आठे गोकुल और तेंदू सीथा की खीर
बचपन की जन्माष्टमी भी क्या खूब होती थी।सुबह जल्दी उठकर दोस्तों और बड़े भाईयों के संग नदी नहाने जाना।उपवास रखना और रात को भजिया बड़ा और तेंदू सीथा की खीर का फलाहार करना।
अभी के समय में भांति-भांति के फल और मिठाई रेडीमेड बाजार में उपलब्ध है।पैसा फेंको और तमाशा देखो।मतलब खरीद लो।
हमारे बचपन के दिनों में गांव में अक्सर अभावग्रस्तता होती थी।उस समय बचपन से ही ये संस्कार बच्चों को सीखा दिए जाते थे कि नाहक खर्च ही नहीं करना है।
हमारे गांव में श्री राधा कृष्ण का बहुत पुराना मंदिर है। बताते हैं कि मंदिर की नींव भारत के स्वतंत्रता वर्ष यानी 1947 में ही रखी गई थी जो लगभग दो तीन वर्षों में पूरी हुई। मंदिर निर्माण कर्ता के वंशज बताते हैं कि उनके पिता जी रेल से नवापारा के एक सेठ के साथ मूर्ति खरीदने जयपुर गए थे। राधाकृष्ण की मूर्ति खरीदने का एक दिलचस्प वाकया उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण की काली और श्यामल दोनों मूर्तियां थीं। जिसमें काली मूर्ति की कीमत कम थी और श्यामल संगमरमर की मूर्ति की कीमत ज्यादा।तो भी उन्होंने श्यामल संगमरमर की मूर्ति को खरीदा।
जयपुर पहुंच कर उन्होंने कृष्ण मूर्ति को पसंद कर लिया लेकिन मूर्ति निर्माता ने बताया कि राधा की प्रतिमा नहीं बन पाई है।सप्ताह भर का समय लगेगा।तब उन्होंने मूर्ति के बनने तक वहां प्रतीक्षा किया था।
खैर, ये तो मूर्ति के बारे में बात हुई।असल में भगवान बालकृष्ण बच्चों के चहेते होते हैं। इसलिए बच्चे कृष्ण जन्माष्टमी का उपवास शौक से रखते हैं।सो हम लोग भी चाय और पानी के भरोसे जैसे तैसे दिन गुजार लेते थे।
पहले भगवान के भोग के लिए एक विशिष्ट पकवान बनता था-तेंदू सीथा की खीर। वैसे तो सीथा का साधारण सा मतलब होता है भात का दाना। लेकिन तेंदू सीथा का मतलब होता है तेंदू के कच्चे फल का अपरिपक्व बीज।
पके हुए तेंदू तो सभी खाते हैं लेकिन तेंदू सीथा की खीर खाने का सौभाग्य आप में से बहुतों को नहीं प्राप्त हुआ होगा। तेंदू सीथा की खीर भी नार्मल खीर जैसे ही डिक्टो उन्हीं सामग्रियों से बनती थी। उसमें अंतर सिर्फ यही रहता था कि सामान्य खीर में चावल डालते हैं जबकि तेंदू सीथा के खीर में तेंदू के बीज।
तेंदू सीथा की खीर बनाना थोड़ा श्रमसाध्य कार्य था। इसके लिए सबसे पहले जंगल जाकर तेंदू के कच्चे फल को तोड़कर लाते थे। फिर उसको कुचलकर उसके मुलायम बीच को तालाब में ले जाकर साफ करते थे।कच्चे तेंदू का फल स्वाद में कसैला रहता है। फिर घर में उसकी और अच्छे से सफाई होती थी।तब जाकर कहीं बनता था ये स्वादिष्ट पकवान।
शाम के समय भेंगराज के पत्तों से आठे गोकुल का चित्र बनाकर घर घर में पूजा होती थी।
आठे गोकुल के चित्र में एक नौका पर आठ लोग सवार रहते थे ये हल्का हल्का सा अब भी याद है। लेकिन उसे बनाने का क्या अर्थ था मुझे आज भी ज्ञात नहीं है।
जन्माष्टमी के दिन आठे गोकुल के चित्र का अंकन करके ही पूजा करने की परंपरा थी। रेडीमेड कृष्ण भगवान के चित्र तब भी उपलब्ध होते थे लेकिन उसकी पूजा नहीं होती थी।ग्राम्य जीवन की परंपरा भी अद्भुत होती है।बीते 30 सालों में बहुत कुछ बदल गया है। कृष्ण जन्माष्टमी का स्वरूप भी। आजकल बच्चों के नृत्य वगैरह के कार्यक्रम खूब होते हैं। लेकिन हमारे लिए तो वही पुराने दिन ही खूबसूरत थे और वही पुरानी यादें....
आप सबको आठेगोकुल की बहुत बहुत बधाई

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें