सोमवार, 16 दिसंबर 2024

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के


 

लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!!

आज छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकगायक स्व. मिथलेश साहू जी की पुण्यतिथि है।5 वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 2019 को वे छत्तीसगढ़ी लोककला जगत में कभी ना भरने वाली रिक्तता छोड़कर परलोक गमन कर गए।उनके गायन में माधुर्य का आकर्षण था।लोकगीतों के विविध छटाओं को उन्होंने अपने स्वर से सजाया है। प्रेमगीत,हास्यगीत, पारंपरिक उत्सव गीत,विवाह गीत आदि में उनके गायन का अंदाज बेहतरीन था।साल 1977 में उन्होंने सोनहा बिहान लोककला मंच से अपनी कला यात्रा की शुरुआत करी थी। उनके पिता स्व श्री जीवनलाल साहू भी एक लोक कलाकार थे। इसलिए कला के प्रति उनका झुकाव नैसर्गिक था।नाचा के विख्यात कलाकार मदन निषाद की कलाकारी ने उनको लोककला के सम्मोहन में बांधा था।इस सम्मोहन से बंधकर वे कला पथिक बन गए। वर्ष 1978 से वे आकाशवाणी रायपुर से पंजीकृत लोकगायक के रूप में प्रसारित हुए।फिर कभी रुके नहीं। श्रोताओं का प्यार उन्हें सदैव मिला।

पिछले कुछ सालों में मैं निरंतर दुखद प्रसंगों का साक्षी रहा हूं। इसलिए ऊपर वर्णित गीतों के अतिरिक्त जो गीत मुझे सबसे ज्यादा पसंद आते हैं,वो गीत हैं उनके गाए निर्गुण भजन।लाग लपेट से दूर सीधे मर्मस्थल तक पहुंचने वाली कबीरवाणी।जिस प्रकार हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार के रोमांटिक गीतों का श्रोता वर्ग होने के साथ उनके सैड गीतों को पसंद करने वाले श्रोताओं की संख्या भी अच्छी खासी है। मैं भी मिथलेश सर के इन भजनों का प्रशंसक हूं। किशोर सुख और दुख के दोनों गीतों को सहजता से गाते थे वैसे ही हमारे मिथलेश साहू जी भी प्रेमगीत और भजन गाने में महारत रखते थे।

लोकगायक कुलेश्वर ताम्रकार जी के साथ उनकी जोड़ी खूब जमती थी। आडियो कैसेट के दौर में उनके नाचा और जोक्कड़गीत को श्रोताओं ने सराहा। लोककला मंच लोकरंग अर्जुंदा में दोनों ने बहुत दिनों तक एक साथ प्रस्तुति दिया।जब उनके अनुज भूपेंद्र साहू ने पृथक लोककला मंच"रंग सरोवर" बनाया तब वे अलग हुए।

हां,तो मैं बात कर रहा था मिथलेश साहू सर जी के गाए भजनों की। मिथलेश जी के भजन गीतों का एक संकलन भूपेंद्र साहू जी के निर्देशन में निकला था"सुमिरन" नाम से। क्षेत्र के भिन्न-भिन्न स्थानों पर उसकी विडियो शूटिंग हुई थी। इस संकलन में एक से बढ़कर एक लोक भजन संग्रहित है। उसमें के एक गीत का साग रांधो संवलिया...की शूटिंग स्थानीय छुरा बाजार में हुई थी। उनके गाए गीतों में हीरा गंवा गयो कचरे में,दिन चारी मइहरवा में मुझे बेहद पसंद है। विशेष रूप से दिन चारी मइहरवा में....

इस गीत की दार्शनिकता अद्भुत है।जीव का संसार से लगाव,संसारी रीति रिवाज और आडंबर,जीवन का सार तत्व इसमें निहित है।इस गीत की एक पंक्ति विशेष उल्लेखनीय है। अउॅंठ हाथ के काया जरगे। भुइंया में मिलही रासा।।

इस पंक्ति में एक छत्तीसगढ़ीशब्द आया है "अउॅंठ"।आजकल ये शब्द प्रचलन में नहीं है। लेकिन लोकजीवन में ये शब्द लंबाई का मात्रक है।अउॅंठ मतलब साढ़े तीन यानि पूर्ण चार में आधा कम। कहते हैं कि हर व्यक्ति के शरीर का नाप उसके खुद के हाथ में साढ़े तीन हाथ ही होता है।इसी गीत की दूसरी पंक्ति हाड़ जलै तोर बन कस लकड़ी केस जरै बनघासा महादेव हिरवानी द्वारा गाए भजन कैसा खेल रचाया रचाने वाला में भी है।संतोष शुक्ला द्वारा गाए गीत तोर नांव अमर कर ले गा भैय्या का राखे हे तन मा... में भी भाव साम्यता है।

मैंने इस गीत के दो वर्जन को सुना है।एक कुलेश्वर ताम्रकार और मिथलेश साहू के स्वर में है और दूसरा सिर्फ मिथलेश सर के स्वर में।दो गायकों के स्वर वाले गीत में कुल चार अंतरा है और एकल स्वर वाले गीत में तीन अंतरा है। दोनों ही मधुर हैं लेकिन युगल स्वर वाला ज्यादा बेहतर है।इस आलेख के लिए मेरे पास स्व. मिथलेश साहू जी का फोटो नहीं था।आनलाइन फोटो अच्छी क्वालिटी में नहीं मिल पा रहा था तो मैंने उनके भतीजे मलयज साहू जी से संपर्क किया तो उन्होंने सहर्ष सर का फोटो उपलब्ध कराया। इसके लिए उनको हृदय से धन्यवाद!!!

मिथलेश साहू सर ने छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को नया आयाम दिया है।जब तक छत्तीसगढ़ी गीतप्रेमी छत्तीसगढ़ी गीत सुनते रहेंगे मिथलेश साहू सर लोककला जगत से विस्मृत नहीं हो सकते।उनकी पुण्यतिथि पर उनको सादर भावभीनी श्रद्धांजलि...

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024

उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई....

 


पिछले दिनों एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया तो उनके दशगात्र कार्यक्रम में शामिल हुआ। छत्तीसगढ़ में दशगात्र के दिन मृतक की आत्मशांति के लिए विशिष्ट पूजा किया जाता है।

निकटतम परिजनों और ग्रामीणों के द्वारा तालाब में जाकर 5 अंजुरी पानी अर्पित कर देह त्यागने वाली आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।इस अवसर पर कहीं कहीं भजन कीर्तन आदि का कार्यक्रम रखा जाता है। लोकजीवन में परंपरागत लोकभजन के माध्यम से शरीर की नश्वरता और प्रभु भक्ति की श्रेष्ठता का गायन किया जाता है।

वहां पर भी ऐसा ही कुछ गीत लोकधुन में खंजरी,तमूरा और झांझ की मधुर आवाज़ के साथ कुछ बुजुर्ग गा रहे थे... उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई...।बिना तामझाम के ताली की थाप और तीन वाद्ययंत्रों का संगम गीत को सरस बना रहा था।भजन के बाद एक बुजुर्ग दृष्टांत और कथा का वाचन करता था। तत्पश्चात पुनः वही भजन चल पड़ता था।

मैं भी कुछ समय के लिए उनके पास बैठ गया।जो बुजुर्ग टीका कहकर दृष्टांत वाचन कर रहे थे वो भक्ति की श्रेष्ठता और संत सेवा की महानता के बारे में बता रहे थे। उसने कथा प्रसंग में शबरी की गुरुवचनों के प्रति आस्था के बारे में बताया।जब मतंग ऋषि ने शबरी को ये बताया कि तुम प्रभु की प्रतीक्षा करो...वो जरुर आयेंगे।दिन,सप्ताह,माह और वर्ष बीतते गया।शबरी प्रभु की प्रतीक्षा में तरुणी से वृद्ध हो गई पर उन्होंने गुरुवचनों पर संदेह नहीं किया।वो गुरुवचनों पर आस्था रखकर प्रतीक्षा करती रही.. अंततः प्रभु श्रीराम उनके पास स्वयं चलकर आए।इसके बारे में उन्होंने बताया कि मनुष्य अधीर होता है।वह किसी की भी प्रतीक्षा लंबे समय तक नहीं करता है।अपना मार्ग और विचार बदल देता है। लेकिन शबरी एकटक प्रभु का ही राह निहारती रही।इस अवधि में ना तो वह किसी तीर्थ दर्शन के लिए गई और ना ही किसी देवी-देवता की भक्ति में जप तप किया।उसका एकमात्र लक्ष्य था त्रिलोक अधिपति के सम्मुख दर्शन करना। इसलिए भगवान को स्वयं उसके पास आना पड़ा।

ग्रामीण बुजुर्ग के मुख से इस प्रकार का अद्भुत टीका सुनना मेरे लिए अद्भुत था। इसके बाद पुनः वही भजन चल पड़ा..

धोखा धोखा मा खोई डारे उमरिया ला

धोखा धोखा मा खोई डारे भाई

ना भाव भक्ति करे,ना संत सेवा जाने

न तो करे करम कमाई भाई

उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई...

इस भजन का भावानुवाद कुछ इस तरह है कि मनुष्य मेरे पास बहुत समय बाकी है सोचकर राग रंग में व्यस्त रहता है। फिर अकस्मात जब उसकी मृत्यु का समय आ जाता है तब वह पछतावा करता है कि उसने ना तो किसी का सेवा किया और ना ही किसी प्रकार का सद्कर्म किया।इस प्रकार पछतावा लिए जीव पुनः जन्म मरण के चक्कर में फंस जाता है।

इसलिए अगर समय रहते मनुष्य चेत जाए तो वह अपने जीवन को अनुकरणीय बना सकता है।

जय जगन्नाथ 

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

कोणार्क.. अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य

 

   




पुरी में रात्रि विश्राम पश्चात लगभग सुबह साढ़े बजे हमने होटल छोड़ दिया और चल पड़े भगवान साक्षी गोपाल के दर्शन के लिए। वहां पर पंडे पहुंचने के बाद तुरंत बही खाता में नाम दर्ज करवाने के लिए बोलने लगे। उसके लिए कुछ दानराशि देनी पड़ती है। मैंने और घनश्याम ने नहीं लिखवाया। भगवान हमको यहां तक लाए हैं वो खुद साक्षी हैं करके।
वहां की मूर्ति बहुत सुंदर हैं। कहते हैं बांके बिहारी जी खुद चलकर जगन्नाथ धाम में पहुंचे हैं।कथा लंबी है इसलिए नहीं लिख रहा हूं।साक्षी गोपाल जी के दर्शन पश्चात हम लोग कोणार्क सूर्य मंदिर देखने चले गए। अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य है। कोणार्क का मेरा ये पहला दर्शन था। उससे पहले 20 रु के नोट में ही कोणार्क मंदिर के चक्के का दर्शन किया था।
शिकार, कामक्रीड़ा और जीवन के विविध प्रसंगों को बहुत ही सुन्दर ढंग से कलाकारों ने पत्थर पर उकेरा है। बताते हैं कि 12 साल तक 1200 श्रमिकों ने दिन रात एक करके इस मंदिर को तैयार किया था।अकबर के इतिहासकार अबुल फजल के मुताबिक इन 12 वर्षों में उत्कल राज्य के संपूर्ण राजस्व को इसके निर्माण में लगा दिया गया था।
दोपहर 2 बजे के लगभग कोणार्क से घर वापसी के लिए निकले।इस बार रास्ता हमने बदल लिया था। खुर्दा होते हुए सरायपाली मार्ग का रास्ता हमने लिया था। रास्ते भर मिलने वाले चटर पटर व्यंजनों का भोग लगाते आ रहे थे। जहां कुछ नया नजर आता, गाड़ी रुक जाती थी। रात्रि में एक जगह 100 रु पत्तल की दर से स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया।फोटो देख सकते हैं।
कुछ मिलाकर जीवन की एक अनोखी और यादगार यात्रा थी,श्री जगन्नाथ पुरी की यात्रा।अवसर मिले तो चूकिए मत...।पुरी यात्रा वृत्तांत का समापन यहीं कर रहा हूं। मिलते हैं अगले पोस्ट में किसी नई पुरानी यादों के संग...जय जगन्नाथ!!!


गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

हरि बोलो....जय जगन्नाथ!!!







 एक लंबी और नानस्टाप यात्रा से थकान स्वाभाविक थी।रात भर का रात्रि जागरण भी हुआ था तो धाम में पहुंचने के बाद जल्दी से कोई ठहरने की जगह खोजने कार्यक्रम था। तीर्थ क्षेत्र में धर्मशाला,यात्री लाॅज और होटलों की कमी नहीं होती।इन विकल्पों का विचार करने के बजाय पूर्व अनुभवियों के मतानुसार होटल में ठहरना तय हुआ और वो भी समुद्र के किनारे। हालांकि समुद्री बीच के किनारे के होटल थोड़े महंगे होते हैं  बताए लेकिन समुद्र में स्नान पश्चात सादे पानी से स्नान करने की सुविधा को देखते हुए वहीं ठहरना ज्यादा उचित लगा।अब हमारी गाड़ी गोल्डन बीच की ओर दौड़ पड़ी। गोल्डन बीच का नजारा अद्भुत था चारों तरफ दुकान समुद्री उत्पाद बेचने वालों की भीड़ और लोगों का जमावड़ा। मैं पहली बार सागर के दर्शन कर रहा था। इसलिए उतरते ही थोड़ी देर खड़ा होकर दृश्य को निहारने लगा।चार सदस्य होटल ढूंढने निकल पड़े और घनश्याम भाई गाड़ी को किनारे कर वहीं खड़े रहे। बमुश्किल 2 मिनट नजारों का दर्शन करके लौटा तब तक एक कर्तव्यनिष्ठ ट्रैफिक आफिसर हमारी गाड़ी की फोटो खींच रहा था।पता चला वहां बीच के किनारे गाड़ी खड़ी करने की अनुमति नहीं है।हमसे चूक हो गई थी। घनश्याम और मैंने उनसे मान मनौव्वल किया कि बड़ी दूर से आए हैं...रहम कीजिए प्रभु!!!पर प्रभु मानने के लिए तैयार नहीं थे।बोले- आनलाइन चालान घर पहुंचेगा। गाड़ी हटाओ और आगे निकलो। पत्थर में सिर पटकने वाली बात थी।आज के समय  में इतने घनघोर टाईप ईमानदार कर्मचारी मिलने की उम्मीद नहीं थी। निकलते समय गाड़ी के सारे दस्तावेज अप टू डेट करके निकले थे कि कोई परेशानी ना हो।और ये अलग टाईप की परेशानी आ गई थी।फिर भी हमने हिम्मत करके पूर्व अनुभवों के आधार पर उनसे अनुनय-विनय किया तो उनका कठोर हृदय पसीजा तत्पश्चात भाव ताव की रस्म अदायगी हुई और अंततः कांड का समापन हुआ। हमने कहा जय जगन्नाथ!!संकट टली। फिर गाड़ी आगे बढ़ाकर पुनः वापिस हुए और साथियों से संपर्क किया तो उन लोगों ने होटल का पता बताया और वर्मा सर खड़े मिले मार्गदर्शन के लिए। गाड़ी होटल के सामने खड़ी करके फ्रेश हुए।फिर लहरा लेने(समुद्री स्नान)के लिए प्रस्थान किया। समुद्र का नजारा अद्भुत था। बड़ी जलराशि के नाम पर अब तक सिर्फ गंगरेल बांध के दर्शन किए थे तो अथाह समुद्र की विशालता, लहरों का वेग और गर्जन मेरे लिए रोमांचक अनुभव था।वैसे हमारा शरीर 70% पानी से बना होता है तो पानी के प्रति प्रेम स्वाभाविक है। समुद्र के किनारे मृत जेली फिश बिखरे पड़े थे। स्थानीय लोगों के अनुसार हमेशा ऐसा नहीं होता है बताए कभी-कभी ऐसा हो जाता है क्योंकि जेलीफिश समुद्र के गहरे हिस्से में पाई जाती है।कुछ मस्त मिजाज के लोग जेलीफिश को ताज के समान सर पर रखकर फोटो खींचवा रहे थे।किसी ने बताया कि जेलीफिश का अगर बदन से स्पर्श हो जाए तो खुजली होती है।इतना सारा जनरल नालेज इकट्ठा करने बाद हम सबने समुद्र में छलांग लगाया और समुद्री लहरों ने हमें उछाल कर जहां का तहां पहुंचा दिया।यही बार बार की उछलकूद ही समुद्र स्नान का आनंद है। लगभग एक डेढ़ घंटे तक नहाने के बाद वापस हो रहे थे तो शंख और  मोती बेचने वाले खरीदने के लिए मनुहार करने लगे। मोती का रहस्य मैं जान चुका था इसलिए बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। लेकिन शंख खरीदने की इच्छा थी। लेकिन साथियों ने मना कर दिया कि बाद में खरीद लेंगे।एक शंख वाला 200 रु में 3 शंख देने के लिए तैयार हो गया था। लेकिन साथियों ने मना किया और बोले कि बाद में इससे सस्ते में मिलेगा। लेकिन मिला नहीं। कभी-कभी पहले किया सौदा ही ज्यादा लाभदायक होता है बजाय बाद के सौदे के।अवसर बार बार नहीं मिलता।खैर, स्नान पश्चात दोबारा स्नान हुआ।जो खाद्य सामग्री लाए थे उससे पेट पूजा किए और दोपहर 11 से 3 बजे तक होटल के एसी रुम में घोड़ा बेचकर सोए।जो घोड़ा हमने बेचा था उसे कुछ लोग समुद्र के किनारे पर्यटकों को घुमा रहे थे।हा..हा..हा..ये मजाक था।

3 बजे सोकर उठने के बाद समुद्र के किनारे एक रेस्टोरेंट में भोजन करने गए।शीशे के दरवाजे और एसी की सुविधा से लैस ऐसे रेस्टोरेंट में पर्यटक भोजन के लिए कम उस सुविधा के लिए भुगतान ज्यादा करते हैं।ऐसा मुझे लगता है। किनारे पर जली हुई रुखी रोटी,फ्राई दाल और पुनश्च मिक्स वेज का भक्षण किया। भोजन में रस नहीं था इसलिए रसपान करना नहीं लिखा हूं। भोजन उपरांत फिर होटल आए और अपनी गाड़ी से ट्रैफिक में उलझते जाने के बजाय रिक्शे या आटो से जाना तय किया।आटो वाले ने भगवान जगन्नाथ स्वामी के मार्ग वाली गली में लाकर छोड़ दिया। गली से ही मंदिर का शिखर दिखाई दे रहा था।नील चक्र के दर्शन हुए तो आटो से उतरते ही हम सबने समवेत स्वर में जय जगन्नाथ का उद्घोष किया।आटो वाले को पैसा देकर मंदिर के सामने वाली गली पर आगे बढ़ने  लगे।महाडिक सर ने प्रभु जगन्नाथ से कोई मनौती मांगी रही होगी, इसलिए एक नाई के पास जाकर केशकर्तन करवाने  लगे और तब तक हम लोग आस-पास के मकान और दुकान का जायजा लेने लगे। ज्यादातर लोगों ने अपने घर के कुछ हिस्सों को जीवन यापन के लिए लाॅज बना रखा है।नीचे दुकानें बनी है। जिसमें से ज्यादातर खाजा(जगन्नाथ पुरी की विशेष मिठाई जो प्रभु को भोग लगता है)की दुकान और पूजा सामग्री  और सजावटी सामान बेचने की दुकाने हैं।मंदिर में मोबाईल वर्जित था इसलिए महाडिक सर के आने के बाद मंदिर के सामने के एक दुकानदार के यहां 120 रु में मोबाईल और चप्पल रखकर दर्शन के लिए कतारबद्ध हो गए।बाजू में ही पंडाल लगा था जिसमें भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथ यात्रा के लिए रथ तैयार हो रहा था।रथ के लिए विशाल पहिए वहां रखे थे और कारीगर अपने कार्य में लगे हुए थे। कुछ देर के बाद मंदिर परिसर में प्रवेश हुआ तो भगवान जगन्नाथ स्वामी के एकल मूर्ति के दर्शन हुए। फिर सीढियां चढ़ते हुए मुख्य मंदिर तक पहुंचे। सीढ़ियों पर मात्र 10 रु में भगवान जगन्नाथ के लिए तुलसी का माला पंडे बेच रहे थे।उसी समय कुछ दंडधारी हरि बोल का उद्घोष करते ओड़िया भजन करते जत्थे के साथ पहुंचे। मंदिर की बनावट अद्भुत है। देखने लगे तो बस देखते ही रह गए। भारतीय वास्तुकला का अद्भुत प्रत्यक्ष प्रमाण सम्मुख था।जब हम मंदिर परिसर में पहुंचे उसी समय मंदिर के ध्वज को बदलने का रस्म चल रहा था।एक व्यक्ति उलटे ही देखते देखते मंदिर के शिखर तक जा पहुंचा। उसने अपने कमर में नये ध्वज को बांध रखा था। उसने शीर्ष पर पहुंच कर पुराने ध्वज को उतारा और उसमें बंधे हुए तुलसी पत्र को ऊपर से जनसमूह के  लिए नीचे फेंक दिया।लोग उस प्रसाद को पाने के लिए टूट पड़े।किस्मत वालों को मिला,शेष को नहीं।इस रस्म के दौरान एक व्यक्ति साथ में और रहता है। इतने ऊंचे मंदिर के शिखर पर रोज चढ़ना उतरना किसी हिम्मत वाले का ही काम है।इस काम को करने वालों को नमन। ध्वज को बदलने का क्रम बारहों मास निर्बाध चलता रहता है। कहते हैं अगर ध्वज नहीं बदला गया तो मंदिर के पट 18 साल के लिए बंद हो जायेगा। हालांकि ऐसा अवसर आज तक नहीं आया है।

इस दर्शन के पश्चात भगवान जगन्नाथ जी के मूल मंदिर में दाखिल हुए तो वहां हनुमानजी के दर्शन हुए। भगवान जगन्नाथ के सम्मुख हनुमान जी की जो मूर्ति है , उसमें उन्होंने गदा के साथ ही तलवार भी धारण किया है,जो आमतौर पर देखने को नहीं मिलता।दूसरी तरफ गरुड़ जी की मूर्ति बनी है। गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ,माता सोहद्रा और भगवान बलभद्र का विग्रह मन को मोहित कर देता है।ऐसा लगता है कि बस खड़े रहें और भगवान की मनोहारी छवि के दर्शन करते रहें। लेकिन भक्तों की अपार भीड़ के कारण ज्यादा देर तक वहां नहीं रुक सकते। फिर भी जितनी देर तक अवसर मिला एकटक देखते रहे।उसके बाद मंदिर परिसर से मैं जैसे ही निकला एक पंडे ने बेत की छड़ी पीठ पर मारी और दक्षिणा मांगने लगे।वह युवा था और मैंने जो दिया सो रख लिया। उसने मेरे इस भ्रम को भी दूर कर दिया जो लोगों से सुन रखा था कि जगन्नाथ मंदिर के पंडे लूटते हैं। उसने बताया कि मैं आपके लिए भगवान को भोग लगी मिठाई ला सकता हूं अगर आप राशि दें। मैंने पूछा कितने रुपए का आयेगा।वो बोले कि 100 रु से शुरू हो जाता है। मैंने उसे 150 रु दिए। फिर वो थोड़ी देर में मुझे ताड़ की टोकरी में भोग प्रसादी लाकर दे दिए। फिर हम सब लोगों ने परिसर के अन्य मंदिरों के भी दर्शन किए। वहां स्थित वट वृक्ष के पास राह चलते एक पंडे ने जबरदस्ती मेरे हाथ में रुद्राक्ष रख दिया और बोले भगवान कृपा करेंगे दक्षिणा दो। मैंने तुरंत उनको उनका रुद्राक्ष ये कहते हुए थमा दिया कि उनकी कृपा है तभी यहां तक पहुंचे हैं,और आगे निकल गया। श्रद्धालुओं के धार्मिक भावना का ऐसा शोषण मुझे सही नहीं लगता। वटवृक्ष के नीचे गणेशजी की सुंदर विशाल प्रतिमा है। वहीं पर पुनश्च जगन्नाथ प्रभु के एक और विग्रह के दर्शन हुए। फिर हम लोग आनंद बाजार चले गए। आनंद बाजार उस जगह को बोलते हैं जहां भगवान जगन्नाथ की महाप्रसादी का बाजार लगता है।श्रद्धालुगण अपनी कार्यक्षमता अनुसार प्रभु भोग का आनंद लेते हैं। अनेकानेक पकवानों से सुसज्जित दुकाने हैं।हर दुकानदार चखने के लिए महाप्रसाद देता है।कोई अगर सभी दुकानों तक घूमे तो उनका पेट भर जायेगा। हमने भी महाप्रसाद के भोग का रसपान किया और घर परिवार व इष्ट मित्रों, परिजनों के लिए महाप्रसाद और मिठाइयां खरीदीं। कहते हैं कि भगवान विष्णु बद्री धाम में स्नान करते हैं,द्वारिका धाम में वस्त्र श्रृंगार करते हैं, पुरी धाम में भोजन करते हैं और रामेश्वर धाम में शयन करते हैं। सचमुच पुरी धाम में भोजन की इतनी किस्में हैं कि भगवान खाते खाते छक जाते होंगे। मिठाई की भरमार है पुरी धाम में।चूंकि महाप्रसाद खाकर तृप्त हो गए थे इसलिए और  खाना नहीं खाया।वापसी के बाद फिर समुद्र तट पर टहलने निकल पड़े। वहां पर एक सैंड आर्टिस्ट ने मां दुर्गा की बेहतरीन कलाकृति बनाई थी।साथ ही अपनी कला प्रदर्शन के लिए स्वैच्छिक सहयोग मांग रहे थे।पुरी मशहूर सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक की कर्मभूमि है तो यहां ऐसे कलाकारों का मिलना स्वाभाविक है।एक डिब्बा सामने रखा था।लोग अपनी इच्छानुसार सहयोग कर रहे थे। यहां पर रात में घूमना और समुद्री लहरों पर घूमना आनंददायक होता है। थोड़ी देर घूमने के बाद सो गए। अगले दिन कोणार्क सूर्य मंदिर के दर्शन और वापसी का प्रोग्राम था।उसकी बात अंतिम किस्त अगले पोस्ट में...जय जगन्नाथ!!!

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

रात का सफर





 जैसा कि मैंने पिछले पोस्ट में बताया था कि छत्तीसगढ़ से निकलते निकलते ही शाम ढलने लगा था। लगभग सवा 7 बजे के आसपास हम लोग खरियार रोड पहुंचे।खरियार रोड छत्तीसगढ़ और ओड़िशा दोनों के लिए महत्वपूर्ण कस्बा है। यहां दोनों जगहों से लोग खरीददारी करने आते हैं।कभी खरियाररोड अविभाजित दक्षिण कौसल का हिस्सा रहा है।जब सिरपुर दक्षिण कौसल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की राजधानी थी तब खरियार, नुआपड़ा  और कालाहांडी का क्षेत्र छत्तीसगढ़ में  समाहित था। वर्तमान में अब ये सारे ओडिशा राज्य के अंतर्गत आते है। यहां हमारी छत्तीसगढ़ी बोली और समझी जाती है। हालांकि उनकी स्थानीय मातृभाषा ओडिया का भी यहां चलन है। शासकीय प्रक्रिया भले ही दो प्रांतों में सीमा निर्धारण कर देती है, लेकिन सांस्कृतिक मेल मिलाप उनको जोड़े रहती है। यहां की दशहरा विख्यात है। छत्तीसगढ़ के बड़े बड़े लोककला मंचों का उस दिन यहां प्रदर्शन होता है। रामलीला होती है।रावण दहन में खूब आतिशबाजी होती है।

जैसा कि आपको ज्ञात है यात्रा के शुरुआत में निकलते ही हमारी गाड़ी पंचर हो गई थी इसलिए उसकी मरम्मत कराना जरुरी था।खरियार रोड पहुंचते ही सर्वप्रथम एक आटो दुकान  में पंचर टायर का रिपेयरिंग करवाए और वहीं पास में एक ठेले पर नींबू सोडा का आनंद लिया।राह चलते जायजा लेने पर लगा कि वहां जैन मारवाडियों का व्यापार में बढ़िया दखल है।भोजन या नास्ता अगले शहर नुआपड़ा में करने की योजना थी, इसलिए बातचीत करते हमारा कारवां बढ़ गया। नुआपड़ा पहुंचे तो पता चला कहीं पर खाने लायक उचित व्यवस्था नहीं है। तो फिर आगे बढ़ गए। हमारी टीम के तरुण वर्मा सर तकनीकी विशेषज्ञ हैं। मोबाईल के अच्छे ज्ञाता हैं। उन्हीं के मार्गदर्शन में गूगल मैप के भरोसे आगे बढ़ रहे थे। बहुत सारे छोटे छोटे गांवों को पार करने के बाद एक शहर आया-सोहेला।शायद हमें जाना दूसरे मार्ग पर था लेकिन हम लोग दूसरा कोई रास्ता पकड़ लिए थे।तब तक रात के 10 बज गए थे और सबको जोरों की भूख लग रही थी। वहां पर ढाबा तलाशने लगे तो एक ढाबा नजर आया-मास्टर ढाबा!!! हमारे ग्रुप में ज्यादातर लोग पेशे से मास्टर ही थे,सो मास्टर प्रेम तो होगा ही। इसलिए इसी ढाबा में जम गए। सबने मिलकर तय किया कि रोटी,दाल फ्राई और मिक्स वेज आर्डर करते हैं। आर्डर देने के आधे घंटे के बाद हमारा भोजन टेबल पर सर्व हुआ।उसके पहले मुंहदिखाई में रखे खीरा,प्याज के सलाद का कार्यक्रम संपन्न हो गया था।भूखे थे इसलिए टूट पड़े।खाना खाने और डकार लेने के बाद समझ में आया कि सब्जी ज्यादा टेस्टी नहीं था। मिक्स वेज वैसे भी नाम बड़े दर्शन छोटे वाली डिश है। रेस्टोरेंट में बचे सब्जियों को काट फिट कर परोस दिया जाता है। छत्तीसगढ़ी में मिंझरा साग बोलने से छोटे दर्जे का समझा जाता है और वही सब्जी अंग्रेजी में मिक्स वेज बोलने से प्रतिष्ठित हो जाती है।खैर,जो था जैसा था बढ़िया था।भोजन उपरांत ढाबे के मिश्री सौंफ को चबाते हुए गाड़ी पर सवार होकर फिर निकल पड़े।भोजन पश्चात ड्राइविंग की कमान महाडिक सर ने संभाल  लिया था।।ऐसे करते करते लगभग डेढ़ बजे रात तक सब लोग जागते ही रहे।लंबी दूरी  के बाद रास्ते में एक छोटा-सा चाय का टपरा दिखा तो तत्काल गाड़ी के पहिए थम गए।रात का सफर अब तक सुहाना ही था। चायवाले  को चाय के लिए आदेशित  किया फिर थोड़ी देर में चाय के डिस्पोजल कप हमारे हाथों में थे।अच्छी बात ये थी कि ग्रुप के सारे सदस्य चायप्रेमी ही थे और चाय के मामले में मैं  उन सबका सरदार था।चाय बढ़िया बनी थी। चायपान के बाद ड्राइविंग से महाडिक सर ने रेस्ट लिया और गाड़ी की स्टेयरिंग वर्मा सर ने संभाल लिया।बताता चलूं कि सोहेला के बाद हमने सोनेपुर वाला रोड ले लिया था यात्रा के लिए,जो आगे बौड नयागढ़ होते हुए पुरी जाती है।इस बीच घनश्याम के साथ त्रिवेदी भैय्या और बोस भैय्या ने हल्की झपकी ले लिया और मैं, महाडिक सर बात करते रहे  और वर्मा सर ने रिमिक्स गाना आन कर दिया ताकि नींद ना आए ।इस तरह दुनिया भर की गपशप करते चलते रहे। सवेरे सवेरे हम लोग बौड पहुंच चुके थे।उसके आगे नयागढ़ आनेवाला था।उसके बाद पुरी धाम का नंबर था।
गर्मी के दिनों वहां का मौसम बड़ा अजीब था।बादल छाए थे और भरपूर ऊमस थी।बदन का चिपचिपापन बड़ा अजीब लग रहा था। नयागढ़ में रास्ते के दोनों ओर सूखी मछलियों की दुकान लगी थी।हम लोग ऐसी जगह देख रहे थे जहां ब्रश वगैरह करके कम से कम चाय पी सकें। लेकिन गूगल के दिखाए रास्ते ने हमें मेन रोड से हटाकर गांव के रास्ते में डाल दिया था।मैप पुरी शहर को  नजदीक दिखाता था लेकिन दूर दूर तक कहीं नजर ही नही आता था।अब आयेगा तब आयेगा करते करते सुबह के 8 बज गए।अंततः कुछ देर के बाद पुरी मेन रोड का बोर्ड  नजर आया और पुरी की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग पर हमारी गाड़ी दौड़ने लगी।जिस तरह अंधा क्या चाहे दो आंखें उसी तरह उनींदें थके लोग क्या चाहें-चाय!!! तो  चाय तलाशती हमारी आंख को रास्ते में एक जगह चाय का टपरा दिखा तो रुक गए। वहां के मौसम में बहुत ज्यादा ऊमस थी इसलिए कुछ लोगों ने वहां कपड़े  चेंज कर शार्ट पहन लिया और ब्रश करने के लिए पानी मांगकर ब्रश किया।चाय बेचने वाला दुकानदार एक किशोरवय लड़का था।उसकी मुस्कान बड़ी प्यारी थी।हम लोग वहां छत्तीसगढ़ी में ही बात कर रहे थे। बीच बीच में हिंदी में भी वार्तालाप होता था।हंसी मजाक जारी था।उस लड़के ने हमारी विनोदप्रियता को शायद भांप लिया था। इसलिए चाय के पैसे देने के बाद जब मैं बोला कि वापसी का चाय अपनी ओर से पिला देना।तो वो हंसते हुए बोला-ठीक है पिला देगा।आप लोग मजाक बहुत करता है।खैर,ना हम उस रास्ते पर लौटे और ना ही वहां दोबारा चाय पीने का मौका मिला। वैसे भी सफर में मिले लोग हर बार कहा ं साथ होते हैं।
लगभग-लगभग साढ़े आठ बजे हम लोग चारों धाम में से एक जगन्नाथ पुरी धाम की पुण्य धरा पर थे। मार्ग में ही भगवान जगन्नाथ जी के वाहन गरुड़ की एक विशाल मूर्ति लगी थी।जिस दिशा की ओर वे देख रहे थे।उसे देखकर समझ आ गया था कि मंदिर किस दिशा में है। लेकिन रातभर के उनींदे थे इसलिए सबसे पहले हम लोगों ने होटल खोजकर आराम करना ज्यादा उचित समझा और वहीं बस स्टैंड से पूछकर होटल की खोज में निकल पड़े.... ज्यादा लंबे पोस्ट से उबासी आ जाएगी इसलिए अगले पोस्ट में दर्शन लाभ का वर्णन करुंगा....जय जगन्नाथ!!!!

शनिवार, 28 सितंबर 2024

पुरी धाम की ओर





 जय जगन्नाथ!!!

कल विश्व पर्यटन दिवस था।ये पोस्ट मैं कल ही डालने वाला था लेकिन कुछ कारण से नहीं हो पाया। पर्यटन का मतलब होता है घूमना।नये नये जगहों की सैर।ये स्थान धार्मिक स्थल भी हो सकते हैं या प्राकृतिक या कृत्रिम भी। कुछ लोग कुदरत की बनाई चीजें देखकर आनंदित होते हैं तो कुछ लोग मानव निर्मित कलाकृति देखकर खुश हो जाते हैं।वैसे मैं स्वभाव से ज्यादा घुमक्कड़ नहीं हूं। ज्यादातर घर में रहकर ही समय गुजारता हूं। मेरे जैसे प्राणियों के लिए छत्तीसगढ़ी में एक शब्द है घरखुसरा।बस वही समझिए।
मेरी हार्दिक इच्छा थी कि भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन से ही घुमक्कड़ी की शुरुआत करुं।लेकिन ये संभव नहीं हो पाया। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की ये संभव नहीं हो पाया।साल 2022-2023 मेरे जीवन में कड़वी यादों का साक्षी बना।मन व्यथित और दुखी था। कड़वी यादों से इतर मन बहलाने के लिए और मानसिक शांति की चाह में मैं भगवान जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए आतुर था।यात्रा के लिए परिचितों से चर्चा किया तो संयोग से मुझे 5 साथियों का सहयोग भी पुरी यात्रा के लिए मिल गया।सड़क मार्ग से नीजी वाहन पर जाने का प्लान बना। जितने लोग जा रहे थे उसमें  से तीन लोगों  ने पूर्व में जगन्नाथ जी का दर्शन कर लिया था।तीन लोगों के लिए पहला अवसर था।छुरा से 5 लोग थे एक सर राजिम से थे।उनको पहले कई बार पुरी यात्रा का अवसर मिला था पर किन्हीं कारणों से नहीं जा सके थे, इसलिए वे भी लालायित थे। राजिम से महाडिक सर के आने के बाद हम छः लोग 16 मई की शाम को मित्र की गाड़ी में सड़क मार्ग से चल पड़े।निवास से निकलने के बाद 5 किमी ही आए थे कि गाड़ी का एक पहिया पंचर हो गया। लेकिन किसी ने इस घटना को नकरात्मक रुप से नहीं लिया। सबने एक स्वर में कहा कि चलो संकट टला और अब आगे कि यात्रा निर्विघ्न संपन्न होगी।हम छः लोग साथ चले थे उसमें से 4 कुशल ड्राइवर थे इसलिए कोई दिक्कत होने की संभावना नहीं थी लंबी यात्रा के दौरान।खरियार रोड नुआपड़ा मार्ग से होकर जाने का निर्णय लिया और चल पड़े।रास्ते में कोमाखान से होते हुए नर्रा गांव पहुंचे तब हमारे ग्रुप के महाडिक सर ने बताया कि महान मराठा शासक बिंबाजी भोंसले की समाधि इसी ग्राम में है। इतिहासकार बताते हैं कि बिंबाजी भोंसले मराठा शासन के दौरान यहां के सर्वेसर्वा थे। धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। रतनपुर के पास रामटेकरी में इन्होंने विशाल राम मंदिर बनवाया था। गाड़ी के संग मराठा शासन की उपलब्धि के बारे में बातें चलती रही।महाडिक सर स्वयं मराठा हैं अतः इस चर्चा के दौरान उनकी गर्वानुभूति स्वाभाविक थी।गर्मी का महीना था और शाम ढलने लगी थी। हम लोग छत्तीसगढ़ की सीमा को पार कर ओड़िशा की सीमा को स्पर्श करने वाले थे।तभी घनश्याम ने कहा कि चलो कुछ नास्ता कर लें। फिर उसने घर से लाया चना मुरमुरा और पोहे का जबरदस्त भेल तैयार किया। घनश्याम हमारी टीम के भोजन प्रभारी थे। उसके साथ रहो तो कभी भूखे नहीं सकते।बाहर निकलने के बाद वो भरपूर स्टाक लेकर चलते है खाने पीने की चीजों का।हल्का नास्ता के बाद निकल पड़े ओडिशा की ओर... भगवान जगन्नाथ स्वामी की दर्शन अभिलाषा लिए... शेष अगले पोस्ट में 

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

परछी

 


ग्रामीण भारत की बात ही अनूठी होती है। सर्वजनहिताय सर्वजन सुखाय की भावना से भरपूर ग्राम्यांचलों के उच्च आदर्शों को देखकर भारत की ग्राम्य संस्कृति पर गर्व होता है।

वैसे भी भारत को गांवों का देश कहा जाता है। छत्तीसगढ़ तो ग्राम्य संस्कृति के उच्च आदर्शों से सराबोर प्रदेश है। कुछ वर्ष पहले तक जब सरकारी योजनाओं से पक्के मकान नहीं बन रहे थे और लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तब ज्यादातर मकान कवेलू(खपरा) वाले होते थे। मिट्टी और लकड़ी से बने इन मकानों में रहने का आनंद पूछिए ही मत।हर दीवाली और तीज त्योहारों पर उसमें मिट्टी का लेपन और उसके बाद सफेद मिट्टी(छुही) से लिपाई पुताई होने के बाद मिट्टी की खुशबू से सराबोर घर की रौनक ही अलग होती थी। दीवारें बातें करती थीं।भले ही अब केमिकल युक्त रंग कंपनियां दीवारें बोल उठेंगी बताकर अपने उत्पाद का प्रचार कर रही है लेकिन उसमें तब वाली बात नहीं है।

 घर भले ही मिट्टी की होती थी पर भोले भाले ग्रामीणों के नेक विचार  आसमान की बुलंदियों को छूता था।ऐसे मिट्टी के घरों में सिर्फ परिवार की जरुरतों को ध्यान नहीं रखा जाता था अपितु जानवरों के लिए,घर के सदस्यों के लिए और घुमंतू जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए भी व्यवस्था होती थी।घर के मुख्य द्वार के सामने या अगल बगल में परछी बनाई जाती थी।जो बाहरी आगंतुकों के लिए एक तरह का रैन-बसेरा था। भिक्षाटन करने वाले लोग या बाहरी व्यापारी रात बिताने के लिए इन्हीं परछी का सहारा लेते थे।

परछी एक प्रकार का चौपाल होता था। जहां फुर्सत के क्षणों में विचारों का आदान-प्रदान,हास परिहास की बातें होती थीं। खेती-बाड़ी की बातें होती थीं। कितने ही योजनाएं और सपने इसी परछी में जन्म लेती थीं। बुजुर्गों के लिए तो घर का ये हिस्सा सबसे कीमती था। अपने हमउम्र लोगों के साथ बीड़ी का सुट्टा लगाते उनके आनंद की कोई सीमा नहीं होती थी। बरसात के दिनों में परछी में पाटे पर बैठकर चाय पीने का आनंद अलौकिक होता था।जूट के रेशे से रस्सी अटने का यंत्र लिए बुजुर्गों का समय इसी परछी में बीत जाता था। बच्चियां कभी मिट्टी के खिलौने से खेलने आती तो कभी अट्ठा चॅंगा का रोमांच आजकल के लूडो से कहीं अधिक हुआ करता था। बरसात के दिनों में बैलगाड़ी के चक्के,बेलन आदि और बरसात के बाद हल आदि यहीं रख दिए जाते थे।

मैंने अपने बचपन के दिनों में बहुधा घुमंतू लोगों को परछी में रात्रि विश्राम करते देखा है।दिन के समय कभी कभी इसमें कसेर,बनिया और मनिहारी वाले भी अपना दुकान लगाया करते थे।इन रात्रि पथिकों के लिए गृहस्वामी भी सब्जी, लकड़ी आदि की व्यवस्था कर दिया करते थे।तब असुरक्षा की भावना नहीं थी।तब आज की तरह आधार कार्ड जैसे पहचान दस्तावेजों की जरूरत नहीं होती थी।

अब बनने वाले मकानों में जानवरों और बाहरी लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।परछी की जगह आजकल पोर्च बनाने का चलन है। जिसमें गृहस्वामी अपनी चौपहिया वाहन खड़ी करके अपनी आर्थिक समृद्धि का परिचय देता है और जिनके पास चारपहिया वाहन नहीं भी होता तो वो इस उम्मीद में पोर्च बनवा लेता है कि कभी ना कभी वो भी चारपहिया वाहन का मालिक बनेगा। सिर्फ मैं और मेरा वाले आज के दौर में इन परछियों की स्मृति ही शेष है।कभी कभी किसी गांव में इसका दिख जाना एक सुखद एहसास दिलाता है।शेष शुभ.... मिलते हैं अगले पोस्ट में 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

तीजा के लुगरा

 

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि हरतालिका तीज के रुप में विख्यात है। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह लोक पर्व तीजा के रुप में जाना जाता है।ये पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है।यह पर्व विवाहित महिलाओं को मायके से जोड़कर रखने वाला पर्व है। जन्माष्टमी के बाद हर बहन अपने भाई का इंतजार करती है।तीजा लेने के लिए जब कोई भाई बहन के ससुराल पहुंचता है तब बहन के साथ उनके बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है।यह इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें सभी गांव और परिवार की बेटी बहनों का एक साथ आगमन होता है। बरसों बाद विवाहित  महिलाओं की अपने हमउम्र सहेलियों से मुलाकात जब होती है तो बचपन की अनेक स्मृतियां ताज़ी हो जाती है जो उनके गृहस्थ जीवन में चल रही उठा पठक के बीच एक नये उत्साह का संचार करती है।तीजा का ये पक्ष सबसे महत्वपूर्ण है।

शादी के बाद बहन और बेटियां मायके सिर्फ विशेष अवसरों पर ही आ पाती है। इसलिए अपने बचपन की सहेलियों के साथ वक्त बिताने का अवसर उनको नहीं मिल पाता।तीजा ये अवसर लब्ध कराती है।

भाई बहन के बीच के संबंध को भी यह पर्व मजबूती प्रदान करता है।भाई अपनी क्षमता अनुसा  बहनों को खुश रखने का हरसंभव प्रयास करता है।इस पर्व में भाई चाहे जितनी भी व्यस्तता रहे समय निकालकर बहनों को तीजा लेने जरुर जाता है।दुर्भाग्यवश यदि किसी का भाई गुजर जाता है तो उसके बाद उनके पुत्र उस दायित्व का निर्वहन करता है और अपनी बुआ को तीजा लेने जाता है।ये तो इस पर्व का धवल पक्ष हुआ।लेकिन इसका एक स्याह पक्ष भी है ।कहीं कहीं जब मायके  में बेटी के सर पर से मां बाप का साया उठ जाता है तो मात्र भाई ही एकमात्र सहारा रह जाता है उसके लिए।ऐसे में अगर भाई का व्यवहार रुखा हो जाए तो बहनों के लिए मायके से संपर्क ही टूट जाता है। उम्र भर मायके के एक लोटा पानी के लिए तरसना किसी भी बहन या बेटी के लिए अत्यंत कष्टकारी होता है तो कहीं कहीं बहनें भी धन संपत्ति के लालच में भाईयों से ही विद्रोह कर बैठती है।ऐसा भी देखने में आता है।

साल 2023 में एक फिल्म आई थी चोरी-चोरी। इसमें अमीर खुसरो की पंक्तियों में मामूली फेरबदल करके आनंद बख़्शी साहब ने बेहद मार्मिक गीत लिखा है...अम्मा मोरी बाबुल को भेजो री।इस गीत में एक बेटी की व्याकुलता और मां की मजबूरियों का मार्मिक चित्रण है।कभी मौका मिले तो जरूर सुनियेगा। हां तो बात फिर से तीजा पर्व की करते हैं।

एक अनूठी बात ये भी है कि बहनें मायके में रहकर अपने सुहाग की रक्षा के लिए यह व्रत रखती है।एक दिन पूर्व रात्रि में करु भात का नियम रहता है।दूसरे दिन निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर सभी सुहागन अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती है।इस दिन तिजहारिन नदियों में रेत का शिवलिंग बनाकर पूजा करती है।तीजा के दूसरे दिन गणेश चतुर्थी को समस्त तिजहारिनें भाई द्वारा उपहार स्वरूप प्राप्त वस्त्र पहन कर भोलेनाथ और नंदी के पूजन पश्चात फलाहार कर व्रत तोड़ती हैं।इस दिन छत्तीसगढ़ के गांवों की गलियां ठेठरी,खुरमी जैसे पकवानों की गंध से सुवासित रहती है।सभी तिजहारिन एक दूसरे के घर मिल भेंट करने के लिए जाती हैं और तीजा का ये पर्व हंसी खुशी के साथ संपादित होता है।

इस पर्व को छत्तीसगढ़ के मशहूर संत कवि पवन दीवान ने छत्तीसगढ़ी भाषा में इन शब्दों में चित्रित किया है -

बच्छर म एक दिन आथे ये तीजा 

चुररुस ले बाजे करेला के बीजा

पहिरे बर मिलथे वो रंग रंग के लुगरा

लुगरा बर कर डारेन कूद कूद के झगरा

रात भर मसके हन करू करू भात

दिनभर उपास करेन नारी के जात

लेत बरेत चुल्हा म चढ़गे तेलई

झेंझरी के ठेठरी ल खा दिस बिलई

थूके थूक म बरा चूरे लार म सोंहारी

लटपट चबावत हे रोगही मुखारी

धकर धकर जीव करे लकर लकर बुता

हरु हरु चूरी अउ गरु गरु सुता

चल वो बिसाहिन घर बइठे बर जाबो

घरो घर जाबो अउ फेँकत ले खाबो

गाँव भर देख लेबो सबे के तीजहा

सही सही के सब दुःख ल तन होगे सिजहा

रोज रोज नइ पावन मइके के कोरा

फेर जल्दी आबे रे तीजा अउ पोरा।

तो लीजिए इस पोस्ट का आनंद ठेठरी खुरमी के साथ... मिलते हैं अगले पोस्ट में

चित्र साभार -श्री धनेश साहू, तिल्दा-नेवरा 


गुरुवार, 5 सितंबर 2024

कहीं दूर जब दिन ढल जाए....

 


फिल्म आनंद का ये खूबसूरत गीत आप सब ने जरुर सुना होगा। मुझे बेहद पसंद है और हो सकता है आप में से बहुतों को पसंद हो।दिन का निकलना और ढल जाना सृष्टि का नियमित चक्र है। इसमें कभी कोई ढिलाई नहीं होती।

हम सबके जीवन में भी रोज उम्मीदों का सवेरा आता है और कामयाबी या नाकामयाबी का तोहफा देके चला जाता है।अक्सर ऐसा होता है कि हम जो योजना भविष्य के लिए बनाते हैं वो ज्यादातर बार पूरा नहीं हो पाता। अनगिनत बार हम असफल हो जाते हैं।ऐसा लगने लगता है कि अब कुछ अच्छा होगा ही नहीं।

लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमें सतत् प्रयास करना चाहिए।शेष ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए। सिर्फ ध्यान इतना रखना चाहिए कि हमारे काम से किसी का अहित ना होता हो।हताशा के क्षण हर एक व्यक्ति के जीवन में आता है। कभी कभी तो कुछ रास्ता सूझता भी नहीं है।केवल शून्य नजर आता है।ऐसे मुश्किल समय में हमारे परिजन और मित्र ही काम आते हैं। इसलिए रिश्तों की डोर को थाम के रखना चाहिए।

सफलता की चकाचौंध भी बहुत घातक होती है।हमको कभी-कभी ऐसा भ्रम भी हो जाता है कि मैं जो भी करुंगा उसमें कामयाबी ही हाथ लगेगी। लेकिन कामयाबी का लगातार स्वाद चखने वाला व्यक्ति नाकामयाबी की एक चोट से बिखर भी जाता है। इसलिए सफलता के नशे में झूमते रहना और असफलता के दुख में मायूस हो जाना भी उचित नहीं है।

वैसे दुनिया का चलन ऐसा है कि कामयाब आदमी को सब सलाम ठोंकते हैं और नाकामयाब आदमी से कन्नी काटने लगते हैं। पिछले दिनों उज्जैन यात्रा के दौरान मैंने रेलवे प्लैटफॉर्म पर दो दृश्य देखे।एक दृश्य में एक व्यक्ति हाथी पांव के बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद अपने बड़े से पैर को घसीटते घसीटते भीख मांगते जीवन जीने के प्रयास में लगा हुआ है।दूसरे दृश्य में दोनों पैरों से दिव्यांग व्यक्ति एक छोटे से लकड़ी के तख्त पर चक्के लगाकर लोगों के बैग में खराब हो चुके जीपर लगाने का काम खुश होकर कर रहा था।जब इतनी परेशानी के बाद भी लोग हौसला रख सकते हैं तो सिर्फ कुछ विपरीत आर्थिक, मानसिक या शारीरिक परिस्थिति से घबराकर जीवन की चुनौती से मुंह फेरना सही नहीं होगा।

बस धीरज का दामन हमको थामे रखना होगा। वक्त बदलने तक। तकदीर के पलटने तक।शेष फिर कभी...

ब्लॉग में जो तस्वीर मैंने लगाई है वो आदरणीय मंगलमूर्ति सोनी जी द्वारा चिल्का झील में खींची गई है। बेहतरीन फोटोग्राफी के लिए उनको धन्यवाद 


बुधवार, 4 सितंबर 2024

ठठेरा के ठ...

 

फोटो गूगल से साभार 


जो लोग अभी मेरे पोस्ट को पढ़ पा रहे हैं उन सभी ने हिंदी वर्णमाला जरुर पढ़ी होगी,और जब वर्णमाला पढ़े होंगे तो ठठेरा के ठ से जरूर परिचित होंगे। लेकिन क्या अब हम अपने बच्चों को दिखा पायेंगे कि ठठेरा क्या होता है?

बहुत से कारीगर और कलाकार इस ज़माने की बेतहाशा तरक्की के कारण बेकार हो गये। मशीनीकरण ने पारंपरिक तरीके से काम करने वाले कारीगरों को बेरोजगार कर दिया। इन्हीं में से एक थे ये ठठेरे।ठठेरा कारीगर पुराने हो चुके बर्तनों की कलई करके और मरम्मत करके फिर से नया बना देते थे।आज यूज एंड थ्रो की पालिसी का दौर है।किसी के पास मरम्मत करने और कराने की फुर्सत नहीं है।वैसे अब कलई करना क्या होता है ये प्रश्न आ सकता है?

तो मेरी मंद मति के अनुसार बताना चाहूंगा कि कलई करने का मतलब होता है ऐसे बर्तन जिनमें जोड़ होता है उसके जोड़ वाले भाग को एक प्रकार के काले लसदार रसायन से लेपित करके जोड़ा जाता है ताकि उसमें किसी प्रकार का रिसाव ना हो। वैसे कलई खुलना एक मुहावरा भी है जिसका आशय रहस्योद्घाटन होता है।

हमारे बचपन के दिनों में आंध्रप्रदेश या तमिलनाडु से एक व्यक्ति आता था।लोग उसे मद्रासी बोलते थे।वही पुराने बर्तनों को नये बनाने का काम करता था।मतलब वो ठठेरा था।ठठेरा नामकरण ऐसे कारीगरों द्वारा बर्तनों को सुधारते समय निकलने वाली ठक ठक के आवाज के कारण हुआ।

वैसे ही 90 के दशक में जब जनरल स्टोर्स और फैंसी स्टोर्स नहीं खुले थे तब यूपी से खोमचे वाले आते थे।सर पर अपना खोमचा उठाए आवाज लगाते थे।ले ताला कंघी साबुन....।इस आवाज को सुनकर बच्चे भी दौड़े आते थे। क्योंकि उनके पास सीटी और झुनझुना भी रखा होता था।उस वक्त की फैशनपसंद महिलाओं का फेवरेट क्रीम था बादल स्नो।कांच की एक बड़ी सी नीली शीशी में आती थी।खोमचे वाले तंबाकू की डिब्बी,साबुन डिब्बी और बादल स्नो खूब बेचा करते थे।समय के साथ ये लोग भी लुप्त हो गए।

पास के गांव से एक आदमी आता था बर्तन में नाम लिखने वाला।आते ही आवाज लगाता... बर्तन में नाम लिखा लो।तब मेरी दादी घर के एक न एक कांसे या पीतल के बर्तन में मेरा नाम जरुर लिखवाती थी एक अठन्नी में।छोटी हथौडी और कील की मदद से बहुत सुंदर नाम लिखता था वो कारीगर।वो बर्तन आज भी है घर में।कुछ शौकीन लोग साइकिल की हैंडिल पर भी अपना या अपने बच्चे का नाम लिखवाते थे।तब दौर कांसे और पीतल के बर्तनों का था।सबके घर में वही बर्तन होते थे।पास पडौस में आत्मीयता भरपूर होती थी इसलिए सब्जियों का खूब लेन-देन होता था।ऐसे में नाम लिखे होने के कारण एक जैसे बर्तनों के मिलने पर पहचानने में सुविधा होती थी।अब स्टील, प्लास्टिक और क्राकरी का चलन है।आत्मीयता तो गधे का सींग हो गया। इसलिए बर्तन में नाम लिखवाने की जरूरत ही नहीं रह गई।

फिलहाल बस इतना।कोई और भूला बिसरा कारीगर आप लोगों को याद आए तो मुझे ज़रूर बताइए....

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

पोरा और पोला

















पोरा और पोला शब्द को लेकर एक पोस्ट कल ही वाट्सएप पर देखने को मिला। जिसमें बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्योहार पोरा को आजकल पोला कहकर प्रचारित किया जा रहा है। महाराष्ट्र और अन्य कुछ प्रदेशों में भाद्रपद अमावस्या को पोला मनाया जाता है जिसमें बैलों को सजाकर पूजन किया जाता है और कृषि कार्यों में उनके सहयोग के लिए आभार प्रकट किया जाता है।
पोला शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है खोखला जिसे छत्तीसगढ़ी में पोंडा कहा जाता है जबकि पोरा का आशय छत्तीसगढ़ी में छोटे छोटे खिलौने बर्तन से है।यथा-चुकी पोरा। छत्तीसगढ़ में प्रचलित पोरा त्योहार में नंदी स्वरूप बैल की छोटी छोटी मिट्टी से निर्मित बैलों और चुकी पोरा जांता की पूजा की जाती है। जिन्हें स्थानीय पकवान चीला,गुलगुला,ठेठरी,खुरमी का भोग लगाया जाता है। विशेष रूप से इस दिन गुड़ का मीठा चीला(गुरहा चीला) चढ़ाया जाता है।पूजन के पश्चात इन बैलों को छोटे छोटे बच्चे रस्सी बांधकर घूमाते रहते हैं और खेलते हैं।चुकी पोरा लड़कियों का खिलौना होता है जबकि नॅंदिया बईला(नंदी बैल) को लड़के खेलते हैं।पोरा मनाने के बाद गांव में अपनी बेटियों और बहनों को ग्रामीण तीजा मनाने के लिए उनके ससुराल से लिवाकर लाते हैं।
कुछ गांवों में इस अवसर पर खेल प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।पोरा त्योहार में बस यही स्वरूप नहीं है इस पर्व का अपितु ये पर्व धान की फसल के गर्भधारण संस्कार का पर्व होता है।पोरा की पूर्व रात्रि में गांव के बुजुर्ग और बईगा गांव के शीतला मंदिर(माता देवालय ) में जाकर गांव की सुख समृद्धि और अच्छे फसल की कामना के साथ ग्राम्य देवी देवताओं की पूजा करते हैं।इस दिन कृषि संबंधी कार्य और निर्माण संबंधी कार्य पूर्णतः निषिद्ध रहता है।इस विधान को गरभचरु के नाम से जाना जाता है।सवेरे पूजन के पश्चात गभोट(धान के पौधे में बीज बनने/दूध बनने की अवस्था) वाले पौधे को लाकर गांव के हर घर में मुख्य प्रवेश द्वार पर खोंसा जाता है। ग्रामीण बईगा को इसके लिए अन्नदान और द्रव्यदान देकर विदा करते हैं।पोरा पर्व के उपरांत ही घास(कांदी) को गट्ठर बांधकर लाया जा सकता है उसके पूर्व नहीं लाया जाता।ग्राम्य जगत की अपनी रीति नीति होती है जिसमें सूक्ष्म वैज्ञानिक या आध्यात्मिक विचारधारा समाहित होता है।इनका विवेचन किये जाने की आवश्यकता है।
बैल को हिंदू धर्म में धर्म का स्वरूप माना गया है।बैल को ही भगवान शिव ने अपना वाहन बनाया है। विभिन्न सभ्यताओं के पुरातत्व अभिलेखों में बैलों का चित्रण मिलता है,जो मानव जाति के उत्थान में बैलों के योगदान को दर्शाता है।वृषभ राशि का प्रतीक भी बैल है।शिव मंदिर की कल्पना नंदी के बिना नहीं की जा सकती।इसलिए बैल पूजित होते हैं। छत्तीसगढ़ के गांवों में गोल्लर(सांड) छोड़ने की परंपरा रही है।जिस बैल को गोल्लर छोड़ दिया जाता है वह कृषि कार्यों से मुक्त होकर स्वच्छंद विचरण करते रहता है। संभवतः इसलिए स्वच्छंद विचरण करने वाले लोगों के लिए "गोल्लर ढिलाय हे" उक्ति का प्रयोग किया जाता है।लोक जीवन में प्रचलित बहुत से रीति रिवाजों का समय के साथ ह्रास हो रहा है। इनके संवर्धन के लिए नई पीढ़ी को आगे आना चाहिए और अपने अनमोल सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रयास करना चाहिए।मेरे विचार से छत्तीसगढ़ में पोरा का ही पर्व मनाया जाता है।इस बारे में आप लोगों का क्या कहना है।जरुर अवगत कराएं...और मुझसे त्रुटि हो तो भी सूचित करें...






 

सोमवार, 2 सितंबर 2024

ये हौसले की उड़ान है


 कल सवेरे एक मित्र के वाट्सएप स्टेटस में एक खबर देखकर बहुत खुशी हुई।खबर थी हमारे क्षेत्र के 2 नौनिहालों के एमबीबीएस के लिए चयनित होने का।खबर इसलिए भी खास थी कि ये समूचे अंचल को गौरवान्वित करने वाली खबर थी।साथ ही एक परिचित से जुड़ी थी।और इन सबसे बढ़कर ये खबर दूसरे बच्चों को अध्ययन  के लिए प्रेरित करने वाला खबर था।सुदूर आदिवासी अंचल में  निवासरत जनजातीय समूह के बच्चों  का नीट जैसी प्रवेश परीक्षा पास कर चयनित होना निश्चित रुप से आदिवासी क्षेत्रों के लिए शुभ संकेत है।

सरकार की"प्रयास विद्यालय" जैसी पहल भी नि:संदेह साधुवाद का पात्र है जिन्होंने आदिवासी बच्चों के हौसलों को उडा़न और उनके सपनों को पंख प्रदान किया है।

"प्रयास आवासीय" विद्यालय योजना का उद्देश्य नक्सल प्रभावित जिले और आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को बेहतर शिक्षा देना है। स्टूडेंट्स को कॉम्पिटिशन एग्जाम की तैयारी भी कराई जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए विशेष कोचिंग दी जाती है।इन आवासीय विद्यालयों से हर साल कई बच्चों का बड़े शिक्षण संस्थानों में सिलेक्शन होता रहा है।छत्तीसगढ़ में 9 प्रयास आवासीय विद्यालय हैं।

इस खबर में जिन2 बच्चों का नाम छपा है उस में से जिस बालिका का नाम आया है उनके गुरुजनों और उनके पापा से मेरा परिचय रहा है। उनके शिक्षकों ने बच्ची की क्षमता को परखा और भरपूर प्रोत्साहित किया। साथ ही उनके पिताजी जगतराम कंवर के मेहनत और लगन को भी सराहा जाना चाहिए।

जगत भाई से स्कूल के जमाने से परिचित हूं।जब मैं मिडिल स्कूल में था वे मुझसे 2 कक्षा आगे पढ़ रहे थे।तब वे अपने गांव से पैदल ही 4 किमी चलकर छुरा पढ़ने आते थे। संभवतः परिस्थितिवश वो बहुत ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए और एक कपड़ा दुकान में नौकरी करने लगे।अपनी ईमानदारी और लगन से उन्होंने अपना स्थान बनाया और संभवतः छुरा नगर में एक ही दुकान में लंबे समय तक काम करने के उनके रिकार्ड को अब शायद ही कोई तोड़ पाए।जब उनके दुकान मालिक ने अपना होलसेल बड़ा दुकान खोला तो उस दुकान को उन लोगों ने उन्हीं के संचालन में छोड़ दिया। वर्तमान में अब वे कपड़ा दुकान के संचालक हैं।

ईमानदारी और मेहनत का फल देर सवेर जरुर मिलता है।इस बात को जगत भाई ने साबित किया है। फिलहाल जगत भाई और उनके परिजनों को बेटी के चयन पर बहुत बहुत बधाई....

रविवार, 1 सितंबर 2024

बैठे ठाले


 एक दौर था जब ब्लाॅगिंग में खूब कलम घिसाई चलती थी। नई पुरानी बातों पर खूब लिखा करता था। लेकिन बीते सालों में कुछ ऐसी घटनाओं से साक्षात्कार हुआ कि लेखन लगभग-लगभग थम सा गया है।

कुछ बदलाव भी इन दिनों देखने को मिल रहा है।अब लोग मोबाइल पर कुछ पढ़ने के बजाय यूट्यूब के शार्ट विडियो को स्क्राल करने में अधिक आनंद महसूस करते हैं।लिखाई पढ़ाई वाला दौर भी गुजरने वाला है समझिए। पाठकों की प्रतिक्रिया भी अब ज्यादा नहीं आती।पाठक की प्रतिक्रिया ही लेखन के लिए टानिक का काम करती है।टानिक स्वाद में कड़वा रहे या मीठा लेकिन सेहत के लिए फायदेमंद जरुर होता है।ठीक वैसे ही अच्छी बुरी दोनों प्रतिक्रिया लेखन के लिए लाभकारी होता है।
ब्लॉग लेखन में अभनपुर निवासी आदरणीय ललित शर्मा जी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है।एक समय में वे ब्लॉगिंग की दुनिया के स्टार रहे हैं और आज भी छत्तीसगढ़ की पुरातन परंपराओं और इतिहास के ऊपर लेखन में सक्रिय है। नवोदित लेखकों को भी अपने वेब पोर्टल में भरपूर मौका देते हैं। उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात का अवसर भी मिला है। छत्तीसगढ़ में प्रचलित रामलीला के ऊपर उनकी किताब को उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित किया गया है।
छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी संस्कृति पर लेखन और संकलन के लिए उनका प्रयास स्तुत्य है।
ब्लॉग लेखन आनंददायक काम है।जब किसी विषय पर लिखने का मूड बनता है तो बस लिखते चले जाते हैं।किसी प्रकार की कोई विशेष तैयारी नहीं करनी पड़ती। महिनों बाद फिर से कुछ लिखने का मन बना है। उम्मीद है कि कुछ लिख पाऊं....मेरे मार्गदर्शक पाठकों से मुझे स्नेह मिलता रहेगा ऐसी आशा है।

सोमवार, 10 जून 2024

कैसा रेल बनाया बनाने वाले...

फोटो गूगल से साभार 


 बचपन के दिनों में जब रेडियो ही मनोरंजन का सर्वव्यापी साधन हुआ करता था,उन दिनों छत्तीसगढ़ के मशहूर गायक पंचराम मिर्झा का ये गीत खूब हमने खूब सुना था। जिसमें मनुष्य शरीर की नश्वरता और और भजन की महत्ता के बारे में बताया गया है। हमारी कक्षा चौथी के हिन्दी पाठ्य-पुस्तक में भी एक पाठ रेल के बारे में था।भारत में पहली रेलगाड़ी ठाणे से मुंबई के बीच चली थी ये अब तक मुंहजबानी याद है।

रेल, शब्द से हम सब बचपन से परिचित हैं।रेलगाड़ी का खेल खेलकर ही हम सब बड़े हुए हैं। इंटरनेट पर रेल का शाब्दिक अर्थ खंगालने पर पता चला कि इसका मतलब बहाव,भाप के दबाव से चलने वाला वाहन और लोहपथगामिनी है।अर्थात लोहे के सड़क पर चलने वाला वाहन।रेल (Rail) परिवहन का एक ज़रिया है जिसमें यात्रियों और माल को पटरियों पर चलने वाले वाहनों पर एक स्थान से दुसरे स्थान ले जाया जाता है। पारम्परिक रूप से रेल वाहनों के नीचे पहियें होते हैं जो इस्पात (स्टील) की बनी दो पटरियों पर संतुलित रूप से चलते हैं, लेकिन आधुनिक काल में चुम्बकीय प्रभाव से पटरी के ऊपर लटककर चलने वाली 'मैगलेव' (maglev) और एक पटरी पर चलने वाली 'मोनोरेल' जैसी व्यवस्थाएँ भी रेल व्यवस्था में गिनी जाती हैं। रेल की पटरी पर चलने वाले वाहन अक्सर एक लम्बी पंक्ति में एक दुसरे से ज़ंजीरों से जुड़े हुए डब्बे होते हैं जिन्हें एक या एक से अधिक कोयले, डीज़ल, बिजली या अन्य ऊर्जा से चलने वाला इंजन (engine) खेंचता है। इस तरह से जुड़े हुए डब्बों और इंजनों को 'रेलगाड़ी' या 'ट्रेन' (train) कहते हैं।

रेल यातायात का सबसे बड़ा साधन है। दुनिया में चौथे स्थान पर भारतीय रेलवे है।साल दर साल रेलवे खुद को अपडेट कर रहा है।कोयले वाले इंजन से रेलवे का सफर शुरू हुआ था जो अब शत् प्रतिशत विद्युतीकरण की ओर है।

कॉमर्स मिनिस्ट्री के ट्रस्ट इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के अनुसार, भारत में हर दिन लगभग 22,593 ट्रेनें संचालित होती हैं।इनमें 13,452 यात्री ट्रेनें हैं, जो करीब 7,325 स्टेशनों को कवर करती हैं। इन यात्री ट्रेनों से रोजाना 2.40 करोड़ यात्री सफर करते हैं। ट्रेनों की इस संख्या में मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर सभी तरह की ट्रेनें शामिल हैं।

रेलवे की मालगाड़ियां औद्योगिक विकास और व्यवसाय के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह है‌।यह ना कभी रुका है और ना कभी थका है।कोरोनाकाल को छोड़कर।

आश्चर्य होता है ये कल्पना करके कि लाखों करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाले रेलवे स्टेशन में कोरोना काल के समय पसरा सन्नाटा कितना भयावह रहा होगा।

रेल के प्लेटफार्म में संपूर्ण भारत का दर्शन होता है।रंग बिरंगी खान-पान और संस्कृति का परिचय रेलवे में यात्रा के दौरान होता है।रेल की खिड़की से शहर, जंगल,गांव,खेत,नदी पहाड़ को निहारने का आनंद अलग ही होता है।हर प्रदेश का अपना विशिष्ट खान-पान और चना चबैना भी होता है जिसका आनंद रेल के सफर के दौरान बख़ूबी उठाया जा सकता है।

रेल का सफर स्लीपर और जनरल बोगी में कष्टकारी हो गया है। रेलवे शौचालय की गंदगी इतने प्रयत्नों के बाद भी खत्म नहीं हो पाई है। विभागीय उदासीनता और लोगों के गैरजिम्मेदाराना रवैया के चलते इसका निराकरण होना भी मुश्किल लगता है।

स्लीपर कोच और जनरल डब्बा में अंतर खत्म हो गया है।लोग भेड़ बकरियों की तरह ठूंस दिए जाते हैं और यात्रा यातना में बदल जाती है।

नियमों की धज्जियां यात्रीगण खुलकर उड़ाते हैं।सबसे भयावह पल तब होता है जब किन्नर बोगियों में घुसकर वसूली करते हैं। अश्लील गालियां देते हुए जब ये किन्नर राशि मांगते हैं तब परिवार समेत यात्रा करते यात्री शर्मसार हो जाते हैं।इस समस्या के निराकरण का कोई उपाय अब तक नहीं निकाला जा सका है।इन सबके बावजूद रेलयात्रा का अपना अनूठा आनंद है। 

वैसे हमारा शरीर भी तो एक रेल ही है जो सांसों के कोयले पर जीवन की पटरी पर दौड़े जा रही है।सुख दुख के स्टेशनों को पार करती..बार बार...लगातार। इसलिए जीवन में जब भी अवसर मिले निकल पड़ें छुकछुकिए पर.... दुनिया को जानने समझने और आनंद के लिए।





खैर,अब वंदे भारत जैसे हाइटेक ट्रेन यात्रा को त्वरित और सुगम बना रही है।बुलेट ट्रेन चलाने की दिशा में भी भारत सरकार लगातार कोशिश कर रहा है। उम्मीद है अच्छे दिन आयेंगे।

फिल्म दोस्त में किशोर कुमार ने रेल पर एक बहुत बढ़िया गीत गाया है..... गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है.... चलना ही जिंदगी है...चलती ही जा रही है...

सच है ना... चलने का नाम ही जिंदगी है। मिलते हैं अगले पोस्ट में...तब तक राम राम

सोमवार, 1 जनवरी 2024

जो बीत गई सो बात गई...


 लिखना मेरा शौक रहा है, और उसे शौक से ऊपजा था ये ब्लॉग।नये साल पर हमेशा कुछ ना कुछ लिखता रहा।

पर पिछले साल की त्रासदी ने मुझे कुछ लिखने लायक ही नहीं छोड़ा।जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो बहुत कुछ बदल जाती है।जीने का नजरिया,तौर तरीका और भी बहुत कुछ...
जीवन चलने का नाम है।जीवन पथ पर जो भी जैसे भी मोड़ आए सबको पार करते हंसते रोते आगे बढ़ना ही जिंदगी है।
ज़ेहन में बार बार एक गीत आता है।शायद सफर फिल्म का गीत है...
नदिया चले चले रे धारा
चंदा चले चले रे तारा....
तुझको चलना होगा...तुझको चलना होगा...
इस गीत की पंक्तियों में जीवन दर्शन समाया सा लगता है।
जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
आंधी से तूफां से डरता नहीं है
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंजिल को तरसेंगी तेरी निग़ाहें...
तुझको चलना होगा...
बस इसी के धुन में चले जा रहे हैं। वक्त के साथ बदलना कभी कभी इंसान की मजबूरी हो जाता है।वो चाहकर भी खुद को हमेशा एक सा नहीं रख सकता। कुछ कमियां जीवन भर पूरी नहीं होती। लेकिन इंसान को कमियों के साथ भी जीना है..आगे बढ़ना है।नये साल या पुराने साल का उमंग उत्साह अब गुदगुदाता नहीं है।आज सोच लिया था कि कुछ लिखना ही है...सो लिख डाला। क्या पता फिर से मेरा लिखना चालू हो जाए।डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जी ने भी लिखा है कमियों के साथ जीना सिखाते हुए...
अंबर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है...
जो बीत गई सो बात गई 

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज ...