आदर्श स्कूल छुरा की यादें....



साल 1996 में पहली बार आदर्श स्कूल छुरा के दर्शन हुए जब पांचवीं बोर्ड का परीक्षा दिलाने गया।परीक्षा के ठीक 2 महिने बाद जुलाई माह में उसी स्कूल में दाखिला भी हो गया।

नीले शर्ट और जामुनी रंग के छात्र समुद्र में मेरा भी विलय हो गया।तब

आदर्श स्कूल सिर्फ लड़कों के लिए था ।आज की स्थिति में वहां लड़के-लड़कियां एक साथ शिक्षा ग्रहण करते हैं।

स्कूल का बहुत सुंदर स्वागत द्वार था।एक गस्ती का पेड़,एक हाल,एक मंच और एक आफिस था।दो बड़े कमरे और तीन छोटे कमरे और भी थे।

आफिस के ठीक नाक के सीध में एक छोटा कमरा था।एक बगल में था और एक हाल से लगा हुआ।

उस समय हर 3 किमी के दायरे में मीडिल स्कूल की सुविधा नहीं थी। आसपास के गांव कोसमबुडा,दादरगांव,कसहीबाहरा,हरदी,खुसरुपाली,रावनाभाठा,सेम्हरा,टेंगनाबासा,खरखरा, विजयपुर,तिलाईदादर,पंडरीपानी,डांगनबाय और छुरा के बच्चे एक साथ पढ़ते थे।और भी दूर दराज के बच्चे भी पढ़ते थे लेकिन हास्टल में रहकर।

हाल में राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के टीन चादर वाली बोर्ड लगे थे जिसमें मेरी पढ़ाई वहां जारी रहने तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में दिग्विजय सिंह और राज्यपाल के रूप में मोहम्मद शफी कुरैशी के नाम अंकित था।

हाल से जुड़े दोनों कक्ष के दरवाजे के ठीक ऊपर एक तरफ भारत माता और एक तरफ सरस्वती माता के कपड़े पर हस्तनिर्मित पेंटिंग टंगी होती थी।और दीवाल के चारों तरफ लाल और नीले रंग के सद्ववाक्य लिखे होते थे।

हाल के पिछले वाले कक्ष के दरवाजे के बाएं साईड पर लिखा *जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी* ये तो अभी तक याद है।उस समय तो इसका अर्थ पता नहीं था लेकिन अब जानता हूं और मानता भी हूं।

उस समय के शिक्षकीय स्टाफ में श्री जी पी देवांगन प्रधान पाठक,श्री आर जे यादव अंग्रेजी शिक्षक,श्री सी आर सिन्हा अंग्रेजी शिक्षक,श्री बी एल तारक संस्कृत शिक्षक,श्री मदन सेन हिंदी शिक्षक,श्री एम आर देवांगन विज्ञान शिक्षक और श्री कंवर सर गणित के शिक्षक थे।

जिस सत्र में मैंने दाखिला लिया था उसी सत्र में गणित विषय के नामवर शिक्षक श्री ईदु खां सर पदोन्नत होकर प्राइमरी स्कूल छुरा में प्रधान पाठक बन गए। इसलिए उनसे अध्ययन का सौभाग्य नहीं मिल पाया।

खैर,बाकी सब शिक्षकों से पूरे तीन साल तक अध्ययन सुख पाया।कुछ दुख भी थे...रुल के मार की।पर वो दर्द क्षणिक होते थे।

अनुशासन के लिए श्रद्धेय जी पी देवांगन का नाम विख्यात था।शेष शिक्षक भी अपने अपने विषयों में माहिर थे। वहां के शिक्षक एक बात कहते थे...जो बिना फेल हुए आदर्श स्कूल से उत्तीर्ण होकर निकल गया फिर वो आगे किसी क्लास में नहीं रुकता...!ये बात बहुत हद सच भी थी।

मेरे साथ पढ़े और बहुत से सीनियर और जूनियर आज अपने अपने क्षेत्रों में सफल भी है।आज अनायास ही कुछ याद आ गया तो लिख दिया.... स्मृतियां तो बहुत सी है... फिर कभी कलमबद्ध करुंगा।

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