संदेश

रामायण और भातृत्व

चित्र
 अभी देश में हालात काफी मुश्किल भरा है।चीन से आई महामारी ने देश दुनिया की कमर तोड़ कर रख दी है। इस वैश्विक महामारी के रोकथाम के लिए संपूर्ण देश में लाकडाऊन लागू है। सभी लोग घर में रहने के लिए बाध्य है और चिकित्सा आपात के इस कठिन दौर में ये उचित भी है।इस अवस्था में लोग घर में बैठकर बोरियत महसूस ना करें इसलिए दूरदर्शन द्वारा पुराने पौराणिक धारावाहिकों का पुनर्प्रसारण किया जा रहा है जिसमें रामायण धारावाहिक भी शामिल है।एक समय में इस धारावाहिक ने लोकप्रियता की बुलंदी को छुआ था और सालों बाद इसके पुनर्प्रसारण ने भी टीआरपी में दूरदर्शन को बुलंदियों पर पहुंचा दिया है।खैर,हम बात रामायण की कर रहे हैं और मैं इस पौराणिक गाथा में वर्णित भातृप्रेम पर कुछ विचार रखना चाहता हूं।    रामायण में जीवन के सभी पक्षों को सुंदरता के साथ अभिव्यक्त किया गया है। रिश्ते-नाते,मर्यादा,कर्तव्य और जीवन में आनेवाली कठिनाई तथा उसके समाधान के अथक प्रयास का बड़ी ही सुंदरतम चित्रण देखने को मिलता है इस महागाथा में।वैसे रामायण ही भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र को समझने का मूल माध्यम है लेकिन गोस्वामी तुलसीद...

कोरोना का कहर और छत्तीसगढ़

चित्र
आज समूचा विश्व कोरोना नामक त्रासदी के दौर से गुजर रहा है। फिलहाल विश्व के दो सौ से अधिक देश इस वायरस के चपेट में है।लगभग 65000 के आसपास की आबादी  इस महामारी के कारण काल कवलित हो चुके हैं और विश्व की बहुत बड़ी आबादी इस वायरस से संक्रमित है।इटली और स्पेन की दुर्दशा बयां करना मुश्किल है। विश्वमहाशक्ति कहा जाने वाले अमेरिका जैसे देश को भी इस महामारी ने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है।पूरी विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है।  हमारे पडोसी देश चीन के वुहान शहर से निकले कोरोना नामक दैत्य ने हाहाकार मचाकर रख दिया है।हमारा देश भी इस वायरस की चपेट में आ गया है और कोरोना संक्रमण का ग्राफ तेजी से बढ़ता ही चला जा रहा है। वर्तमान में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल की स्थिति बेहद खराब है।इन प्रदेशों में पीड़ितों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ती ही जा रही है। हालांकि केंद्र सरकार और राज्य सरकार हरसंभव प्रयास इस बढते हुए ग्राफ को रोकने के लिए कर रही है।देश के तमाम राज्यों में कोरोना के बढ़ते हुए मामले वाकई में गंभीर है। लेकिन हमारे राज्य छत्तीसगढ़ में स्थिति फिलहाल नियंत्रण में दिखाई देती है।य...

आने वाले साल को सलाम...

चित्र
आज फिर से नए साल का आगाज़ हुआ।अनवरत चलते समय के प्रवाह में एक वर्ष और जुड़ गया। वैश्विक रूप से इसी नए साल को मान्यता प्राप्त है।वैसे अलग-अलग धर्मों और जातियों में भी अपने-अपने नववर्ष को मनाने का चलन है।हमारे भारतीय पंचांग के अनुसार नववर्ष का आरंभ चैत्र महिने से होता है।उस समय को भी हम उत्सव के रूप में मनाते हैं।  खैर,हम इस मुद्दे से अलग हटते हैं और बात करते हैं बाहें पसारे खड़े नववर्ष के स्वागत की।हर नया साल उम्मीदों की एक बड़ी झोली लेकर आता है।ऐसा लगता है कि हमारे मानस में पैठी तमाम इच्छाओं की पूर्ति नए साल में जरूर हो जाएगी।हर साल का बदलता कैलेंडर मन में उम्मीद की एक लौ जरूर जलाती है।लेकिन साल पूरा होते-होते आधे-अधूरे सपनों के साथ ही साल बीत जाता है।हम हर पर्व में संकल्प लेते हैं।अपने भीतर की फलां बुराई को दूर करुंगा,समय की कद्र करूंगा,रिश्तों को सम्मान दूंगा आदि-आदि इत्यादि।लेकिन कुछ महीनों के बाद वही ढाक के तीन पात।     हम अपने संकल्पों पर अडिग नहीं रह पाते।जीवन में आनेवाले समय का उतार-चढ़ाव हमें या तो अपने संकल्पों को भूलने के लिए बाध्य कर देते हैं या हम स्वमेव ...

सुन्ना होगे फुलवारी....

चित्र
साल 2019 छत्तीसगढ़ के कलाजगत के लिए अपूरणीय क्षति का वर्ष कहा जाएगा।अभी छ:महिना पहले ही छत्तीसगढ़ के महान कलाकार खुमान साव जी जून में हमसे बिछड़े थे।उस दुख से उबर भी न पाए थे कि एक और क्षति का सामना करना पड़ गया।16 दिसंबर 2019 को हम सबके चहेते और लोकप्रिय लोकगायक मिथलेश साहू जी भी चिरनिद्रा में लीन हो गए। 28 जून 1960 को छत्तीसगढ़ के वनांचल में बसे वन्यग्राम बारूका में मिथलेश साहू जी का जन्म हुआ था।पिता स्व.जीवनलाल साहू भी कलासाधक थे।वे नाचा मंडली से जुड़े हुए थे।इसलिए लोककला के प्रति उनका झुकाव स्वाभाविक ही था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा छुरा ब्लाक के अंतर्गत स्थित कुकदा और पांडुका ग्राम में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे रायपुर गए। सन् 1977 में उनके गांव में रवेली साज के मशहूर नाचा कलाकार मदन निषाद का कार्यक्रम हुआ।उस कार्यक्रम के दौरान वे मदन निषाद की कला से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लोककला की राह ही पकड़ लिया। अध्ययन के दौरान ही उनको छत्तीसगढ़ के कलापुरोधा दाऊ महासिंह चंद्राकर और मशहूर गायक केदार यादव का सान्निध्य प्राप्त हुआ।उस दौरान उनकी सोनहा बिहान लोककला मंच की छत्तीसगढ़ में धूम...

ए पानवाला बाबू.....

चित्र
बहुत दिनों के बाद आज खुल्ला पान खरीदने के लिए पानठेला (पान बेचने के खोमचे) में जाना हुआ। दुकानदार ने बड़ी उम्मीद से पूछा-कौन सा पान बनाऊं?तो मैंने उनको मायूस करने वाला जवाब दिया-भाई मुझे खुल्ले पान चाहिए,कुछ काम है।तो उन्होंने दस रूपए लेकर मुझे बंगला पान के चार पत्ते कागज में लपेटकर थमा दिए। मैं भी पान लेकर लौट आया।मुझे ताज्जुब हुआ कि उसने बिना पूछे मुझे बंगला पान ही क्यों दिया? अगले दिन उनके दुकान पर फिर जाना हुआ तो मैंने उनसे अपने मन की बात कही।तो उन्होंने बताया कि ज्यादातर पूजा पाठ के लिए बंगला पान का ही उपयोग होता है, इसलिए बिना पूछे ही दे दिया।ये होता है कामन सेंस!!! वैसे पानवाले भाई साहब की याददाश्त की दाद देनी चाहिए क्योंकि उनको अपने ग्राहकों के टेस्ट और पसंद हमेशा याद रहती है।फलाने साहब की पसंद ये है,ढेकाने साहब ये बनवाते हैं।एकदम कंम्प्यूटर के मेमोरी में जैसे फिट कर दी हो। बचपन में जब किसी को पान मंगाना होता था तो वो सामनेवाले पान दुकान का नाम बता दिया करते थे और हम जाकर पानवाले को उन सज्जन का नाम बता दिया करते थे तब वो फौरन  ही सामने वाले बंदे की मनपसंद पान बना दिया ...

उम्मीदों के गीत.....

चित्र
जीवन सतत चलने का नाम है।ये ऐसा सफर है जिसमें पथिक को विश्राम तभी मिलता है जब वह मौत के आगोश में चला जाता है।जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।कभी खुशियों के बसंत आते हैं तो कभी गम की पतझड़ का सामना भी करना पड़ता है। हंसी-खुशी के पल जितने भी मिले कम लगते हैं और जब दुख का सामना करना पड़ता है तो एक-एक पल भारी लगने लगता है।उस समय ऐसा लगता है मानों दुनिया में कुछ भी नहीं रह गया है।सारी बातें बेमानी सी लगने लगती हैं। हौसला जवाब देने लगता है।कदम डगमगाने लगते हैं और खुद को संभालना भी मशक्कत का काम हो जाता है।ऐसे समय में दुखी आदमी किसी अपने का सहारा ढूंढता है। लेकिन सबको अपनों का साथ हर वक्त मिल जाए ये मुमकिन नहीं।तब ऐसे समय में हम गीत-संगीत सुनकर या ऐसी ही किसी मनपसंद काम करके अपने आपको मशरूफ रखते हैं।गीतों का जिक्र आया है तो मुझे कुछ चुनिंदा गीत याद आ रहे हैं,जो दुखी मन में आशा का संचार करते हैं।थके हारे से उदासी भरे मन को धीरज बंधाते हैं। किशोर दा के रोमांटिक गीतों के साथ सैड सांग्स भी बेहद पसंद किए जाते हैं। उन्होंने उम्मीद और आशाभरे बहुत से गीतों को अपने आवाज से सजाया है।जो जीने का जज्बा ...

कब तक....?

अभी पूरे देश को हैदराबाद की घटना ने हिलाकर रख दिया। सर्वत्र इस अमानुषिक कृत्य की निंदा की जा रही। आरोपियों को तत्काल फांसी पर चढाने की मांग को लेकर लोग आंदोलनरत हैं। पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए आम आदमी,युवा वर्ग और मिडिया भी उद्वेलित है।ये अच्छी बात है और होनी भी चाहिए।   इस घटना के पूर्व एक अमानवीय घटनाक्रम साल 2012 में भी घटित हुआ था।जब पूरा देश पीड़िता के लिए न्याय की मांग को लेकर उठ खड़ा हुआ था। तब दामिनी और निर्भया कांड के नाम से चर्चित अनाचार की उस घटना ने शासन-प्रशासन को कुंभकर्णी नींद से जागने के लिए मजबूर कर दिया था। इंसानियत को शर्मसार करने वाली उस घटना ने समूचे देश को हिलाकर रख दिया था।जन आंदोलन के दबाव में तब पीड़िता को न्याय दिलाने की त्वरित कोशिश की गई।सभी आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उनको सजा दिलाने का त्वरित प्रयास हुआ। तब वकीलों ने आरोपियों का मुकदमा लडने से इंकार कर दिया और भारत की उस मासूम बच्ची के नाम पर शासन की ओर से निर्भया फंड की स्थापना की गई।जिसके तहत प्राप्त राशि को महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा में खर्च करने का प्रावधान रखा गया।   उस लोमहर्षक ...