रथदूतिया, दूजडोल और रथयात्रा



 

महाप्रभु आज अपने भक्तों का हाल जानने स्वयं रथ पर विराजमान होकर अपने बड़े भाई और बहन के साथ निकले हैं। जगन्नाथ स्वामी की ये रथयात्रा मंगलकारी होने के साथ साथ अद्भुत भी है।

स्नान पूर्णिमा के बाद महाप्रभु अस्वस्थ हो जाते हैं। फिर 15 दिन के विराम और स्वास्थ्य लाभ लेने के पश्चात जगत के नाथ जगन्नाथ पुनः अपने भक्तों का कुशलक्षेम जानने निकल पड़ते हैं।

रथयात्रा की परंपरा ओडिशा में है। लेकिन संपूर्ण भारतवर्ष में प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है।हमारा छत्तीसगढ़ तो ओड़िशा से लगा हुआ ही है तो रथयात्रा की ये परंपरा छत्तीसगढ़ में भी उतनी ही भक्ति भाव और श्रद्धा से निभाई जाती है।

आज हमारे छुरा नगर में भी भव्य रथयात्रा निकाली गई है। ओडिशा की भजन मंडली और झांकी ने आयोजन को भव्य बना दिया है। प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा देखकर मुझे एक बुजुर्ग कलाकार नेहरू पेंटर की स्मृति अनायास ही हो आई है।वे भी प्रभु जगन्नाथ के भक्त थे।वे नि: संतान थे।तब छुरा में फोटो फ्रेमिंग करने वाले और गणेश प्रतिमा बनाने वाले वे इकलौते कलाकार थे। छोटी-छोटी गणेश जी की प्रतिमा बनाते थे।1995-96 में जब मैं छठी कक्षा में था मेरी दादी ने मुझे उनके पास सवा पांच रुपए पकड़ाकर गणेश प्रतिमा लाने भेजा था। मैं जब उनके पास पहुंचा और दादी का परिचय देकर मूर्ति के लिए कहा तो उन्होंने पहले से एक अलग करके रखी हुई मूर्ति पकड़ाया और कहा-तुम मेरी बहन के नाती हो इसलिए मेरे भी नाती हो।

वो छोटे साईज की मूर्ति ही बनाते थे।कम दाम वाली। इसलिए बच्चों के पसंदीदा मूर्तिकार थे।4-5 रु में ही बच्चों को मूर्तियां दे देते थे।जब वो जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा निकालते थे तब उनके साथ मात्र एक दो सहयोगी होते थे और एक हाथ ठेले को सजाकर खुद घंटी बजाते भगवान जगन्नाथ को नगर भ्रमण करवाते। जगन्नाथ स्वामी की वर्तमान मंदिर का निर्माण काफी बाद में हुआ है।

हमारे गांव में भी रथयात्रा मनाने की परंपरा पुरानी है।तब रथ का ठाठ बना हुआ रखा रहता था। रथयात्रा के दिन उसमें गांव के दो कृषकों के बैलगाड़ी के पहिए को लगाकर रथ बनाया जाता था।तब समूचा गांव प्रभु जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए उमड़ पड़ता था। महिलाएं अपने घर के द्वार पर प्रभु जगन्नाथ की आरती उतारकर समूचे परिवार की मंगलकामना करतीं और महाप्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करती थी। रथयात्रा आज भी निकाली जाती है लेकिन अब स्वरुप बदल गया है।अब एक छोटे मालवाहक को रथ बनाकर सजा दिया जाता है जिसमें प्रभु जगन्नाथ के विग्रह के साथ पंडित जी बैठे होते हैं और उसमें ग्राम भ्रमण के साथ रथयात्रा संपन्न होती है।

पडोस के कुछ गांव जैसे कनसिंघी और सुरंगपानी में आज भी रथ में ही प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है। मेले का आयोजन होता है।

जगन्नाथ के प्रसाद को महाप्रसाद कहा जाता है। रथयात्रा के दिन मिलने वाले प्रसाद को गजामूंग कहा जाता है। दोनों ही प्रसाद को साक्षी मानकर छत्तीसगढ़ में मितान बदने की परंपरा है। जिसमें दोनों मितान परस्पर मुलाकात होने पर सीताराम महाप्रसाद या सीताराम गजामूंग के अभिवादन के साथ वार्तालाप शुरू करते हैं।ये मितानी परंपरा दो परिवारों के बीच एक प्रगाढ़ संबंध स्थापित करती है जिसमें दोनों को हर सुख-दुख में एक दूसरे का साथ निभाने की भावना सन्निहित होती है।

गजामूंग का शाब्दिक अर्थ होता है अंकुरित मूंग। छत्तीसगढ़ में अंकुरण की स्थिति को गाजा आना कहा जाता है।रोज छप्पन भोग खाने वाले जगन्नाथ स्वामी भी अलग-अलग  अवसर भांति भांति के भोग स्वीकार करते हैं।बारहों मास गेहूं आटे का सूखा प्रसाद, जन्माष्टमी पर पंजीरी और माखन मिश्री रथयात्रा पर गजामूंग।

रथयात्रा को छत्तीसगढ़ में दूजडोल और रथदूतिया कहा जाता है।इन दोनों का क्या मतलब होता है अगर आप जानते हैं तो जरुर बताएं।

जय जगन्नाथ....



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