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दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

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  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकगायक स्व. मिथलेश साहू जी की पुण्यतिथि है।5 वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 2019 को वे छत्तीसगढ़ी लोककला जगत में कभी ना भरने वाली रिक्तता छोड़कर परलोक गमन कर गए।उनके गायन में माधुर्य का आकर्षण था।लोकगीतों के विविध छटाओं को उन्होंने अपने स्वर से सजाया है। प्रेमगीत,हास्यगीत, पारंपरिक उत्सव गीत,विवाह गीत आदि में उनके गायन का अंदाज बेहतरीन था।साल 1977 में उन्होंने सोनहा बिहान लोककला मंच से अपनी कला यात्रा की शुरुआत करी थी। उनके पिता स्व श्री जीवनलाल साहू भी एक लोक कलाकार थे। इसलिए कला के प्रति उनका झुकाव नैसर्गिक था।नाचा के विख्यात कलाकार मदन निषाद की कलाकारी ने उनको लोककला के सम्मोहन में बांधा था।इस सम्मोहन से बंधकर वे कला पथिक बन गए। वर्ष 1978 से वे आकाशवाणी रायपुर से पंजीकृत लोकगायक के रूप में प्रसारित हुए।फिर कभी रुके नहीं। श्रोताओं का प्यार उन्हें सदैव मिला। पिछले कुछ सालों में मैं निरंतर दुखद प्रसंगों का साक्षी रहा हूं। इसलिए ऊप...

उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई....

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  पिछले दिनों एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया तो उनके दशगात्र कार्यक्रम में शामिल हुआ। छत्तीसगढ़ में दशगात्र के दिन मृतक की आत्मशांति के लिए विशिष्ट पूजा किया जाता है। निकटतम परिजनों और ग्रामीणों के द्वारा तालाब में जाकर 5 अंजुरी पानी अर्पित कर देह त्यागने वाली आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।इस अवसर पर कहीं कहीं भजन कीर्तन आदि का कार्यक्रम रखा जाता है। लोकजीवन में परंपरागत लोकभजन के माध्यम से शरीर की नश्वरता और प्रभु भक्ति की श्रेष्ठता का गायन किया जाता है। वहां पर भी ऐसा ही कुछ गीत लोकधुन में खंजरी,तमूरा और झांझ की मधुर आवाज़ के साथ कुछ बुजुर्ग गा रहे थे... उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई...।बिना तामझाम के ताली की थाप और तीन वाद्ययंत्रों का संगम गीत को सरस बना रहा था।भजन के बाद एक बुजुर्ग दृष्टांत और कथा का वाचन करता था। तत्पश्चात पुनः वही भजन चल पड़ता था। मैं भी कुछ समय के लिए उनके पास बैठ गया।जो बुजुर्ग टीका कहकर दृष्टांत वाचन कर रहे थे वो भक्ति की श्रेष्ठता और संत सेवा की महानता के बारे में बता रहे थे। उसने कथा प्रसंग में शबरी की गुरुवचनों के प्रति आस्था के बा...

कोणार्क.. अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य

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      पुरी में रात्रि विश्राम पश्चात लगभग सुबह साढ़े बजे हमने होटल छोड़ दिया और चल पड़े भगवान साक्षी गोपाल के दर्शन के लिए। वहां पर पंडे पहुंचने के बाद तुरंत बही खाता में नाम दर्ज करवाने के लिए बोलने लगे। उसके लिए कुछ दानराशि देनी पड़ती है। मैंने और घनश्याम ने नहीं लिखवाया। भगवान हमको यहां तक लाए हैं वो खुद साक्षी हैं करके। वहां की मूर्ति बहुत सुंदर हैं। कहते हैं बांके बिहारी जी खुद चलकर जगन्नाथ धाम में पहुंचे हैं।कथा लंबी है इसलिए नहीं लिख रहा हूं।साक्षी गोपाल जी के दर्शन पश्चात हम लोग कोणार्क सूर्य मंदिर देखने चले गए। अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य है। कोणार्क का मेरा ये पहला दर्शन था। उससे पहले 20 रु के नोट में ही कोणार्क मंदिर के चक्के का दर्शन किया था। शिकार, कामक्रीड़ा और जीवन के विविध प्रसंगों को बहुत ही सुन्दर ढंग से कलाकारों ने पत्थर पर उकेरा है। बताते हैं कि 12 साल तक 1200 श्रमिकों ने दिन रात एक करके इस मंदिर को तैयार किया था।अकबर के इतिहासकार अबुल फजल के मुताबिक इन 12 वर्षों में उत्कल राज्य के संपूर्ण राजस्व को इसके निर्माण में लगा दिया गया था। दोपहर 2 बजे के लगभग को...

हरि बोलो....जय जगन्नाथ!!!

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 एक लंबी और नानस्टाप यात्रा से थकान स्वाभाविक थी।रात भर का रात्रि जागरण भी हुआ था तो धाम में पहुंचने के बाद जल्दी से कोई ठहरने की जगह खोजने कार्यक्रम था। तीर्थ क्षेत्र में धर्मशाला,यात्री लाॅज और होटलों की कमी नहीं होती।इन विकल्पों का विचार करने के बजाय पूर्व अनुभवियों के मतानुसार होटल में ठहरना तय हुआ और वो भी समुद्र के किनारे। हालांकि समुद्री बीच के किनारे के होटल थोड़े महंगे होते हैं  बताए लेकिन समुद्र में स्नान पश्चात सादे पानी से स्नान करने की सुविधा को देखते हुए वहीं ठहरना ज्यादा उचित लगा।अब हमारी गाड़ी गोल्डन बीच की ओर दौड़ पड़ी। गोल्डन बीच का नजारा अद्भुत था चारों तरफ दुकान समुद्री उत्पाद बेचने वालों की भीड़ और लोगों का जमावड़ा। मैं पहली बार सागर के दर्शन कर रहा था। इसलिए उतरते ही थोड़ी देर खड़ा होकर दृश्य को निहारने लगा।चार सदस्य होटल ढूंढने निकल पड़े और घनश्याम भाई गाड़ी को किनारे कर वहीं खड़े रहे। बमुश्किल 2 मिनट नजारों का दर्शन करके लौटा तब तक एक कर्तव्यनिष्ठ ट्रैफिक आफिसर हमारी गाड़ी की फोटो खींच रहा था।पता चला वहां बीच के किनारे गाड़ी खड़ी करने की अनुमति नहीं है।...

रात का सफर

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 जैसा कि मैंने पिछले पोस्ट में बताया था कि छत्तीसगढ़ से निकलते निकलते ही शाम ढलने लगा था। लगभग सवा 7 बजे के आसपास हम लोग खरियार रोड पहुंचे।खरियार रोड छत्तीसगढ़ और ओड़िशा दोनों के लिए महत्वपूर्ण कस्बा है। यहां दोनों जगहों से लोग खरीददारी करने आते हैं।कभी खरियाररोड अविभाजित दक्षिण कौसल का हिस्सा रहा है।जब सिरपुर दक्षिण कौसल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की राजधानी थी तब खरियार, नुआपड़ा  और कालाहांडी का क्षेत्र छत्तीसगढ़ में  समाहित था। वर्तमान में अब ये सारे ओडिशा राज्य के अंतर्गत आते है। यहां हमारी छत्तीसगढ़ी बोली और समझी जाती है। हालांकि उनकी स्थानीय मातृभाषा ओडिया का भी यहां चलन है। शासकीय प्रक्रिया भले ही दो प्रांतों में सीमा निर्धारण कर देती है, लेकिन सांस्कृतिक मेल मिलाप उनको जोड़े रहती है। यहां की दशहरा विख्यात है। छत्तीसगढ़ के बड़े बड़े लोककला मंचों का उस दिन यहां प्रदर्शन होता है। रामलीला होती है।रावण दहन में खूब आतिशबाजी होती है। जैसा कि आपको ज्ञात है यात्रा के शुरुआत में निकलते ही हमारी गाड़ी पंचर हो गई थी इसलिए उसकी मरम्मत कराना जरुरी था।खरियार रोड पहुंचते ही सर्वप्रथ...

पुरी धाम की ओर

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 जय जगन्नाथ!!! कल विश्व पर्यटन दिवस था।ये पोस्ट मैं कल ही डालने वाला था लेकिन कुछ कारण से नहीं हो पाया। पर्यटन का मतलब होता है घूमना।नये नये जगहों की सैर।ये स्थान धार्मिक स्थल भी हो सकते हैं या प्राकृतिक या कृत्रिम भी। कुछ लोग कुदरत की बनाई चीजें देखकर आनंदित होते हैं तो कुछ लोग मानव निर्मित कलाकृति देखकर खुश हो जाते हैं।वैसे मैं स्वभाव से ज्यादा घुमक्कड़ नहीं हूं। ज्यादातर घर में रहकर ही समय गुजारता हूं। मेरे जैसे प्राणियों के लिए छत्तीसगढ़ी में एक शब्द है घरखुसरा।बस वही समझिए। मेरी हार्दिक इच्छा थी कि भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन से ही घुमक्कड़ी की शुरुआत करुं।लेकिन ये संभव नहीं हो पाया। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की ये संभव नहीं हो पाया।साल 2022-2023 मेरे जीवन में कड़वी यादों का साक्षी बना।मन व्यथित और दुखी था। कड़वी यादों से इतर मन बहलाने के लिए और मानसिक शांति की चाह में मैं भगवान जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए आतुर था।यात्रा के लिए परिचितों से चर्चा किया तो संयोग से मुझे 5 साथियों का सहयोग भी पुरी यात्रा के लिए मिल गया।सड़क मार्ग से नीजी वाहन पर जाने का प्लान बना। जितने लोग जा...

परछी

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  ग्रामीण भारत की बात ही अनूठी होती है। सर्वजनहिताय सर्वजन सुखाय की भावना से भरपूर ग्राम्यांचलों के उच्च आदर्शों को देखकर भारत की ग्राम्य संस्कृति पर गर्व होता है। वैसे भी भारत को गांवों का देश कहा जाता है। छत्तीसगढ़ तो ग्राम्य संस्कृति के उच्च आदर्शों से सराबोर प्रदेश है। कुछ वर्ष पहले तक जब सरकारी योजनाओं से पक्के मकान नहीं बन रहे थे और लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तब ज्यादातर मकान कवेलू(खपरा) वाले होते थे। मिट्टी और लकड़ी से बने इन मकानों में रहने का आनंद पूछिए ही मत।हर दीवाली और तीज त्योहारों पर उसमें मिट्टी का लेपन और उसके बाद सफेद मिट्टी(छुही) से लिपाई पुताई होने के बाद मिट्टी की खुशबू से सराबोर घर की रौनक ही अलग होती थी। दीवारें बातें करती थीं।भले ही अब केमिकल युक्त रंग कंपनियां दीवारें बोल उठेंगी बताकर अपने उत्पाद का प्रचार कर रही है लेकिन उसमें तब वाली बात नहीं है।  घर भले ही मिट्टी की होती थी पर भोले भाले ग्रामीणों के नेक विचार  आसमान की बुलंदियों को छूता था।ऐसे मिट्टी के घरों में सिर्फ परिवार की जरुरतों को ध्यान नहीं रखा जाता था अपितु जानवरों के लिए,घर ...

तीजा के लुगरा

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  भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि हरतालिका तीज के रुप में विख्यात है। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह लोक पर्व तीजा के रुप में जाना जाता है।ये पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है।यह पर्व विवाहित महिलाओं को मायके से जोड़कर रखने वाला पर्व है। जन्माष्टमी के बाद हर बहन अपने भाई का इंतजार करती है।तीजा लेने के लिए जब कोई भाई बहन के ससुराल पहुंचता है तब बहन के साथ उनके बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है।यह इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें सभी गांव और परिवार की बेटी बहनों का एक साथ आगमन होता है। बरसों बाद विवाहित  महिलाओं की अपने हमउम्र सहेलियों से मुलाकात जब होती है तो बचपन की अनेक स्मृतियां ताज़ी हो जाती है जो उनके गृहस्थ जीवन में चल रही उठा पठक के बीच एक नये उत्साह का संचार करती है।तीजा का ये पक्ष सबसे महत्वपूर्ण है। शादी के बाद बहन और बेटियां मायके सिर्फ विशेष अवसरों पर ही आ पाती है। इसलिए अपने बचपन की सहेलियों के साथ वक्त बिताने का अवसर उनको नहीं मिल पाता।तीजा ये अवसर लब्ध कराती है। भाई बहन के बीच के संबंध को भी यह पर्व मजबूती प्रदान करता है।भाई अपनी क्षमता अनुसा  बहनों को खुश ...

कहीं दूर जब दिन ढल जाए....

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  फिल्म आनंद का ये खूबसूरत गीत आप सब ने जरुर सुना होगा। मुझे बेहद पसंद है और हो सकता है आप में से बहुतों को पसंद हो।दिन का निकलना और ढल जाना सृष्टि का नियमित चक्र है। इसमें कभी कोई ढिलाई नहीं होती। हम सबके जीवन में भी रोज उम्मीदों का सवेरा आता है और कामयाबी या नाकामयाबी का तोहफा देके चला जाता है।अक्सर ऐसा होता है कि हम जो योजना भविष्य के लिए बनाते हैं वो ज्यादातर बार पूरा नहीं हो पाता। अनगिनत बार हम असफल हो जाते हैं।ऐसा लगने लगता है कि अब कुछ अच्छा होगा ही नहीं। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमें सतत् प्रयास करना चाहिए।शेष ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए। सिर्फ ध्यान इतना रखना चाहिए कि हमारे काम से किसी का अहित ना होता हो।हताशा के क्षण हर एक व्यक्ति के जीवन में आता है। कभी कभी तो कुछ रास्ता सूझता भी नहीं है।केवल शून्य नजर आता है।ऐसे मुश्किल समय में हमारे परिजन और मित्र ही काम आते हैं। इसलिए रिश्तों की डोर को थाम के रखना चाहिए। सफलता की चकाचौंध भी बहुत घातक होती है।हमको कभी-कभी ऐसा भ्रम भी हो जाता है कि मैं जो भी करुंगा उसमें कामयाबी ही हाथ लगेगी। लेकिन कामयाबी का लगातार स्वाद चखने वाल...

ठठेरा के ठ...

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  फोटो गूगल से साभार  जो लोग अभी मेरे पोस्ट को पढ़ पा रहे हैं उन सभी ने हिंदी वर्णमाला जरुर पढ़ी होगी,और जब वर्णमाला पढ़े होंगे तो ठठेरा के ठ से जरूर परिचित होंगे। लेकिन क्या अब हम अपने बच्चों को दिखा पायेंगे कि ठठेरा क्या होता है? बहुत से कारीगर और कलाकार इस ज़माने की बेतहाशा तरक्की के कारण बेकार हो गये। मशीनीकरण ने पारंपरिक तरीके से काम करने वाले कारीगरों को बेरोजगार कर दिया। इन्हीं में से एक थे ये ठठेरे।ठठेरा कारीगर पुराने हो चुके बर्तनों की कलई करके और मरम्मत करके फिर से नया बना देते थे।आज यूज एंड थ्रो की पालिसी का दौर है।किसी के पास मरम्मत करने और कराने की फुर्सत नहीं है।वैसे अब कलई करना क्या होता है ये प्रश्न आ सकता है? तो मेरी मंद मति के अनुसार बताना चाहूंगा कि कलई करने का मतलब होता है ऐसे बर्तन जिनमें जोड़ होता है उसके जोड़ वाले भाग को एक प्रकार के काले लसदार रसायन से लेपित करके जोड़ा जाता है ताकि उसमें किसी प्रकार का रिसाव ना हो। वैसे कलई खुलना एक मुहावरा भी है जिसका आशय रहस्योद्घाटन होता है। हमारे बचपन के दिनों में आंध्रप्रदेश या तमिलनाडु से एक व्यक्ति आता था।लोग उसे...

पोरा और पोला

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पोरा और पोला शब्द को लेकर एक पोस्ट कल ही वाट्सएप पर देखने को मिला। जिसमें बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्योहार पोरा को आजकल पोला कहकर प्रचारित किया जा रहा है। महाराष्ट्र और अन्य कुछ प्रदेशों में भाद्रपद अमावस्या को पोला मनाया जाता है जिसमें बैलों को सजाकर पूजन किया जाता है और कृषि कार्यों में उनके सहयोग के लिए आभार प्रकट किया जाता है। पोला शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है खोखला जिसे छत्तीसगढ़ी में पोंडा कहा जाता है जबकि पोरा का आशय छत्तीसगढ़ी में छोटे छोटे खिलौने बर्तन से है।यथा-चुकी पोरा। छत्तीसगढ़ में प्रचलित पोरा त्योहार में नंदी स्वरूप बैल की छोटी छोटी मिट्टी से निर्मित बैलों और चुकी पोरा जांता की पूजा की जाती है। जिन्हें स्थानीय पकवान चीला,गुलगुला,ठेठरी,खुरमी का भोग लगाया जाता है। विशेष रूप से इस दिन गुड़ का मीठा चीला(गुरहा चीला) चढ़ाया जाता है।पूजन के पश्चात इन बैलों को छोटे छोटे बच्चे रस्सी बांधकर घूमाते रहते हैं और खेलते हैं।चुकी पोरा लड़कियों का खिलौना होता है जबकि नॅंदिया बईला(नंदी बैल) को लड़के खेलते हैं।पोरा मनाने के बाद गांव में अपनी बेटियों और बहनों को ग्रामीण तीजा मना...

ये हौसले की उड़ान है

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 कल सवेरे एक मित्र के वाट्सएप स्टेटस में एक खबर देखकर बहुत खुशी हुई।खबर थी हमारे क्षेत्र के 2 नौनिहालों के एमबीबीएस के लिए चयनित होने का।खबर इसलिए भी खास थी कि ये समूचे अंचल को गौरवान्वित करने वाली खबर थी।साथ ही एक परिचित से जुड़ी थी।और इन सबसे बढ़कर ये खबर दूसरे बच्चों को अध्ययन  के लिए प्रेरित करने वाला खबर था।सुदूर आदिवासी अंचल में  निवासरत जनजातीय समूह के बच्चों  का नीट जैसी प्रवेश परीक्षा पास कर चयनित होना निश्चित रुप से आदिवासी क्षेत्रों के लिए शुभ संकेत है। सरकार की"प्रयास विद्यालय" जैसी पहल भी नि:संदेह साधुवाद का पात्र है जिन्होंने आदिवासी बच्चों के हौसलों को उडा़न और उनके सपनों को पंख प्रदान किया है। "प्रयास आवासीय" विद्यालय योजना का उद्देश्य नक्सल प्रभावित जिले और आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को बेहतर शिक्षा देना है। स्टूडेंट्स को कॉम्पिटिशन एग्जाम की तैयारी भी कराई जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए विशेष कोचिंग दी जाती है।इन आवासीय विद्यालयों से हर साल कई बच्चों का बड़े शिक्षण संस्थानों में सिलेक्शन होता रहा है।छत्तीसगढ़ में 9 प्रयास आवासीय वि...

बैठे ठाले

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 एक दौर था जब ब्लाॅगिंग में खूब कलम घिसाई चलती थी। नई पुरानी बातों पर खूब लिखा करता था। लेकिन बीते सालों में कुछ ऐसी घटनाओं से साक्षात्कार हुआ कि लेखन लगभग-लगभग थम सा गया है। कुछ बदलाव भी इन दिनों देखने को मिल रहा है।अब लोग मोबाइल पर कुछ पढ़ने के बजाय यूट्यूब के शार्ट विडियो को स्क्राल करने में अधिक आनंद महसूस करते हैं।लिखाई पढ़ाई वाला दौर भी गुजरने वाला है समझिए। पाठकों की प्रतिक्रिया भी अब ज्यादा नहीं आती।पाठक की प्रतिक्रिया ही लेखन के लिए टानिक का काम करती है।टानिक स्वाद में कड़वा रहे या मीठा लेकिन सेहत के लिए फायदेमंद जरुर होता है।ठीक वैसे ही अच्छी बुरी दोनों प्रतिक्रिया लेखन के लिए लाभकारी होता है। ब्लॉग लेखन में अभनपुर निवासी आदरणीय ललित शर्मा जी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है।एक समय में वे ब्लॉगिंग की दुनिया के स्टार रहे हैं और आज भी छत्तीसगढ़ की पुरातन परंपराओं और इतिहास के ऊपर लेखन में सक्रिय है। नवोदित लेखकों को भी अपने वेब पोर्टल में भरपूर मौका देते हैं। उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात का अवसर भी मिला है। छत्तीसगढ़ में प्रचलित रामलीला के ऊपर उनकी किताब को उत्तर प्रदेश के संस्कृति ...

कैसा रेल बनाया बनाने वाले...

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फोटो गूगल से साभार   बचपन के दिनों में जब रेडियो ही मनोरंजन का सर्वव्यापी साधन हुआ करता था,उन दिनों छत्तीसगढ़ के मशहूर गायक पंचराम मिर्झा का ये गीत खूब हमने खूब सुना था। जिसमें मनुष्य शरीर की नश्वरता और और भजन की महत्ता के बारे में बताया गया है। हमारी कक्षा चौथी के हिन्दी पाठ्य-पुस्तक में भी एक पाठ रेल के बारे में था।भारत में पहली रेलगाड़ी ठाणे से मुंबई के बीच चली थी ये अब तक मुंहजबानी याद है। रेल, शब्द से हम सब बचपन से परिचित हैं।रेलगाड़ी का खेल खेलकर ही हम सब बड़े हुए हैं। इंटरनेट पर रेल का शाब्दिक अर्थ खंगालने पर पता चला कि इसका मतलब बहाव,भाप के दबाव से चलने वाला वाहन और लोहपथगामिनी है।अर्थात लोहे के सड़क पर चलने वाला वाहन। रेल ( Rail ) परिवहन का एक ज़रिया है जिसमें यात्रियों और माल को पटरियों पर चलने वाले वाहनों पर एक स्थान से दुसरे स्थान ले जाया जाता है। पारम्परिक रूप से रेल वाहनों के नीचे पहियें होते हैं जो इस्पात (स्टील) की बनी दो पटरियों पर संतुलित रूप से चलते हैं, लेकिन आधुनिक काल में चुम्बकीय प्रभाव से पटरी के ऊपर लटककर चलने वाली 'मैगलेव' ( maglev ) और एक पटरी पर चलन...

जो बीत गई सो बात गई...

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 लिखना मेरा शौक रहा है, और उसे शौक से ऊपजा था ये ब्लॉग।नये साल पर हमेशा कुछ ना कुछ लिखता रहा। पर पिछले साल की त्रासदी ने मुझे कुछ लिखने लायक ही नहीं छोड़ा।जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो बहुत कुछ बदल जाती है।जीने का नजरिया,तौर तरीका और भी बहुत कुछ... जीवन चलने का नाम है।जीवन पथ पर जो भी जैसे भी मोड़ आए सबको पार करते हंसते रोते आगे बढ़ना ही जिंदगी है। ज़ेहन में बार बार एक गीत आता है।शायद सफर फिल्म का गीत है... नदिया चले चले रे धारा चंदा चले चले रे तारा.... तुझको चलना होगा...तुझको चलना होगा... इस गीत की पंक्तियों में जीवन दर्शन समाया सा लगता है। जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है आंधी से तूफां से डरता नहीं है तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें मंजिल को तरसेंगी तेरी निग़ाहें... तुझको चलना होगा... बस इसी के धुन में चले जा रहे हैं। वक्त के साथ बदलना कभी कभी इंसान की मजबूरी हो जाता है।वो चाहकर भी खुद को हमेशा एक सा नहीं रख सकता। कुछ कमियां जीवन भर पूरी नहीं होती। लेकिन इंसान को कमियों के साथ भी जीना है..आगे बढ़ना है।नये साल या पुराने साल का उमंग उत्साह अब गुदगुदाता नहीं है।आज सोच लिया था कि कुछ ल...