संदेश

2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वक्त से डरकर रहें...

चित्र
 व्यस्तता इतनी अधिक है कि लेखन गतिविधियां लगभग अवरूद्ध सा है। इसलिए ब्लाॅग अभी थम सा गया है। लेकिन कल और आज में दो लोगों की जिंदगी में आए मोड़ को देखकर ताज्जुब में हूं‌।कल जनजातीय ग्राम कनफाड़ में जाना हुआ। वहां एक धाकड़ और वजनदार व्यक्तित्व वाले जनजाति नेता थे। पिछले दो सालों से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी।सोचा आया हूं तो हालचाल पूछता चलूं। फिर उनके घर के सामने जाकर आवाज लगाया।जब दो तीन बार पुकारने पर भी कोई जवाब  नहीं आया तो उनके खुले द्वार से झांककर देखा तो आंगन नजर आया जहां वो बुजुर्ग मुझे अपने हाथ पैर से घिसटते नजर आए। मैं स्तब्ध था, एक दौर था जब वो शख्स धड़धड़ाते हुए किसी भी कार्यालय में चला जाता था और साइकिल में ही कई किलोमीटर की दूरी नाप देता था।आज घिसटकर चलने पर मजबूर है। उनकी दशा देखकर दुख हुआ। गांव वालों से पूछने पर पता चला कि पिछले साल भर से उनकी ऐसी ही दशा है। वक्त भी अजीब सितम ढाता है। आज नजदीकी गांव सेम्हरा में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लोक कला मंच लोरिक चंदा की प्रस्तुति देखने गया तो वहां भी एक आश्चर्य मेरा इंतजार कर रहा था। वहां लगभग पागलों जैसी हालत में एक शख्...

गांधी के मायने....

चित्र
 फोटो सोशल मीडिया से साभार आज भारत के दो विराट व्यक्तित्व वाले महामानवों की जयंती हैं।किनकी है?अगर ये पूछने की और बताने की नौबत आती है,तो निश्चित रूप से हमें शर्म आनी चाहिए अपने हिंदुस्तानी होने पर!! आज विश्व अहिंसा दिवस भी है। अहिंसा के परम उपासक बापू के सम्मान में उनकी जयंती को विश्व ने अहिंसा दिवस के रूप में मान्यता देकर उनको आदरांजलि दी है। लेकिन ऐसे विराट और महान व्यक्तित्व के लिए पिछले कुछ सालों से कुछ अल्पबुद्धियों और अधकचरे ज्ञान के धनी लोगों ने सोशल मीडिया पर घृणा का अभियान चला रखा है। गांधीजी की फोटो पर अभद्र मीम्स बनाये और प्रसारित किए जा रहे हैं।इन लोगों के दिमाग में एक प्रकार की कुंठित मानसिकता घर कर गई है।उनको लगता है कि भारत विभाजन के लिए गांधीजी ही जिम्मेदार हैं।अनेक क्रांतिकारियों की शहादत गांधी की उदासीनता के कारण अकारण हुई। जिस बापू को टैगोर ने महात्मा, बोस ने राष्ट्रपिता और अखिल विश्व ने अहिंसा के पुजारी की पदवी से अलंकृत किया उनके योगदान पर आज की पीढ़ी सिर्फ वाट्सएप ज्ञान के बूते उनके चरित्र पर उंगली उठाती है तो क्षोभ होता है। गांधी का त्याग अतुलनीय है। स्वतंत्...

ये जीवंत देव प्रतिमाएं...

चित्र
 आज अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस है।जीवन की विदाई बेला पर खड़े अनुभव के पिटारे को सम्मानित करने का दिन।साल 1991 से 1 अक्टूबर को बुजुर्गों के सम्मान के लिए समर्पित किया गया है। लेकिन इस एक दिन को छोड़ बाकी दिनों में क्या बुजुर्गों का सम्मान नहीं किया जाना चाहिए। मनुष्य में एक बड़ी गंदी आदत है, जो चीज उनके काम की रहे या जब तक उनसे कोई लाभ मिल रहा हो तभी तक वह उसकी कद्र करता है। भौतिकतावादी इस युग में अब बुजुर्गों को भी किसी सामग्री की तरह उपयोगी और अनुपयोगी में वर्गीकृत कर दिया गया है। शारीरिक शक्ति से हीन और मानसिक रूप से खिन्न बुजुर्गों को आज हाशिये पर रखा जा रहा है।आज घर घर में बुजुर्गों का अपमान होता है।किसी के पास धन संपत्ति हो तब बात अलग हो जाती है। बचपन के दिनों में पढ़ी मुंशी प्रेमचंद की लिखी दो कहानियों "पंच परमेश्वर" और "बूढ़ी काकी" की दोनों बुजुर्ग पात्रों की तस्वीर आज भी आंखों के आगे बरबस आ जाता है। विशेष रूप से बूढ़ी काकी की वो दीन-हीन बुजुर्ग, जिसका अत्यंत मार्मिक चित्रण मुंशीजी ने किया है। कहानी पढ़ते पढ़ते ही बरबस आंखें छलक आती है। बुढ़ापे में जीभ से स्...

विद्रोह जरूरी है!!!

चित्र
 कुछ महीनों से ब्लॉग लेखन बंद था।कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा था।वैसे मेरे लेख को पसंद करने वाले लोग सतत मेरा उत्साह वर्धन ब्लाग पर आकर या मेरे निजी नंबर से संपर्क कर करते रहते हैं,जो मेरे ब्लाग लेखन में निरंतरता के लिए टानिक का काम करता है।लेखन का कार्य भी दिमाग के ऊपर आश्रित होता है।कभी कभी लिखने के लिए जगह और विषय मायने नहीं रखती, धाराप्रवाह मन का आवेग शब्दों में उतर जाता है और कभी कभी पूरी तैयारी के साथ भी लिखने के लिए बैठो तो कुछ भी नहीं सूझता।मेरे मित्रों ने लेखन के लिए सदैव मेरा उत्साह बढ़ाया है।उनका सतत सहयोग भी मुझे मिलता है।मैं मित्रों को परेशान करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूं और जब वे सीधे नहीं मानते तो बरपेली(जबरदस्ती)उनको सहयोग देने के लिए बाध्य करता हूं।  पिछले दिनों एक परिचित से मुलाकात हुई। पिछले वर्ष वे अकस्मात पक्षाघात के शिकार हुए और उसके चेहरे के दांये भाग और हाथ को लकवा मार गया था। लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और प्राकृतिक उपचार की ताकत से अब अच्छी हालत में हैं।दैनिक दिनचर्या को स्वयं कर लेते हैं अकेले साइकिल चला पा रहे हैं...

स्कूली किताबें

चित्र
 हमारे देश में बच्चों की पढ़ाई लिखाई को चौपट हुए डेढ़ साल होने को है।चीन देश की आफत हमारे देश सहित विश्व भर में कहर बरपा रही है।अमूमन बहुत से देशों में पढ़ाई लिखाई ठप्प पड़ा है।स्कूलों और कॉलेजों में ताले लगे हैं। हालांकि पढ़ाई-लिखाई का कार्य यथावत रखने के लिए आनलाईन पढ़ाई जैसे  वैकल्पिक उपायों का सहारा लिया जा रहा है।परिस्थितियों के अनुकूल होने के बाद ही सभी प्रकार के नुक़सान की भरपाई हो सकती है, लेकिन जो अकारण काल के ग्रास बने उनकी और बच्चों के बीते समय की पढ़ाई के नुक़सान की भरपाई कभी नहीं हो सकती।आज सोशल मीडिया में किसी ने बचपन के दिनों की एक कविता शेयर किया तो गुजरे दौर की यादें चलचित्र की भांति चलायमान हो गई। आज मुझे अपने स्कूली दिनों की भाषा की किताबें और उसमें लिखी कविता और कहानियां याद आ रही है। सचमुच तब कितनी दिलचस्प हुआ करती थी हमारी स्कूली किताबें।उस समय ना तो आज की तरह प्राइवेट स्कूलों की भरमार थी और ना ही आज की तरह ताम-झाम और फालतू के चोचले। उस समय सब बच्चे विद्यार्जन के लिए सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते थे चाहे उनके पालक व्यापारी हों, कर्मचारी हों या किसान हो। सब ...

एक छोटी सी कहानी अक्षय तृतीया की

चित्र
  बहुत दिनों से कुछ लिखना नहीं हो पा रहा है।महामारी ने इतनी दहशत फैला रखी है कि कुछ भी सूझता नहीं है।फिर भी आज कुछ लिखने का मन किया तो एक कहानी लिखा हूं।एक सुखांत प्रेमकथा... अक्षय तृतीया... आज अक्षय तृतीया है।कहते हैं इस दिन कोई भी कार्य अगर शुरू किया जाये तो वह अवश्य सफल होता है।अक्षय तृतीया स्वयंसिद्ध शुभ मुहूर्त है। इसलिए छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन हजारों की संख्या में शादी ब्याह रचाया जाता है।कुछ जीवनपर्यंत साथ निभाने के लिए रचाई जानेवाली सचमुच की शादियां और कुछ गुड्डे-गुड़ियों वाली शादी जिसे बच्चे आपस में मिल जुलकर रचाते हैं। ऐसे ही गुड्डे-गुड़ियों की शादी में तो मिले थे, सरला और सुधीर! बच्चों ने बहुत जिद करके सुधीर को लड़के पक्ष की ओर से बाराती बना लिया था, और सरला तो अपनी ममेरी बहन की जिद के कारण उस शादी में शामिल हुई थी।सरला अभी पढ़ाई कर रही थी अपने मामाजी के घर में रहकर जबकि सुधीर सालभर पहले ही अपनी पढ़ाई पूरी करके गांव लौटा था।सुधीर अच्छा खासा पढ़ा लिखा था, इसलिए उसको घर की खेती किसानी में कुछ खास रूचि नहीं थी।वह घर में रहकर ही नौकरी के लिए अर्जियां देते र...

चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है ढल जायेगा

चित्र
आप सबको कभी कभी महसूस नहीं होता कि ये पूरी दुनिया मैं.. मैं..मैं.... चिल्लाने वालोें से भरी पड़ी हैं।आपने क्या सोचा? हम किसकी बात कर रहे हैं....बकरी की!!! जी नहीं; हम यहां बकरियों की बात नहीं कर रहे हैं।हम बात कर रहे हैं उन लोगों की, जिनको ये भ्रम है कि दुनिया उनके भरोसे चल रही है।वो नहीं रहेंगे तो दुनिया डगमगाने लगेगा। ऐसा सोचने वाले लोग!! मैंने ये किया,मैंने वो किया, मैं ये जानता हूं, मैं वो जानता हूं,मुझे ये चीज आती है, मैं सब जानता हूं कहने वाले।याने मैं ही मैं का रट्टा मारने वाले आत्ममुग्ध इंसान। वैसे ऐसे लोगों को ढूंढने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है।हम सबके आसपास ही ऐसे लोग बेहिसाब तादाद में अगल-बगल में खड़े मिलते हैं।हमारे धार्मिक ग्रंथों में बताया भी गया है कि इंसान मिट्टी से बना है और अंत में मिट्टी में ही मिल जायेगा। छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा पर ये मानता कौन है? समझता कौन है? धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का टाईम किसके पास है? कम से कम आज की पीढ़ी के पास तो बिल्कुल नहीं हैं। तमाम सुख सुविधाओं से लैस आज की पीढ़ी आईफोन,सोशल मीडिया, आनलाईन गेमिंग और उल्लू जै...

ड्रामे की किताब

चित्र
 आज एक किताब की दुकान में जाना हुआ। पिछले साल से स्कूल कालेज बंद चल रहे हैंं। पर बच्चों की परीक्षा आयोजित होना तय है, इसलिए गाईड और प्रश्न बैंक वगैरह सजाके दुकानदार बैठा था।दुकानदार परिचित था इसलिए थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें होती रही।तभी मेरी नजर कुछ पुरानी पतली से पुस्तकों पर पड़ी।समय के मार से धूल खाते पड़ी थी।शायद सालों से उन पतली पुस्तकों की माॅंग नहीं थी। मैंने उन पुस्तकों पर पड़ी धूल झाड़कर देखा तो समझ में आया कि ये किताबें तो नाटकों की हैं,जो पहले गांवों के रंगमंचों पर खेला जाता था। तब का जमाना भी क्या जमाना था? मनोरंजन के विशेष साधन ना थे। विशेष अवसरों पर ही नाचा या अन्य मंचीय कार्यक्रमों का संयोग बनता था।अक्सर दशहरे के अवसर पर रामलीला होता था।और अन्य अवसर के लिए ड्रामा की मंचीय प्रस्तुति होती थी। जिनमें सामान्यतः सामाजिक विषयों का फिल्मी टच के साथ मसालेदार कहानी हुआ करती थी।डाकू,सती,दहेज और रामायण तथा महाभारत के विभिन्न प्रसंगों के नाटक हुआ करते थे। नाटकों के शीर्षक भी दिलचस्प होते थे।जैसे-राखी के दिन, इंसाफ की आवाज,लहू की सौगंध,गरीब का बेटा,जयद्रथ वध,राजा हरिश्चंद्र,की...

हमारे बापू

चित्र
 मोहनदास करमचंद गांधी;नाटे कद का एक ऐसा विराट व्यक्तित्व जिसके आगे बड़े से बड़े व्यक्ति का कद भी बौना साबित होता था।एक ऐसा करिश्माई शख्सियत जिसने पूरी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया और सत्य की ताकत का एहसास कराया।पूरा भारतवर्ष उनको महात्मा,बापू और राष्ट्रपिता के संबोधन से संबोधित करता है।उनके व्यक्तित्व से समूचा विश्व प्रभावित रहा है। आज के युवाओं के चहेते आईफोन बनाने वाली कंपनी "एप्पल"के संस्थापक स्टीव जॉब्स गांधी जी के मुरीद थे।वे उनके सम्मान में उनके जैसे ही गोल फ्रेम का चश्मा पहनते थे। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा किसी मृत व्यक्ति से मुलाकात का अवसर मिलने के प्रश्न पर उनसे मिलने की इच्छा जताते हैं।दलाई लामा, नेल्सन मंडेला समेत अनेक हस्तियां उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हैं। अहिंसा के इस पुजारी के सम्मान में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 2007 में उनकी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस घोषित किया।सबसे बड़ी बात ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री रहे जिस विंस्टन चर्चिल ने गांधी जी को 'अधनंगा फकीर' कहा था उसी चर्चिल के प्रतिमा के बगल में 4 मार्च 2015 को लंदन के पार्लियामेंट ...

फिल्मी पोस्टर

चित्र
 पिछले दिनों हिंदी फिल्म जगत के पोस्टर डिजाइन करने वाले महान कलाकार दिवाकर करकरे जी का निधन हो गया।एक ऐसे कलाकार जिसकी कूची ने अमिताभ को एंग्रीयंगमैन के रूप में पोस्टर के द्वारा प्रतिष्ठित किया।जिनके रंग संयोजन में उनकी भावनाओं को स्पष्टतया समझा जा सकता था। फिल्मों के लिए पोस्टर बनाने की शुरुआत तो भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहेब फाल्के ने ही करी थी। उन्होंने अपनी पहली फिल्म"राजा हरिश्चंद्र" के पोस्टर भी स्वयं बनाये थे और कलाकारों के नाम को अपने हाथों से लिखा था।बाद में बाबूराव पेंटर जैसे कलाकारों ने पोस्टर कला को ऊंचाईयां प्रदान की। पश्चिम के देशों की तरह हमारे यहां चीजें संग्रहित करने की परंपरा में विशेष रुचि ना होने के कारण पोस्टर संग्रह का काम सिनेमा के शुरुआती दिनों में नहीं हुआ।बाद के वर्षों में लोगों ने पोस्टर संग्रहण शुरू किया और नोट छापे।बताया जाता है कि शाहरुख खान ने फिल्म मुगल-ए-आजम के हस्तनिर्मित पोस्टर को अच्छा खासा दाम देकर खरीदा था।  मशहूर चित्रकार एमएफ हुसैन साहब ने भी हिंदी फिल्मों के पोस्टर डिजाइन किए थे।इसके अलावा अपने अलग डायलॉग डिलीवरी के लिए मशहूर अभिनेता ...

छत्तीसगढ़ में मितानी परंपरा

चित्र
मित्रता का सभी मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होता है।किसी व्यक्ति के मित्रों के व्यक्तित्व से ही संबंधित व्यक्ति के व्यक्तित्व का अंदाजा सहज रूप से लगाया जा सकता है।सरल शब्दों में कहा जाये तो दो मित्र एक दूसरे का प्रतिबिंब होते हैं।ये एक ऐसा नाता होता है जिनमें रक्त संबंध नहीं होता पर ये उससे बढ़कर होता है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी राम-सुग्रीव,राम-विभिषण, कृष्ण-सुदामा,कृष्ण-अर्जुन,दुर्योधन-कर्ण जैसे मित्रों का वर्णन मिलता है।मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में भी मित्रता ने स्थान पाया है।चाहे वह इंसान से इंसान की मित्रता हो जानवर की। छत्तीसगढ़ में भी मित्रता के नाते को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।हमारे यहां मितान बदने की परंपरा है।मतलब किसी धार्मिक आस्था से जुड़ी वस्तुओं का साक्षी रखकर जीवन भर के लिए मित्र (मितान/मितानिन)बनाया जाता है।मितान बदने वाले दो परिवार जीवनपर्यंत इस संबंध का निर्वहन करते हैं।महापरसाद, गंगाजल,गंगाबारू,गजामूंग,भोजली,जंवारा,तुलसीदल,रैनी,दौनापान,गोबरधन आदि मितान बदने के संबोधन है।मितान बदने के बाद मितान/मितानिन का नाम नहीं लिया जाता बल्कि उसे उपरोक्त संबोधन ...

उम्मीदें 2021

चित्र
  त्रासदी भरा साल 2020 अपनी दुखद स्मृतियों के साथ विदा हुआ और साल 2021 ने दस्तक दे दी है।उम्मीद करते हैं कि नया साल सबके लिए मंगलकारी होगा।वैसे हर नये साल के मंगलकारी होने की कामना तो हम हर बदलते कैलेंडर के साथ करते हैं,पर साल का अच्छा या बुरा होना हमारे बस में नहीं होता।अपना सोचा कब होता है?वो जब सोचे तब होता है। वो मतलब ऊपर नीली छतरी वाला मालिक।सबका सृजनकर्ता, पालनहार,जगतनियंता ईश्वर। इंसान को ऊपरवाले ने ही बनाया है लेकिन नश्वर धन-दौलत और संपत्ति के मोह में फंसा माटी का पुतला जब कुदरत को ललकारने का दुस्साहस करता है तब उसका हश्र बहुत बुरा होता है। वैसे पिछले साल की महामारी ने अब तक पीछा नहीं छोड़ा है। वैज्ञानिकों की मानें तो कोरोना नाम का दैत्य अब अपडेटेड होकर अधिक घातक होकर लोगों की जान लेने पर आमादा है। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में अल्प सुविधाओं के बावजूद कोरोना जैसी महामारी का नियंत्रण काबिले तारीफ है।इसके लिए भारत की सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की पीठ थपथपाई जा सकती है।जिस देश में कभी पीपीई किट नहीं बनती थी,वो देश अपने दृढ़ संकल्प से पीपीई किट के उत्पादन में विश्...

अलविदा 2020

चित्र
अंततः साल 2020 का सफर खत्म हुआ..! गजब का साल रहा बीता साल!!जिसने गजब ढाया था।ये ऐसा साल साबित हुआ जिसके समापन के लिए लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। आखिर हो भी क्यों ना? ज्यादातर लोगों के लिए साल 2020 मुसीबतें लेकर ही आया था।ये साल इतिहास में कोरोना महामारी के कारण सदा सदा के लिए ऐतिहासिक हो गया।इस साल की कड़वी यादें लोगों के जेहन में हमेशा रहेगी। चीन में जन्मी कोरोना नाम की महामारी ने साल 2020 में पूरी ‌दुनिया को नचा दिया।इटली और अमेरिका जैसे देशों को नाकों चने चबाने मजबूर कर दिया।सभी छोटे बड़े देशों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गई। भारत में मार्च महीने में स्कूलों को बंद कर दिया गया और लाकडाऊन का एक लंबा दौर चला।बेबस मजदूरों को घर वापसी के लिए संघर्ष करना पड़ा।कई लोगों की जान घर वापसी की जद्दोजहद में चली गई।कोरोना की दहशत ने लोगों के सामाजिक जीवन को तहस-नहस कर दिया।सामूहिक आयोजन रद्द करने पड़े।इस कोरोना ने ये साबित कर दिया कि आप चाहे कितने ही प्लान बनाकर रख लो कुदरत उसको पलभर में मटियामेट कर सकती है।इस कोरोना ने लोगों को जीने का ढंग भी सिखाया। लाकडाऊन के दौरान लोगों ने न्यूनतम आवश्य...