विजय क्रिकेट क्लब छुरा
ये मेरा 100 वां ब्लॉग है।कुल जमा 8 वर्ष खप गए शतक पूरा करने में।इन बीते 8 सालों में मैंने बहुत कुछ गंवाया है।कुछ उपलब्धियां भी हासिल हुई लेकिन जिन अनमोल निधियों को मैंने गंवाया है उसकी भरपाई दुनिया की कोई चीज पूरी नहीं कर सकती।
ब्लॉग लिखने का शौक था बस वही पूरा कर रहा हूं।इस दौरान जमाना काफी बदल चुका है। पढ़ने का दौर खत्म हो चुका है अब देखने का दौर आ गया है।लिखित ब्लॉग की जगह विडियो ब्लॉग बनाने का दौर अपने चरम पर है।
लोग अपने नीजी जीवन को लोगों के सामने परोसने के लिए आतुर जान पड़ते हैं। शौचालय और शयन कक्ष की गतिविधियां ही अब सार्वजनिक होना बाकी रह गया है।हो सकता है ये मर्यादा भी आगे कुछ वर्षों में टूट जाए और आदमी यत्र तत्र सर्वत्र रीलबाजी के चक्कर में अपना इज्जत तक नीलाम करने से बाज ना आए।खैर, दुनिया का काम आगे बढ़ना है वो बढ़ती जाएगी।चाहे पतन हो या उत्कर्ष....
आज के ब्लॉग में मैं छुरा के क्रिकेट आयोजन को याद करना चाहूंगा।जैसे ही शरद ऋतु का आगमन होता था छुरा में क्रिकेट आयोजन की तैयारियां शुरू हो जाती थी।रोड रोलर से क्रिकेट पिच का समतलीकरण कार्य शुरू हो जाता था और आसपास की झाड़ियों की सफाई भी।
छुरा का मैदान स्कूल से लगा हुआ है। आदर्श स्कूल, गर्ल्स प्राइमरी स्कूल और हायर सेकंडरी स्कूल की दीवार मैदान का उत्तरी छोर था।शेष तीनों ओर खुला भू-भाग था जिसमें सेनहा पेड़ की झाड़ियां उग आया करती थी।
तब मैदान बहुत बड़ा होता था।आज तो उसी मैदान पर जनपद पंचायत की भवन, पानी टंकी, मंच आदि बन चुका है और उसका चौथाई हिस्सा खत्म हो गया है।बची खुची जगह पर स्टेडियम बना दिया गया है। स्कूल के अहाते पर बैठकर बरगद वृक्ष की एयरकंडीशन छांव में मैच देखने का जो आनंद हमने लिया है वो देवदुर्लभ है।
आयोजन विजय क्रिकेट क्लब छुरा के तत्वावधान में होता था जिसमें दो चार बातें कामन होती थी।पहला शौकत साऊंड सर्विस की माईक हर साल लगती थी और उस समय का लेटेस्ट हिट गाने मैच शुरू होने के पहले तक और विराम में खूब बजते थे।दूसरा आमानारा, बागबाहरा और फिंगेश्वर की टीम हर साल खेलने के लिए आती थी।उस वक्त के बाहरी खिलाड़ियों में फिंगेश्वर के आशाराम और बागबाहरा के नितेश मार्टिन चर्चित नाम थे।छुरा के खिलाड़ियों में अरुन टी,विनोद मोंगरे,राजेश शर्मा, आनंद सारस्वत, ईश्वर सिन्हा, पवन सिन्हा, चंचल सिन्हा, पूनम चंद्राकर, अनिल यदु, दिनेश सिन्हा प्रमुख थे।पवन, चंचल और ईश्वर सिन्हा भाईयों की तिकड़ी मैच में खूब रंग जमाती थी।
पूनम चंद्राकर, पवन सिन्हा और अनिल यदु की कमेंट्री शानदार होती थी।
सामान्यत: दशहरे के बाद से आयोजन शुरू होता था और दीपावली के पूर्व मैच का समापन हो जाता था। चूंकि हम उस समय छात्र जीवन में थे इसलिए लघु अवकाश और दीर्घ अवकाश के समय मैच देख लेते थे।मैच तो जैसे भी होता था लेकिन उस समय बजाए जाने वाले गीत बहुत शानदार होते थे।
मुझे याद है जब हम लोग नवीं कक्षा में थे तब जैसे ही 10 बजे प्रेयर स्टार्ट होती थी।उसी समय उनका गाना भी बजता था..... सरकी जो सर से वो धीरे.... धीरे....।सर लोग विद्यार्थियों की ओर देखते थे और विद्यार्थी अपनी मुस्कान छुपाने का असफल प्रयास करते नजर आते।
उसके अगले साल घूंघट में चांद होगा गीत ने खूब धूम मचाया था।
उन दिनों आमानारा, बागबाहरा और फिंगेश्वर के मैच काफी रोमांचक होते थे।छुरा के खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी बेहतरीन होता था। ज्यादातर मैच में आयोजक समिति ही ट्राफी का हकदार बनती थी।
उस दौर में संसाधनों का अभाव और आर्थिक रूप से कम मजबूती थी लेकिन खेल के लिए खिलाड़ियों में जोश और जुनून था।सारे के सारे खिलाड़ी मिडिल वर्ग और निचले तबके के थे लेकिन वो दौर छुरा के क्रिकेट इतिहास का स्वर्णिम दौर था।
पिछले वर्षों से छुरा में फिर से क्रिकेट मैच के व्यवसायिक आयोजन हो रहे हैं जिसमें लाखों रुपए का ईनाम रखा जाता है।मैच के आयोजक स्थानीय व्यवसायिक संस्थान रहते हैं। खिलाड़ियों की टीम खरीदी जाती है। यूट्यूब से मैच का लाईव प्रसारण होने लगा है। लेकिन वो मजा अब नहीं आता जो आज से 25 साल पहले के आयोजन में आता था... हो सकता है ये उम्र का असर हो... लेकिन मेरी यादों में वही पुरानी स्मृतियां सदैव जिंदा रहेगी और यदा कदा चेहरे पर मुस्कान बिखेरते रहेंगी... मिलते हैं अगले पोस्ट पर... तब तक जय श्री राम..
... नमस्कार

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