  से तीन लोगों  ने पूर्व में जगन्नाथ जी का दर्शन कर लिया था।तीन लोगों के लिए पहला अवसर था।छुरा से 5 लोग थे एक सर राजिम से थे।उनको पहले कई बार पुरी यात्रा का अवसर मिला था पर किन्हीं कारणों से नहीं जा सके थे, इसलिए वे भी लालायित थे। राजिम से महाडिक सर के आने के बाद हम छः लोग 16 मई की शाम को मित्र की गाड़ी में सड़क मार्ग से चल पड़े।निवास से निकलने के बाद 5 किमी ही आए थे कि गाड़ी का एक पहिया पंचर हो गया। लेकिन किसी ने इस घटना को नकरात्मक रुप से नहीं लिया। सबने एक स्वर में कहा कि चलो संकट टला और अब आगे कि यात्रा निर्विघ्न संपन्न होगी।हम छः लोग साथ चले थे उसमें से 4 कुशल ड्राइवर थे इसलिए कोई दिक्कत होने की संभावना नहीं थी लंबी यात्रा के दौरान।खरियार रोड नुआपड़ा मार्ग से होकर जाने का निर्णय लिया और चल पड़े।रास्ते में कोमाखान से होते हुए नर्रा गांव पहुंचे तब हमारे ग्रुप के महाडिक सर ने बताया कि महान मराठा शासक बिंबाजी भोंसले की समाधि इसी ग्राम में है। इतिहासकार बताते हैं कि बिंबाजी भोंसले मराठा शासन के दौरान यहां के सर्वेसर्वा थे। धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। रतनपुर के पास रामटेकरी में इन्होंने विशाल राम मंदिर बनवाया था। गाड़ी के संग मराठा शासन की उपलब्धि के बारे में बातें चलती रही।महाडिक सर स्वयं मराठा हैं अतः इस चर्चा के दौरान उनकी गर्वानुभूति स्वाभाविक थी।गर्मी का महीना था और शाम ढलने लगी थी। हम लोग छत्तीसगढ़ की सीमा को पार कर ओड़िशा की सीमा को स्पर्श करने वाले थे।तभी घनश्याम ने कहा कि चलो कुछ नास्ता कर लें। फिर उसने घर से लाया चना मुरमुरा और पोहे का जबरदस्त भेल तैयार किया। घनश्याम हमारी टीम के भोजन प्रभारी थे। उसके साथ रहो तो कभी भूखे नहीं सकते।बाहर निकलने के बाद वो भरपूर स्टाक लेकर चलते है खाने पीने की चीजों का।हल्का नास्ता के बाद निकल पड़े ओडिशा की ओर... भगवान जगन्नाथ स्वामी की दर्शन अभिलाषा लिए... शेष अगले पोस्ट में 

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

परछी

 


ग्रामीण भारत की बात ही अनूठी होती है। सर्वजनहिताय सर्वजन सुखाय की भावना से भरपूर ग्राम्यांचलों के उच्च आदर्शों को देखकर भारत की ग्राम्य संस्कृति पर गर्व होता है।

वैसे भी भारत को गांवों का देश कहा जाता है। छत्तीसगढ़ तो ग्राम्य संस्कृति के उच्च आदर्शों से सराबोर प्रदेश है। कुछ वर्ष पहले तक जब सरकारी योजनाओं से पक्के मकान नहीं बन रहे थे और लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तब ज्यादातर मकान कवेलू(खपरा) वाले होते थे। मिट्टी और लकड़ी से बने इन मकानों में रहने का आनंद पूछिए ही मत।हर दीवाली और तीज त्योहारों पर उसमें मिट्टी का लेपन और उसके बाद सफेद मिट्टी(छुही) से लिपाई पुताई होने के बाद मिट्टी की खुशबू से सराबोर घर की रौनक ही अलग होती थी। दीवारें बातें करती थीं।भले ही अब केमिकल युक्त रंग कंपनियां दीवारें बोल उठेंगी बताकर अपने उत्पाद का प्रचार कर रही है लेकिन उसमें तब वाली बात नहीं है।

 घर भले ही मिट्टी की होती थी पर भोले भाले ग्रामीणों के नेक विचार  आसमान की बुलंदियों को छूता था।ऐसे मिट्टी के घरों में सिर्फ परिवार की जरुरतों को ध्यान नहीं रखा जाता था अपितु जानवरों के लिए,घर के सदस्यों के लिए और घुमंतू जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए भी व्यवस्था होती थी।घर के मुख्य द्वार के सामने या अगल बगल में परछी बनाई जाती थी।जो बाहरी आगंतुकों के लिए एक तरह का रैन-बसेरा था। भिक्षाटन करने वाले लोग या बाहरी व्यापारी रात बिताने के लिए इन्हीं परछी का सहारा लेते थे।

परछी एक प्रकार का चौपाल होता था। जहां फुर्सत के क्षणों में विचारों का आदान-प्रदान,हास परिहास की बातें होती थीं। खेती-बाड़ी की बातें होती थीं। कितने ही योजनाएं और सपने इसी परछी में जन्म लेती थीं। बुजुर्गों के लिए तो घर का ये हिस्सा सबसे कीमती था। अपने हमउम्र लोगों के साथ बीड़ी का सुट्टा लगाते उनके आनंद की कोई सीमा नहीं होती थी। बरसात के दिनों में परछी में पाटे पर बैठकर चाय पीने का आनंद अलौकिक होता था।जूट के रेशे से रस्सी अटने का यंत्र लिए बुजुर्गों का समय इसी परछी में बीत जाता था। बच्चियां कभी मिट्टी के खिलौने से खेलने आती तो कभी अट्ठा चॅंगा का रोमांच आजकल के लूडो से कहीं अधिक हुआ करता था। बरसात के दिनों में बैलगाड़ी के चक्के,बेलन आदि और बरसात के बाद हल आदि यहीं रख दिए जाते थे।

मैंने अपने बचपन के दिनों में बहुधा घुमंतू लोगों को परछी में रात्रि विश्राम करते देखा है।दिन के समय कभी कभी इसमें कसेर,बनिया और मनिहारी वाले भी अपना दुकान लगाया करते थे।इन रात्रि पथिकों के लिए गृहस्वामी भी सब्जी, लकड़ी आदि की व्यवस्था कर दिया करते थे।तब असुरक्षा की भावना नहीं थी।तब आज की तरह आधार कार्ड जैसे पहचान दस्तावेजों की जरूरत नहीं होती थी।

अब बनने वाले मकानों में जानवरों और बाहरी लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।परछी की जगह आजकल पोर्च बनाने का चलन है। जिसमें गृहस्वामी अपनी चौपहिया वाहन खड़ी करके अपनी आर्थिक समृद्धि का परिचय देता है और जिनके पास चारपहिया वाहन नहीं भी होता तो वो इस उम्मीद में पोर्च बनवा लेता है कि कभी ना कभी वो भी चारपहिया वाहन का मालिक बनेगा। सिर्फ मैं और मेरा वाले आज के दौर में इन परछियों की स्मृति ही शेष है।कभी कभी किसी गांव में इसका दिख जाना एक सुखद एहसास दिलाता है।शेष शुभ.... मिलते हैं अगले पोस्ट में 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

तीजा के लुगरा

 

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि हरतालिका तीज के रुप में विख्यात है। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह लोक पर्व तीजा के रुप में जाना जाता है।ये पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है।यह पर्व विवाहित महिलाओं को मायके से जोड़कर रखने वाला पर्व है। जन्माष्टमी के बाद हर बहन अपने भाई का इंतजार करती है।तीजा लेने के लिए जब कोई भाई बहन के ससुराल पहुंचता है तब बहन के साथ उनके बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है।यह इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें सभी गांव और परिवार की बेटी बहनों का एक साथ आगमन होता है। बरसों बाद विवाहित  महिलाओं की अपने हमउम्र सहेलियों से मुलाकात जब होती है तो बचपन की अनेक स्मृतियां ताज़ी हो जाती है जो उनके गृहस्थ जीवन में चल रही उठा पठक के बीच एक नये उत्साह का संचार करती है।तीजा का ये पक्ष सबसे महत्वपूर्ण है।

शादी के बाद बहन और बेटियां मायके सिर्फ विशेष अवसरों पर ही आ पाती है। इसलिए अपने बचपन की सहेलियों के साथ वक्त बिताने का अवसर उनको नहीं मिल पाता।तीजा ये अवसर लब्ध कराती है।

भाई बहन के बीच के संबंध को भी यह पर्व मजबूती प्रदान करता है।भाई अपनी क्षमता अनुसा  बहनों को खुश रखने का हरसंभव प्रयास करता है।इस पर्व में भाई चाहे जितनी भी व्यस्तता रहे समय निकालकर बहनों को तीजा लेने जरुर जाता है।दुर्भाग्यवश यदि किसी का भाई गुजर जाता है तो उसके बाद उनके पुत्र उस दायित्व का निर्वहन करता है और अपनी बुआ को तीजा लेने जाता है।ये तो इस पर्व का धवल पक्ष हुआ।लेकिन इसका एक स्याह पक्ष भी है ।कहीं कहीं जब मायके  में बेटी के सर पर से मां बाप का साया उठ जाता है तो मात्र भाई ही एकमात्र सहारा रह जाता है उसके लिए।ऐसे में अगर भाई का व्यवहार रुखा हो जाए तो बहनों के लिए मायके से संपर्क ही टूट जाता है। उम्र भर मायके के एक लोटा पानी के लिए तरसना किसी भी बहन या बेटी के लिए अत्यंत कष्टकारी होता है तो कहीं कहीं बहनें भी धन संपत्ति के लालच में भाईयों से ही विद्रोह कर बैठती है।ऐसा भी देखने में आता है।

साल 2023 में एक फिल्म आई थी चोरी-चोरी। इसमें अमीर खुसरो की पंक्तियों में मामूली फेरबदल करके आनंद बख़्शी साहब ने बेहद मार्मिक गीत लिखा है...अम्मा मोरी बाबुल को भेजो री।इस गीत में एक बेटी की व्याकुलता और मां की मजबूरियों का मार्मिक चित्रण है।कभी मौका मिले तो जरूर सुनियेगा। हां तो बात फिर से तीजा पर्व की करते हैं।

एक अनूठी बात ये भी है कि बहनें मायके में रहकर अपने सुहाग की रक्षा के लिए यह व्रत रखती है।एक दिन पूर्व रात्रि में करु भात का नियम रहता है।दूसरे दिन निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर सभी सुहागन अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती है।इस दिन तिजहारिन नदियों में रेत का शिवलिंग बनाकर पूजा करती है।तीजा के दूसरे दिन गणेश चतुर्थी को समस्त तिजहारिनें भाई द्वारा उपहार स्वरूप प्राप्त वस्त्र पहन कर भोलेनाथ और नंदी के पूजन पश्चात फलाहार कर व्रत तोड़ती हैं।इस दिन छत्तीसगढ़ के गांवों की गलियां ठेठरी,खुरमी जैसे पकवानों की गंध से सुवासित रहती है।सभी तिजहारिन एक दूसरे के घर मिल भेंट करने के लिए जाती हैं और तीजा का ये पर्व हंसी खुशी के साथ संपादित होता है।

इस पर्व को छत्तीसगढ़ के मशहूर संत कवि पवन दीवान ने छत्तीसगढ़ी भाषा में इन शब्दों में चित्रित किया है -

बच्छर म एक दिन आथे ये तीजा 

चुररुस ले बाजे करेला के बीजा

पहिरे बर मिलथे वो रंग रंग के लुगरा

लुगरा बर कर डारेन कूद कूद के झगरा

रात भर मसके हन करू करू भात

दिनभर उपास करेन नारी के जात

लेत बरेत चुल्हा म चढ़गे तेलई

झेंझरी के ठेठरी ल खा दिस बिलई

थूके थूक म बरा चूरे लार म सोंहारी

लटपट चबावत हे रोगही मुखारी

धकर धकर जीव करे लकर लकर बुता

हरु हरु चूरी अउ गरु गरु सुता

चल वो बिसाहिन घर बइठे बर जाबो

घरो घर जाबो अउ फेँकत ले खाबो

गाँव भर देख लेबो सबे के तीजहा

सही सही के सब दुःख ल तन होगे सिजहा

रोज रोज नइ पावन मइके के कोरा

फेर जल्दी आबे रे तीजा अउ पोरा।

तो लीजिए इस पोस्ट का आनंद ठेठरी खुरमी के साथ... मिलते हैं अगले पोस्ट में

चित्र साभार -श्री धनेश साहू, तिल्दा-नेवरा 


गुरुवार, 5 सितंबर 2024

कहीं दूर जब दिन ढल जाए....

 


फिल्म आनंद का ये खूबसूरत गीत आप सब ने जरुर सुना होगा। मुझे बेहद पसंद है और हो सकता है आप में से बहुतों को पसंद हो।दिन का निकलना और ढल जाना सृष्टि का नियमित चक्र है। इसमें कभी कोई ढिलाई नहीं होती।

हम सबके जीवन में भी रोज उम्मीदों का सवेरा आता है और कामयाबी या नाकामयाबी का तोहफा देके चला जाता है।अक्सर ऐसा होता है कि हम जो योजना भविष्य के लिए बनाते हैं वो ज्यादातर बार पूरा नहीं हो पाता। अनगिनत बार हम असफल हो जाते हैं।ऐसा लगने लगता है कि अब कुछ अच्छा होगा ही नहीं।

लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमें सतत् प्रयास करना चाहिए।शेष ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए। सिर्फ ध्यान इतना रखना चाहिए कि हमारे काम से किसी का अहित ना होता हो।हताशा के क्षण हर एक व्यक्ति के जीवन में आता है। कभी कभी तो कुछ रास्ता सूझता भी नहीं है।केवल शून्य नजर आता है।ऐसे मुश्किल समय में हमारे परिजन और मित्र ही काम आते हैं। इसलिए रिश्तों की डोर को थाम के रखना चाहिए।

सफलता की चकाचौंध भी बहुत घातक होती है।हमको कभी-कभी ऐसा भ्रम भी हो जाता है कि मैं जो भी करुंगा उसमें कामयाबी ही हाथ लगेगी। लेकिन कामयाबी का लगातार स्वाद चखने वाला व्यक्ति नाकामयाबी की एक चोट से बिखर भी जाता है। इसलिए सफलता के नशे में झूमते रहना और असफलता के दुख में मायूस हो जाना भी उचित नहीं है।

वैसे दुनिया का चलन ऐसा है कि कामयाब आदमी को सब सलाम ठोंकते हैं और नाकामयाब आदमी से कन्नी काटने लगते हैं। पिछले दिनों उज्जैन यात्रा के दौरान मैंने रेलवे प्लैटफॉर्म पर दो दृश्य देखे।एक दृश्य में एक व्यक्ति हाथी पांव के बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद अपने बड़े से पैर को घसीटते घसीटते भीख मांगते जीवन जीने के प्रयास में लगा हुआ है।दूसरे दृश्य में दोनों पैरों से दिव्यांग व्यक्ति एक छोटे से लकड़ी के तख्त पर चक्के लगाकर लोगों के बैग में खराब हो चुके जीपर लगाने का काम खुश होकर कर रहा था।जब इतनी परेशानी के बाद भी लोग हौसला रख सकते हैं तो सिर्फ कुछ विपरीत आर्थिक, मानसिक या शारीरिक परिस्थिति से घबराकर जीवन की चुनौती से मुंह फेरना सही नहीं होगा।

बस धीरज का दामन हमको थामे रखना होगा। वक्त बदलने तक। तकदीर के पलटने तक।शेष फिर कभी...

ब्लॉग में जो तस्वीर मैंने लगाई है वो आदरणीय मंगलमूर्ति सोनी जी द्वारा चिल्का झील में खींची गई है। बेहतरीन फोटोग्राफी के लिए उनको धन्यवाद 


बुधवार, 4 सितंबर 2024

ठठेरा के ठ...

 

फोटो गूगल से साभार 


जो लोग अभी मेरे पोस्ट को पढ़ पा रहे हैं उन सभी ने हिंदी वर्णमाला जरुर पढ़ी होगी,और जब वर्णमाला पढ़े होंगे तो ठठेरा के ठ से जरूर परिचित होंगे। लेकिन क्या अब हम अपने बच्चों को दिखा पायेंगे कि ठठेरा क्या होता है?

बहुत से कारीगर और कलाकार इस ज़माने की बेतहाशा तरक्की के कारण बेकार हो गये। मशीनीकरण ने पारंपरिक तरीके से काम करने वाले कारीगरों को बेरोजगार कर दिया। इन्हीं में से एक थे ये ठठेरे।ठठेरा कारीगर पुराने हो चुके बर्तनों की कलई करके और मरम्मत करके फिर से नया बना देते थे।आज यूज एंड थ्रो की पालिसी का दौर है।किसी के पास मरम्मत करने और कराने की फुर्सत नहीं है।वैसे अब कलई करना क्या होता है ये प्रश्न आ सकता है?

तो मेरी मंद मति के अनुसार बताना चाहूंगा कि कलई करने का मतलब होता है ऐसे बर्तन जिनमें जोड़ होता है उसके जोड़ वाले भाग को एक प्रकार के काले लसदार रसायन से लेपित करके जोड़ा जाता है ताकि उसमें किसी प्रकार का रिसाव ना हो। वैसे कलई खुलना एक मुहावरा भी है जिसका आशय रहस्योद्घाटन होता है।

हमारे बचपन के दिनों में आंध्रप्रदेश या तमिलनाडु से एक व्यक्ति आता था।लोग उसे मद्रासी बोलते थे।वही पुराने बर्तनों को नये बनाने का काम करता था।मतलब वो ठठेरा था।ठठेरा नामकरण ऐसे कारीगरों द्वारा बर्तनों को सुधारते समय निकलने वाली ठक ठक के आवाज के कारण हुआ।

वैसे ही 90 के दशक में जब जनरल स्टोर्स और फैंसी स्टोर्स नहीं खुले थे तब यूपी से खोमचे वाले आते थे।सर पर अपना खोमचा उठाए आवाज लगाते थे।ले ताला कंघी साबुन....।इस आवाज को सुनकर बच्चे भी दौड़े आते थे। क्योंकि उनके पास सीटी और झुनझुना भी रखा होता था।उस वक्त की फैशनपसंद महिलाओं का फेवरेट क्रीम था बादल स्नो।कांच की एक बड़ी सी नीली शीशी में आती थी।खोमचे वाले तंबाकू की डिब्बी,साबुन डिब्बी और बादल स्नो खूब बेचा करते थे।समय के साथ ये लोग भी लुप्त हो गए।

पास के गांव से एक आदमी आता था बर्तन में नाम लिखने वाला।आते ही आवाज लगाता... बर्तन में नाम लिखा लो।तब मेरी दादी घर के एक न एक कांसे या पीतल के बर्तन में मेरा नाम जरुर लिखवाती थी एक अठन्नी में।छोटी हथौडी और कील की मदद से बहुत सुंदर नाम लिखता था वो कारीगर।वो बर्तन आज भी है घर में।कुछ शौकीन लोग साइकिल की हैंडिल पर भी अपना या अपने बच्चे का नाम लिखवाते थे।तब दौर कांसे और पीतल के बर्तनों का था।सबके घर में वही बर्तन होते थे।पास पडौस में आत्मीयता भरपूर होती थी इसलिए सब्जियों का खूब लेन-देन होता था।ऐसे में नाम लिखे होने के कारण एक जैसे बर्तनों के मिलने पर पहचानने में सुविधा होती थी।अब स्टील, प्लास्टिक और क्राकरी का चलन है।आत्मीयता तो गधे का सींग हो गया। इसलिए बर्तन में नाम लिखवाने की जरूरत ही नहीं रह गई।

फिलहाल बस इतना।कोई और भूला बिसरा कारीगर आप लोगों को याद आए तो मुझे ज़रूर बताइए....

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

पोरा और पोला

















पोरा और पोला शब्द को लेकर एक पोस्ट कल ही वाट्सएप पर देखने को मिला। जिसमें बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्योहार पोरा को आजकल पोला कहकर प्रचारित किया जा रहा है। महाराष्ट्र और अन्य कुछ प्रदेशों में भाद्रपद अमावस्या को पोला मनाया जाता है जिसमें बैलों को सजाकर पूजन किया जाता है और कृषि कार्यों में उनके सहयोग के लिए आभार प्रकट किया जाता है।
पोला शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है खोखला जिसे छत्तीसगढ़ी में पोंडा कहा जाता है जबकि पोरा का आशय छत्तीसगढ़ी में छोटे छोटे खिलौने बर्तन से है।यथा-चुकी पोरा। छत्तीसगढ़ में प्रचलित पोरा त्योहार में नंदी स्वरूप बैल की छोटी छोटी मिट्टी से निर्मित बैलों और चुकी पोरा जांता की पूजा की जाती है। जिन्हें स्थानीय पकवान चीला,गुलगुला,ठेठरी,खुरमी का भोग लगाया जाता है। विशेष रूप से इस दिन गुड़ का मीठा चीला(गुरहा चीला) चढ़ाया जाता है।पूजन के पश्चात इन बैलों को छोटे छोटे बच्चे रस्सी बांधकर घूमाते रहते हैं और खेलते हैं।चुकी पोरा लड़कियों का खिलौना होता है जबकि नॅंदिया बईला(नंदी बैल) को लड़के खेलते हैं।पोरा मनाने के बाद गांव में अपनी बेटियों और बहनों को ग्रामीण तीजा मनाने के लिए उनके ससुराल से लिवाकर लाते हैं।
कुछ गांवों में इस अवसर पर खेल प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।पोरा त्योहार में बस यही स्वरूप नहीं है इस पर्व का अपितु ये पर्व धान की फसल के गर्भधारण संस्कार का पर्व होता है।पोरा की पूर्व रात्रि में गांव के बुजुर्ग और बईगा गांव के शीतला मंदिर(माता देवालय ) में जाकर गांव की सुख समृद्धि और अच्छे फसल की कामना के साथ ग्राम्य देवी देवताओं की पूजा करते हैं।इस दिन कृषि संबंधी कार्य और निर्माण संबंधी कार्य पूर्णतः निषिद्ध रहता है।इस विधान को गरभचरु के नाम से जाना जाता है।सवेरे पूजन के पश्चात गभोट(धान के पौधे में बीज बनने/दूध बनने की अवस्था) वाले पौधे को लाकर गांव के हर घर में मुख्य प्रवेश द्वार पर खोंसा जाता है। ग्रामीण बईगा को इसके लिए अन्नदान और द्रव्यदान देकर विदा करते हैं।पोरा पर्व के उपरांत ही घास(कांदी) को गट्ठर बांधकर लाया जा सकता है उसके पूर्व नहीं लाया जाता।ग्राम्य जगत की अपनी रीति नीति होती है जिसमें सूक्ष्म वैज्ञानिक या आध्यात्मिक विचारधारा समाहित होता है।इनका विवेचन किये जाने की आवश्यकता है।
बैल को हिंदू धर्म में धर्म का स्वरूप माना गया है।बैल को ही भगवान शिव ने अपना वाहन बनाया है। विभिन्न सभ्यताओं के पुरातत्व अभिलेखों में बैलों का चित्रण मिलता है,जो मानव जाति के उत्थान में बैलों के योगदान को दर्शाता है।वृषभ राशि का प्रतीक भी बैल है।शिव मंदिर की कल्पना नंदी के बिना नहीं की जा सकती।इसलिए बैल पूजित होते हैं। छत्तीसगढ़ के गांवों में गोल्लर(सांड) छोड़ने की परंपरा रही है।जिस बैल को गोल्लर छोड़ दिया जाता है वह कृषि कार्यों से मुक्त होकर स्वच्छंद विचरण करते रहता है। संभवतः इसलिए स्वच्छंद विचरण करने वाले लोगों के लिए "गोल्लर ढिलाय हे" उक्ति का प्रयोग किया जाता है।लोक जीवन में प्रचलित बहुत से रीति रिवाजों का समय के साथ ह्रास हो रहा है। इनके संवर्धन के लिए नई पीढ़ी को आगे आना चाहिए और अपने अनमोल सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रयास करना चाहिए।मेरे विचार से छत्तीसगढ़ में पोरा का ही पर्व मनाया जाता है।इस बारे में आप लोगों का क्या कहना है।जरुर अवगत कराएं...और मुझसे त्रुटि हो तो भी सूचित करें...






 

सोमवार, 2 सितंबर 2024

ये हौसले की उड़ान है


 कल सवेरे एक मित्र के वाट्सएप स्टेटस में एक खबर देखकर बहुत खुशी हुई।खबर थी हमारे क्षेत्र के 2 नौनिहालों के एमबीबीएस के लिए चयनित होने का।खबर इसलिए भी खास थी कि ये समूचे अंचल को गौरवान्वित करने वाली खबर थी।साथ ही एक परिचित से जुड़ी थी।और इन सबसे बढ़कर ये खबर दूसरे बच्चों को अध्ययन  के लिए प्रेरित करने वाला खबर था।सुदूर आदिवासी अंचल में  निवासरत जनजातीय समूह के बच्चों  का नीट जैसी प्रवेश परीक्षा पास कर चयनित होना निश्चित रुप से आदिवासी क्षेत्रों के लिए शुभ संकेत है।

सरकार की"प्रयास विद्यालय" जैसी पहल भी नि:संदेह साधुवाद का पात्र है जिन्होंने आदिवासी बच्चों के हौसलों को उडा़न और उनके सपनों को पंख प्रदान किया है।

"प्रयास आवासीय" विद्यालय योजना का उद्देश्य नक्सल प्रभावित जिले और आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को बेहतर शिक्षा देना है। स्टूडेंट्स को कॉम्पिटिशन एग्जाम की तैयारी भी कराई जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए विशेष कोचिंग दी जाती है।इन आवासीय विद्यालयों से हर साल कई बच्चों का बड़े शिक्षण संस्थानों में सिलेक्शन होता रहा है।छत्तीसगढ़ में 9 प्रयास आवासीय विद्यालय हैं।

इस खबर में जिन2 बच्चों का नाम छपा है उस में से जिस बालिका का नाम आया है उनके गुरुजनों और उनके पापा से मेरा परिचय रहा है। उनके शिक्षकों ने बच्ची की क्षमता को परखा और भरपूर प्रोत्साहित किया। साथ ही उनके पिताजी जगतराम कंवर के मेहनत और लगन को भी सराहा जाना चाहिए।

जगत भाई से स्कूल के जमाने से परिचित हूं।जब मैं मिडिल स्कूल में था वे मुझसे 2 कक्षा आगे पढ़ रहे थे।तब वे अपने गांव से पैदल ही 4 किमी चलकर छुरा पढ़ने आते थे। संभवतः परिस्थितिवश वो बहुत ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए और एक कपड़ा दुकान में नौकरी करने लगे।अपनी ईमानदारी और लगन से उन्होंने अपना स्थान बनाया और संभवतः छुरा नगर में एक ही दुकान में लंबे समय तक काम करने के उनके रिकार्ड को अब शायद ही कोई तोड़ पाए।जब उनके दुकान मालिक ने अपना होलसेल बड़ा दुकान खोला तो उस दुकान को उन लोगों ने उन्हीं के संचालन में छोड़ दिया। वर्तमान में अब वे कपड़ा दुकान के संचालक हैं।

ईमानदारी और मेहनत का फल देर सवेर जरुर मिलता है।इस बात को जगत भाई ने साबित किया है। फिलहाल जगत भाई और उनके परिजनों को बेटी के चयन पर बहुत बहुत बधाई....

रविवार, 1 सितंबर 2024

बैठे ठाले


 एक दौर था जब ब्लाॅगिंग में खूब कलम घिसाई चलती थी। नई पुरानी बातों पर खूब लिखा करता था। लेकिन बीते सालों में कुछ ऐसी घटनाओं से साक्षात्कार हुआ कि लेखन लगभग-लगभग थम सा गया है।

कुछ बदलाव भी इन दिनों देखने को मिल रहा है।अब लोग मोबाइल पर कुछ पढ़ने के बजाय यूट्यूब के शार्ट विडियो को स्क्राल करने में अधिक आनंद महसूस करते हैं।लिखाई पढ़ाई वाला दौर भी गुजरने वाला है समझिए। पाठकों की प्रतिक्रिया भी अब ज्यादा नहीं आती।पाठक की प्रतिक्रिया ही लेखन के लिए टानिक का काम करती है।टानिक स्वाद में कड़वा रहे या मीठा लेकिन सेहत के लिए फायदेमंद जरुर होता है।ठीक वैसे ही अच्छी बुरी दोनों प्रतिक्रिया लेखन के लिए लाभकारी होता है।
ब्लॉग लेखन में अभनपुर निवासी आदरणीय ललित शर्मा जी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है।एक समय में वे ब्लॉगिंग की दुनिया के स्टार रहे हैं और आज भी छत्तीसगढ़ की पुरातन परंपराओं और इतिहास के ऊपर लेखन में सक्रिय है। नवोदित लेखकों को भी अपने वेब पोर्टल में भरपूर मौका देते हैं। उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात का अवसर भी मिला है। छत्तीसगढ़ में प्रचलित रामलीला के ऊपर उनकी किताब को उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित किया गया है।
छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी संस्कृति पर लेखन और संकलन के लिए उनका प्रयास स्तुत्य है।
ब्लॉग लेखन आनंददायक काम है।जब किसी विषय पर लिखने का मूड बनता है तो बस लिखते चले जाते हैं।किसी प्रकार की कोई विशेष तैयारी नहीं करनी पड़ती। महिनों बाद फिर से कुछ लिखने का मन बना है। उम्मीद है कि कुछ लिख पाऊं....मेरे मार्गदर्शक पाठकों से मुझे स्नेह मिलता रहेगा ऐसी आशा है।

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज ...