संदेश

गोधूलि बेला में...

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शादियों का सीजन चल रहा है।रोज किसी ना किसी परिचित और पारिवारिक जन के यहां से वैवाहिक निमंत्रण के कार्ड प्राप्त हो रहे हैं।कार्ड के स्वरूप और डिजाइन में अनगिनत प्रयोग हो चुके हैं और सतत् जारी है। लेकिन एक चीज जो नहीं बदला है, वो है पाणिग्रहण का कार्ड में अंकित समय। अक्सर आप लोग वैवाहिक कार्ड में पढ़ते होंगे, पाणिग्रहण गोधूलि बेला में। अब ये गोधूलि बेला क्या है?और इसका क्या महत्व है? वर्तमान में अब ये महत्वपूर्ण है कि नहीं इस तथ्य को देख लेते हैं।समय के साथ क्या परिवर्तन वैवाहिक कार्यक्रम में क्या परिवर्तन हो रहा है,वो आप सब देख सुन रहे हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार शाम को जब पशु पक्षी दिनभर विचरण करके और गौ माता चारा चरने के बाद लौटती है, उस समय को गोधूलि बेला कहा जाता है।गो अर्थात गाय और धूलि अर्थात धूल।इसका तात्पर्य है कि वह समय जब गाय के चलने से धूल उड़कर अस्ताचलगामी सूर्य को ढंक लेती है। इस समय को शास्त्रों में अत्यंत पवित्र और शुभ बताया गया है। इसलिए परिणय सूत्र में आबंधन के लिए इस समय को श्रेष्ठ माना जाता है। लगभग दसेक साल पहले तक गोधूलि बेला में ही पाणिग्रहण की रस्म पूरी की ज...

दिव्य आयोजन -मानस यज्ञ छुरा नगर

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   छत्तीसगढ़ में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा है।लोकजीवन राममय है।यहां के गांवों में दिन की शुरुआत राम नाम के अभिवादन से होती है और राम भजन में शाम होता है। जहां चार सज्जन मिल जाए, वहीं राम चर्चा शुरू हो जाती है।तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस को यहां बड़े श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया व सुना जाता है। तुलसी दास जी कहते हैं- रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥ तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥ जिस श्रीरामचरित मानस को स्वयं भगवान शिव ने रचा है।वो ग्रंथ अलौकिक ही होगा। तुलसीदास जी कहते हैं छहों शास्त्र सब ग्रंथन को रस। अर्थात श्री रामचरितमानस में सभी शास्त्रों और सभी ग्रंथों का निचोड़ है। इसी अलौकिक ग्रंथ के प्रचार प्रसार के लिए सन् 1957-58 के आसपास हमारे छुरा नगर में मानस मंडली का गठन किया गया।उस समय छुरा के जमींदार श्री त्रिलोकशाह जी के नेतृत्व में उनके युवा साथियों का दल तब आसपास के गांवों में रामकथा का संदेश बांटते घूमते थे।ये वही त्रिलोकशाह जी थे,जिन्होंने सन् 1967 में कांकेर लोकसभा के अस्तित्व में आने के बाद प्रथम सांसद के रुप म...

स्वागत है 2022

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  लो भाई आ गए नये साल में!! उम्मीद करते हैं ये साल सफलता,स्वस्थता और समृद्धि देकर जाए।ऐसी ही कामना तो पिछले साल जनवरी महीने में भी किया था।पर मिला क्या? आप सब जानते हैं।बीता हुआ साल सुखद यादें कम, दुखद स्मृतियां ज्यादा देकर गया है।कोरोना की दूसरी लहर ने देश को झकझोर कर रख दिया। जिस बीमारी पर हम जोक्स बनाये उस बीमारी ने जब मार्च अप्रैल के महीने में अपना रौद्र रूप दिखाया तो हाहाकार मच गया।शमशान मुर्दों से भर गया।कितने ही लोग अपनों का अंतिम दरसन तक ना कर सके‌। जिस सांस को ईश्वर ने सबको मुफ्त में दिया है उसको लाखों रूपये में खरीदकर जीवन बचाने की जद्दोजहद करनी पडी। भगवान फिर कभी ऐसे दिन ना दिखाए। हमारे कितने ही अपनों को हमने पिछले साल खो दिया।कितने ही बच्चों के सर से मां बाप का साया उठ गया।पिछले साल के नाम पर कड़वी यादें ही शेष रह गई है।हालांकि कोरोनाकाल के उस कठिन घड़ी में लोग जात धरम भूलकर सिर्फ इंसान थे, ये महत्वपूर्ण बात है। सरकारी तंत्र ने हरसंभव प्रयास लोगों का जीवन बचाने के लिए किया।जिस चरमराती स्वास्थ्य सेवा के लिए हम लोग शासन को कोसते हैं, उसी ने आम आदमी के प्राणों की रक्षा किय...

वक्त से डरकर रहें...

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 व्यस्तता इतनी अधिक है कि लेखन गतिविधियां लगभग अवरूद्ध सा है। इसलिए ब्लाॅग अभी थम सा गया है। लेकिन कल और आज में दो लोगों की जिंदगी में आए मोड़ को देखकर ताज्जुब में हूं‌।कल जनजातीय ग्राम कनफाड़ में जाना हुआ। वहां एक धाकड़ और वजनदार व्यक्तित्व वाले जनजाति नेता थे। पिछले दो सालों से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी।सोचा आया हूं तो हालचाल पूछता चलूं। फिर उनके घर के सामने जाकर आवाज लगाया।जब दो तीन बार पुकारने पर भी कोई जवाब  नहीं आया तो उनके खुले द्वार से झांककर देखा तो आंगन नजर आया जहां वो बुजुर्ग मुझे अपने हाथ पैर से घिसटते नजर आए। मैं स्तब्ध था, एक दौर था जब वो शख्स धड़धड़ाते हुए किसी भी कार्यालय में चला जाता था और साइकिल में ही कई किलोमीटर की दूरी नाप देता था।आज घिसटकर चलने पर मजबूर है। उनकी दशा देखकर दुख हुआ। गांव वालों से पूछने पर पता चला कि पिछले साल भर से उनकी ऐसी ही दशा है। वक्त भी अजीब सितम ढाता है। आज नजदीकी गांव सेम्हरा में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लोक कला मंच लोरिक चंदा की प्रस्तुति देखने गया तो वहां भी एक आश्चर्य मेरा इंतजार कर रहा था। वहां लगभग पागलों जैसी हालत में एक शख्...

गांधी के मायने....

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 फोटो सोशल मीडिया से साभार आज भारत के दो विराट व्यक्तित्व वाले महामानवों की जयंती हैं।किनकी है?अगर ये पूछने की और बताने की नौबत आती है,तो निश्चित रूप से हमें शर्म आनी चाहिए अपने हिंदुस्तानी होने पर!! आज विश्व अहिंसा दिवस भी है। अहिंसा के परम उपासक बापू के सम्मान में उनकी जयंती को विश्व ने अहिंसा दिवस के रूप में मान्यता देकर उनको आदरांजलि दी है। लेकिन ऐसे विराट और महान व्यक्तित्व के लिए पिछले कुछ सालों से कुछ अल्पबुद्धियों और अधकचरे ज्ञान के धनी लोगों ने सोशल मीडिया पर घृणा का अभियान चला रखा है। गांधीजी की फोटो पर अभद्र मीम्स बनाये और प्रसारित किए जा रहे हैं।इन लोगों के दिमाग में एक प्रकार की कुंठित मानसिकता घर कर गई है।उनको लगता है कि भारत विभाजन के लिए गांधीजी ही जिम्मेदार हैं।अनेक क्रांतिकारियों की शहादत गांधी की उदासीनता के कारण अकारण हुई। जिस बापू को टैगोर ने महात्मा, बोस ने राष्ट्रपिता और अखिल विश्व ने अहिंसा के पुजारी की पदवी से अलंकृत किया उनके योगदान पर आज की पीढ़ी सिर्फ वाट्सएप ज्ञान के बूते उनके चरित्र पर उंगली उठाती है तो क्षोभ होता है। गांधी का त्याग अतुलनीय है। स्वतंत्...

ये जीवंत देव प्रतिमाएं...

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 आज अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस है।जीवन की विदाई बेला पर खड़े अनुभव के पिटारे को सम्मानित करने का दिन।साल 1991 से 1 अक्टूबर को बुजुर्गों के सम्मान के लिए समर्पित किया गया है। लेकिन इस एक दिन को छोड़ बाकी दिनों में क्या बुजुर्गों का सम्मान नहीं किया जाना चाहिए। मनुष्य में एक बड़ी गंदी आदत है, जो चीज उनके काम की रहे या जब तक उनसे कोई लाभ मिल रहा हो तभी तक वह उसकी कद्र करता है। भौतिकतावादी इस युग में अब बुजुर्गों को भी किसी सामग्री की तरह उपयोगी और अनुपयोगी में वर्गीकृत कर दिया गया है। शारीरिक शक्ति से हीन और मानसिक रूप से खिन्न बुजुर्गों को आज हाशिये पर रखा जा रहा है।आज घर घर में बुजुर्गों का अपमान होता है।किसी के पास धन संपत्ति हो तब बात अलग हो जाती है। बचपन के दिनों में पढ़ी मुंशी प्रेमचंद की लिखी दो कहानियों "पंच परमेश्वर" और "बूढ़ी काकी" की दोनों बुजुर्ग पात्रों की तस्वीर आज भी आंखों के आगे बरबस आ जाता है। विशेष रूप से बूढ़ी काकी की वो दीन-हीन बुजुर्ग, जिसका अत्यंत मार्मिक चित्रण मुंशीजी ने किया है। कहानी पढ़ते पढ़ते ही बरबस आंखें छलक आती है। बुढ़ापे में जीभ से स्...

विद्रोह जरूरी है!!!

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 कुछ महीनों से ब्लॉग लेखन बंद था।कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा था।वैसे मेरे लेख को पसंद करने वाले लोग सतत मेरा उत्साह वर्धन ब्लाग पर आकर या मेरे निजी नंबर से संपर्क कर करते रहते हैं,जो मेरे ब्लाग लेखन में निरंतरता के लिए टानिक का काम करता है।लेखन का कार्य भी दिमाग के ऊपर आश्रित होता है।कभी कभी लिखने के लिए जगह और विषय मायने नहीं रखती, धाराप्रवाह मन का आवेग शब्दों में उतर जाता है और कभी कभी पूरी तैयारी के साथ भी लिखने के लिए बैठो तो कुछ भी नहीं सूझता।मेरे मित्रों ने लेखन के लिए सदैव मेरा उत्साह बढ़ाया है।उनका सतत सहयोग भी मुझे मिलता है।मैं मित्रों को परेशान करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूं और जब वे सीधे नहीं मानते तो बरपेली(जबरदस्ती)उनको सहयोग देने के लिए बाध्य करता हूं।  पिछले दिनों एक परिचित से मुलाकात हुई। पिछले वर्ष वे अकस्मात पक्षाघात के शिकार हुए और उसके चेहरे के दांये भाग और हाथ को लकवा मार गया था। लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और प्राकृतिक उपचार की ताकत से अब अच्छी हालत में हैं।दैनिक दिनचर्या को स्वयं कर लेते हैं अकेले साइकिल चला पा रहे हैं...