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हमर छुरा

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 छुरा नाम से सब परिचित होंगे। हालांकि ये नाम थोड़ा डराने वाला लगता है।जिसका शाब्दिक अर्थ होता है हजामत बनाने का औजार या बड़े फलवाला चाकू।चाकू-छुरा का सीधा संबंध खून खराबे से होता है। इसलिए छुरा को खतरनाक माना जाता है। इसका मुहावरे में प्रयोग और भी खतरनाक अर्थ देता है।छुरा घोंपना एक प्रचलित मुहावरा है जिसका प्रयोग विश्वासघात के संदर्भ में किया जाता है।खैर,हमारा छुरा ये वाला छुरा नहीं बल्कि एक छोटा सा कस्बा है,जो गरियाबंद जिले में स्थित है। छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध धार्मिक नगरी और तीर्थ राजिम से मात्र 45 किमी दूर।    अब बात करते हैं इस नगर के नामकरण के बारे में। जनश्रुतियों के अनुसार ये नगर जमींदारों के जमाने में बिंद्रानवागढ जमींदारी के जमींदारों का मुख्यालय रहा है।बताया जाता है कि बिन्द्रानवागढ़ का जमींदार बूढादेव का अनन्य उपासक था।उनको बूढादेव ने उनकी उपासना से प्रसन्न होकर एक छुरी दिया था,और कहा कि इस छुरी को तुम फेंकना, जहां ये छुरी गिरेगा वहां तक तुम्हारी रियासत तक विस्तार होगा।उस समय तक नवागढ़ बिन्द्रानवागढ़ जमींदारी का केंद्र होता था।कहते हैं की उक्त छुरी जिस स्थान पर ...

रक्षाबंधन और फोमवाली राखी

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समय कभी नहीं रूकता। वक्त का पंक्षी कब फुर्र से उड जाए पता ही नहीं चलता।बचपन का जमाना गुजरे 25 साल हो गए। लेकिन लगता है कि कुछ साल ही हुए हैं। उम्र और शरीर भले ही बढ़ गए लेकिन नादानी नहीं गई है।मेरी मूर्खतापूर्ण हरकतों का दौर अब भी जारी है। और ये मुझे ठीक भी लगता है।ज्यादा सयाना होना भी अच्छी बात नहीं है।     आज रक्षाबंधन है,भाई बहन के पवित्र नाता का पर्व।बचपन में इस त्यौहार का बडी बेसब्री से इंतजार होता था।मेरे दृष्टिकोण से इसके दो कारण थे-पहला ये कि इस दिन खूब मिठाई खाने को मिलती थी और दूसरी एक से बढ़कर एक सुंदर राखियां पहनने को मिलती थी जिस पर पहनने के बाद एकमेव अधिकार होता था। रक्षाबंधन के दूसरे रोज जब स्कूल जाते थे तो खूब सारी राखियां बांधके जाते थे।अपने पास राखी कम पड़ती तो रौब जमाने के लिए घर के बड़े लोगों की राखियां भी अपनी कलाई पर बंधवा लेते थे।उस जमाने में जिसके कलाई में जितनी राखियां होती अपने हम उम्र साथियों के बीच अलग ही रौब(आज की भाषा में स्टेटस)होता था।राखी त्यौहार के तीसरे दिन हम राखियों का कत्लेआम किया करते थे।तब आज के जैसी डोर वाली राखी नहीं,बल्कि फोम और ...

बातें पेट्रोमेक्स की....

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 समय और तकनीक के बीच में भी अजीब प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।तकनीक हर दम समय के साथ आधुनिक होती जाती है और समय हर बार तकनीकी आविष्कार को पुरानी करती जाती है।जब तकनीकी आविष्कारें समय के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती तो संग्रहालय की शोभा बन जाती है या कूड़े के ढेर का कचरा।एक दौर था,जब हमारे देश के एक बड़े हिस्से का विद्युतीकरण नहीं हुआ था,तब अधिकांश घरों में मिट्टी तेल से जलनेवाली ढीबरी और लालटेन घरों को रौशन किया करती थी। कम उजाले वाले इन साधनों से घर का काम तो चल जाता था। लेकिन जब कोई बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम करना होता था तब काम आती थी पेट्रोमेक्स!!        बचपन में पेट्रोमेक्स को देखकर हमें लगता था कि ये लालटेन का बड़ा भाई होगा।इसका भी एक शान होता था,ठाठ होती थी।इसको जलाने के लिए एक जानकार आदमी की जरूरत होती थी।जो हवा के दबाव और मेंटल के बारे में जानकारी रखता था। पेट्रोमेक्स की बाती के तौर पर लगने वाले मेंटल इतना नाजुक होता था कि जरा सी गलती पर फट जाता।जब भी पेट्रोमेक्स में मेंटल बदलने का समय आता, सामनेवाला बंदा एक दो एक्स्ट्रा ही लेकर आता था।हर बार एक दो मेंटल क...

सदाबहार...नदिया के पार

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आज बहुत सालों के बाद नदिया के पार फिल्म देखी।बचपन के दिनों में विडिय में इस फिल्म को बहुत बार देखा था।जब कभी भी गांव में कलर टीवी और वीसीपी आया करती थी तब हर पांच बार में से तीन बार ये फिल्म जरूर आती थी।बचपन की स्मृतियां ताजा हो गई।ये फिल्म ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है और फिल्म की भाषा अवधी हिन्दी है।और गांव के आदमी को गांव से आत्मीय लगाव होता है।वह गांव से जुड़ी चीजों  से सहजता से जुड़ जाता है।इस फिल्म की भाषा हमारी मातृभाषा छत्तीसगढी से बहुत मेल खाती है।जैसे पहुना,भौजी,आदि।इस फिल्म के प्रति छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में जुड़ाव संभवतः फिल्म के ग्रामीण परिवेश से हमारे छत्तीसगढ़ अंचल के ग्रामों से साम्यता होना हो सकता है। फिल्म में ग्रामीण जनजीवन में आज से तीस चालीस बरस पहले जो चीजें मिला करती थी या यूं कहें की गांव की पहचान हुआ करती थी वो सारी चीज़ें दिखाई गई है।मसलन लकड़ी की खाट,बांस की सीढ़ी, लालटेन,बटलोही(खाना पकाने का पात्र),हल, बैलगाड़ी,पटसन की डोरी आंटने का ढेरा, कुआं, मिट्टी के कवेलू(खपरा) वाली छत, मिट्टी से बने घर,पठेरा(आला) आदि। फिल्म में चित्रित शादी के रस्मों ...

लाली बंगला

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छत्तीसगढ़ जनजाति बाहुल्य राज्य है। सन् 2011 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक राज्य के कुल जनसंख्या में एक तिहाई जनसंख्या जनजातियों की है।हमारे प्रदेश में कुल 42 जनजातियां पाई जाती है।जिनकी अपनी विशिष्ट जीवनशैली और रहन-सहन है।वन संपदा से भरपूर छत्तीसगढ़ में सीधे सरल स्वभाव वाले विभिन्न जनजाति समूह छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा में आदिकाल से निवासरत हैं। दुनिया की रेलमपेल से दूर सुदूर वन प्रांतर में निवासरत होती है अधिकांश जनजातियां।दिखावे और ढकोसला से दूर प्रकृति के सामिप्य के संग अपने में मगन।इस भागदौड़ की जिंदगी में बड़े बड़े पैसेवालों के पास भी बंगला नहीं हैं ऐसे में न्यूनतम जरूरत के साथ अपनी गुजर-बसर करने वाले किसी जनजातिय समूह के पास आप बंगला की कल्पना कर सकते हैं।शायद बिल्कुल भी नहीं!!! लेकिन आप मानें या ना मानें प्रकृतिपुत्रों के पास भी होता है उनका बंगला...लाली बंगला।    बंगला शब्द सुनने से ही किसी विशाल अट्टालिका का बोध होता है और सामान्यतः ऐसे भवनों के लिए ही बंगला शब्द का प्रयोग किया जाता है।बंगले आमतौर पर आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों के पास ही होता है।जैसे हमारे फि...

बचपन का सिनेमा.....

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  फुरसत के पल में पुरानी यादों की जुगाली करने में मुझे बड़ा आनंद आता हैऔर अक्सर मैं अपने बचपन की पुरानी यादों में खो जाता हूं।ये वर्चुअल मतलब आभासी दुनिया में खोने से ज्यादा अच्छा है जो स्मार्ट फोन के हाथ में आते ही हमें वास्तविक दुनिया से बेखबर कर देती है।हम अपनी मोबाइल पर आंखें गड़ाए अपने में मगन और आजू बाजू क्या हो रहा है उसकी कोई खबर ही नहीं।किसी समय पर अमीर खुसरो ने बातूनी स्त्रियों के गपबाजी में व्यस्तता को लेकर एक पंक्ति कही थी-खीर बनाई जतन से ,चरखा दिया चलाय।आया कुत्ता खा गया,तू बैठी ढोल बजाय। आज अगर अमीर खुसरो होते तो शायद पंक्तियां यूं होती-खीर बनाई जतन से, मोबाइल दिया चलाय।आया कुत्ता खा गया,तू बैठी नजर गड़ाय।    कुल जमा मतलब ये है कि आज मोबाइल ने सबको जकड़ रखा है और सभी उसके आगे पीछे घूम रहे हैं। उनमें मैं भी शामिल हूं।कभी कभी फुरसत निकालकर पुरानी यादों पर जमी धूल भी झाडनी चाहिए।जैसे वक्त बेवक्त मैं करते रहता हूं।आज मुझे बात करनी है बचपन वाली सिनेमा पर।मतलब विडियो और वीसीपी के जमाने की बातें।वीसीपी नब्बे के दशक की एक जादुई चीज होती थी जिसका इंतजार बच्चे ब...

टीकटाक गाथा...

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जब से हमारे देश में इंटरनेट की सुविधा का विस्तार हुआ और स्मार्ट फोन आम आदमी के बजट में आया तब से सोशल मीडिया नाम के एक लत का प्रवेश भारतीय जनमानस में हुआ। प्रारंभिक दौर में फेसबुक का आगमन हुआ और देश के एक छोटे से गांव में रहने वाले आम आदमी की पहुंच वैश्विक स्तर पर हुई और अंतर्राष्ट्रीय मित्रता की शुरुआत हुई। फेसबुक के बदौलत जिनका पड़ोस में भी दोस्त नहीं था उनकी दोस्ती दुनिया भर के लोगों से होने लगी।फिर आया वाट्सएप...ये भी फेसबुक का अनुगामी था और आगे चलकर फेसबुक के अधिकार क्षेत्र अंतर्गत आ ही गया।फिर आया सबसे प्रलंयकारी एप...टीकटाक।जिसने भारत में धूम मचा दिया।इस एप के बदौलत एक से बढ़कर एक छुपे रूस्तम कलाकार निकलकर बाहर आए।टीकटाक के कारण ही एक से बढकर एक डांसर,सिंगर, आर्टिस्ट और बहुमुखी प्रतिभा के धनी लोगों का अभ्युदय हुआ।   वैसे टीकटाक का जन्म हमारे पड़ोसी देश चीन में हुआ और उसका सबसे बेहतर पालन-पोषण हमारे यहां हुआ।शंघाई के दो युवा मित्रों ने मिलकर मनोरंजन के उद्देश्य से इस अद्भुत और अलौकिक एप्प का निर्माण किया। शुरूआती दौर में इसका नाम Musically था जिसे एक प्रसिद्ध चीनी कंपनी ...