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आठे गोकुल और तेंदू सीथा की खीर

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 बचपन की जन्माष्टमी भी क्या खूब होती थी।सुबह जल्दी उठकर दोस्तों और बड़े भाईयों के संग नदी नहाने जाना।उपवास रखना और रात को भजिया बड़ा और तेंदू सीथा की खीर का फलाहार करना। अभी के समय में भांति-भांति के फल और मिठाई रेडीमेड बाजार में उपलब्ध है।पैसा फेंको और तमाशा देखो।मतलब खरीद लो। हमारे बचपन के दिनों में गांव में अक्सर अभावग्रस्तता होती थी।उस समय बचपन से ही ये संस्कार बच्चों को सीखा दिए जाते थे कि नाहक खर्च ही नहीं करना है। हमारे गांव में  श्री राधा कृष्ण का बहुत पुराना मंदिर है। बताते हैं कि मंदिर की नींव भारत के स्वतंत्रता वर्ष यानी 1947 में ही रखी गई थी जो लगभग दो तीन वर्षों में पूरी हुई। मंदिर निर्माण कर्ता के वंशज बताते हैं कि उनके पिता जी रेल से नवापारा के एक सेठ के साथ मूर्ति खरीदने जयपुर गए थे। राधाकृष्ण की मूर्ति खरीदने का एक दिलचस्प वाकया उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण की काली और श्यामल दोनों मूर्तियां थीं। जिसमें काली मूर्ति की कीमत कम थी और श्यामल संगमरमर की मूर्ति की कीमत ज्यादा।तो भी उन्होंने श्यामल संगमरमर की मूर्ति को खरीदा। जयपुर पहुंच कर उन्होंने कृष्ण मूर्ति को ...

रथदूतिया, दूजडोल और रथयात्रा

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  महाप्रभु आज अपने भक्तों का हाल जानने स्वयं रथ पर विराजमान होकर अपने बड़े भाई और बहन के साथ निकले हैं। जगन्नाथ स्वामी की ये रथयात्रा मंगलकारी होने के साथ साथ अद्भुत भी है। स्नान पूर्णिमा के बाद महाप्रभु अस्वस्थ हो जाते हैं। फिर 15 दिन के विराम और स्वास्थ्य लाभ लेने के पश्चात जगत के नाथ जगन्नाथ पुनः अपने भक्तों का कुशलक्षेम जानने निकल पड़ते हैं। रथयात्रा की परंपरा ओडिशा में है। लेकिन संपूर्ण भारतवर्ष में प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है।हमारा छत्तीसगढ़ तो ओड़िशा से लगा हुआ ही है तो रथयात्रा की ये परंपरा छत्तीसगढ़ में भी उतनी ही भक्ति भाव और श्रद्धा से निभाई जाती है। आज हमारे छुरा नगर में भी भव्य रथयात्रा निकाली गई है। ओडिशा की भजन मंडली और झांकी ने आयोजन को भव्य बना दिया है। प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा देखकर मुझे एक बुजुर्ग कलाकार नेहरू पेंटर की स्मृति अनायास ही हो आई है।वे भी प्रभु जगन्नाथ के भक्त थे।वे नि: संतान थे।तब छुरा में फोटो फ्रेमिंग करने वाले और गणेश प्रतिमा बनाने वाले वे इकलौते कलाकार थे। छोटी-छोटी गणेश जी की प्रतिमा बनाते थे।1995-96 में जब मैं छठी कक्षा में था मेर...

गोरस, गोरसी और गोरोचन

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  गौमाता के सीरीज में ये मेरा तीसरा ब्लॉग है। पिछले ब्लॉग को मात्र 10-15 लोगों ने ही पढ़ा। मुझे इस पर ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि जब लोगों को गौमाता और गौपालन में ही रुचि नहीं है तो गौ पर लिखे ब्लॉग को पढ़ने में क्या ही रुचि लेंगे। ये ब्लॉग मैं सिर्फ आप लोगों के ज्ञानवर्धन के लिए लिख रहा हूं ताकि आपको पता चले कि गौमाता से संबद्ध चीजें आपकी जिंदगी से कैसे जुड़ी है। क्या आपको पता है कि ग्रामीण अंचलों में दूध को आज भी गोरस कहा जाता है। इसमें ये भेद नहीं रखा जाता कि दूध किस पशु का है? अपितु मां के छाती से निकले दूध को भी गोरस ही कहा जाता है। गोरस से ही जुड़ा एक मिट्टी के पात्र का नाम है गोरसी।जो छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में ठंड के दिनों में सिगड़ी की तरह हाथों को सेंकने के लिए और छोटे बच्चों को मालिश करने के बाद सेंकने के लिए उपयोग किया जाता है।ये गोरसी का अन्य उपयोग है। मूलतः गोरसी गोरस यानि दूध को गोबर के कंडे पर धीमी-धीमी आंच में पकाने का पात्र है। मतलब ऐसा पात्र जिसमें गोरस पकता है। आप लोगों में से बहुतायत लोगों को पता होगा कि किसी विशिष्ट प्रकार के मृग के नाभि में एक बहु...

भटकने के लिए विवश गौवंश

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  हम लोग भले ही भौतिक तरक्की कर रहे हैं लेकिन मानवता को शर्मसार भी कर रहे हैं।दानव और मानव के बीच स्वभाव का जो अंतर ईश्वर ने बनाया था उस अंतर को आज मानव भोग की लालसा में मिटा रहा है। आराम और दिखावे की चकाचौंध ने इंसान को अंधा बना दिया है।कुदरत की दी हर नैमत में से अपने हिस्से के अलावा वो बाकी जीव जंतुओं का हिस्सा हड़पने पर आमादा है। फिलहाल मैं गौवंश की दुर्गति देखकर आहत हूं और लिखने के लिए विवश हूं। कितने लोगों तक मेरी बात पहुंचेगी।लोग सहमत होंगे।असहमत होंगे इससे मुझे कोई मतलब नहीं है। एक समय में गौवंश ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधार थी।कृषि आधारित जीवन में बिना गौवंश के ग्रामीण अस्तित्व की कल्पना करना मुश्किल था। आप सब ने गाय का निबंध कक्षा तीसरी में पढ़ा होगा।गाय एक चौपाया जानवर है।काली गाय को श्यामा गाय कहते हैं।आदि... आदि.... भारत की कृषि व्यवस्था में मशीनों का आगमन हुआ और लोगों में दिखावे का चलन बढ़ा तब से गौवंश के लिए समस्या की शुरुआत हुई।खेत जोतने से लेकर बाजार में अनाज के विक्रय तक गौवंश का उपयोग होता था। छोटे बच्चों के पोषण से लेकर व्यंजनों में दूध दही घी का खूब इस्तेमाल होता...

ददा तोला टीके धेनु गाय...

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  अभी ग्रामीण क्षेत्रों में शादियों का सीजन चल रहा है। लाउडस्पीकर पर शादियों के गीत बज रहे हैं। छत्तीसगढ़ में उत्सवों और पर्व विशेष के लिए गीतों की कमी नहीं है। शादियों में पारंपरिक रूप से गाए जाने वाले गीतों की भरमार है।हर नेंग के लिए अलग-अलग गीत है। कुछ दिनों पूर्व एक शादी कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला। वहां भी लाउडस्पीकर पर छत्तीसगढ़ी विवाह गीत बज रहे थे और लोग अपने अपने काम में व्यस्त थे। लेकिन मेरा ध्यान उस गीत पर चला गया। जिसके बोल थे... कोन तोला टीके नोनी अचहर पचहर.. कोन तोला टीके धेनु गाय। गीत जितना मधुर है उतना ही मर्मस्पर्शी भी।इस गीत में पुत्री को पाणिग्रहण के उपरांत माता-पिता के द्वारा दाइज(उपहार)देने की परंपरा का उल्लेख है। जिसमें पहले प्रश्न के स्वरूप में गीत का आरंभ होता है तदंतर उसका उत्तर भी दिया जाता है। छत्तीसगढ़ी में इसे टिकावन गीत कहा जाता है।पूरा गीत कुछ इस प्रकार है- कोन तोला टीके नोनी अचहर पचहर अचहर पचहर कोन तोला टीके धेनु गाय.. दाई तोला टीके नोनी अचहर पचहर  अचहर पचहर  ददा तोला टीके धेनु गाय  गाय अऊ भंइस ले नोनी कोठा तोर भरगे दुलरु के ...

तुलसी नर का क्या बडा... समय बड़ा बलवान

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 समय कभी किसी को क्षमा नहीं करता।वह अवसर देता है लेकिन कर्म की परिणति भविष्य में क्या होगा वह कर्ता के विवेक आधारित कर्म पर छोड़ देता है।द्वापर युग का एक प्रसंग है। महाभारत के भीषण रक्तपात के बाद जब कुरुक्षेत्र की भूमि शांत हुई, तो एक नए विनाश की पटकथा लिखी जा रही थी। गांधारी का कृष्ण को दिए शाप और ऋषियों का कोप यदुवंश पर वज्र बनकर गिरा। देखते ही देखते, प्रभास क्षेत्र की धरती अपनों के ही रक्त से लाल हो गई। द्वारका का वैभव, जो कभी देवताओं के लिए भी ईर्ष्या का विषय था, अब डूबने की कगार पर था। भगवान श्रीकृष्ण ने जान लिया था कि धरा पर उनका अवतार कार्य पूर्ण हो चुका है। देह त्यागने से पूर्व उन्होंने संदेश भेजकर अपने प्रिय सखा अर्जुन को द्वारका बुलाया। जब अर्जुन वहां पहुँचे, तो द्वारका की गलियों में उत्सव की जगह मातम का सन्नाटा था। श्रीकृष्ण जा चुके थे, बलराम ने समाधि ले ली थी और द्वारका के वृद्ध पिता वसुदेव ने भी प्राण त्याग दिए थे। अपने भौतिक शरीर को नश्वर जानकर लीलाधर ने अर्जुन को बुलाया। श्रीकृष्ण का अंतिम निर्देश स्पष्ट था: "अर्जुन, द्वारका अब समुद्र में समा जाएगी। यहाँ की स्त्रियो...

पनवाड़ी की दुकान

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  आज सभ्य असभ्य शिक्षित अशिक्षित सबके हाथों में मोबाइल है। लाखों वेब न्यूज पोर्टल है जिससे सब समाचार त्वरित रूप से मिल जाता है। लेकिन साल 2000 से पहले तक मामला अलग था।टीवी समाचार, आकाशवाणी समाचार और अखबार के बाद समाचार प्राप्ति का चौथा स्थान था पान की दुकान।पान की दुकान को गांव कस्बे में प्रायः पान ठेला कहा जाता था।ठेले का मालिक गांव कस्बे की मशहूर शख्सियत हुआ करती थी।पान के दुकान इनके व्यक्तिगत नाम या जाति के नाम से चला करती थी।भले ही दुकान में उनके बच्चे ही क्यों ना बैठे हों। बाबूलाल पान ठेला, गोपाल पान ठेला,साहू पान ठेला... अमुक अमुक आदि इत्यादि।पान ठेले पर कुछ हो ना हो पर एक जलती हुई छोटी लैंप और आईना जरुर होता था।जलती हुई छोटी लैंप पर सिगरेट के डिब्बे की कतरन जलाकर धुम्रपान प्रेमी अपना बीड़ी या सिगरेट जलाते थे और आईना देखकर अपने बाल संवारते थे।ठेलेवाले छोटी लैंप दिनभर जलाते थे जो कि उनका माचिस का खर्च बचाते थे।ग्राहक दिनभर माचिस मांगते तो ठेलेवालों का दिवाला निकल जाता।सवा रु लीटर की भाव में मिलने वाली घासलेट 15 पैसे में मिलने वाले माचिस डिब्बी की बनिस्बत ज्यादा किफायती था। ज्य...

पीड़ा की तैयारी कर लो सुख का आमंत्रण आया है

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 ब्लॉग लिखना तकरीबन बंद ही कर चुका हूं। क्योंकि लिखने के लिए अब उत्साह नहीं रहा।अब मन जब व्याकुल होता है तभी यहां हाजिर होता हूं ‌ बीते हफ्ते में घटी दो घटनाओं ने मन को व्यथित कर रखा है।रोड एक्सीडेंट में 2 प्रियजनों की अकस्मात निधन ने जीवन में कभी भी कुछ भी अनापेक्षित घट सकता है।इस कठोर सत्य को उजागर कर दिया।दोनों के छोटे-छोटे बच्चों का करुण क्रंदन देख असहनीय पीड़ा हुई। जिंदगी एक ही पल में किस कदर बिखर जाती है ये पुनश्च देखने को मिला। पूर्व के ऐसे ही कटु अनुभवों ने जीवन को देखने के मेरे नजरिए को बदल कर रख दिया है। ईश्वर का विधान समझ से बाहर लगने लगा है। मैंने महसूस किया है कि जैसे ही किसी के जीवन में खुशियां आती है। कुछ समय के बाद कोई ना कोई दुर्घटना जरुर घट जाती है। फिर सारे परिवार को उससे उबरने में सालों लग जाते हैं। कुछ कमियां कभी भी नहीं भर सकती। कहते हैं कि मनुष्य कर्म बंधन से आबद्ध है। उसके जन्म की हर एक घटना का उसके पूर्व कर्मों से संबंध होता है। लेकिन कभी कभी कुछ समझ में नहीं आता।जिस बच्चे ने अनाथ के रूप में अपना जीवन संघर्षों से गुजर कर निकाला क्या उसके बच्चे को भी फि...

राजस्थान यात्रा-1

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  जीवन भी एक यात्रा है।हर जीव जिसने जन्म लिया है वो इस मार्ग के पथिक है। जीवन की यात्रा किस्मत और कर्म के वाहन पर सुख और दुख के पडा़वों को पार कर अंततः मृत्यु के गंतव्य पर पहुंचकर विराम पाती है। मनुष्य का जीवन तो वैसे भी बहुत कठिन होता है।ऐसा अब तक के अपने नीज अनुभव के आधार पर कह सकता हूं। साल 2022 मेरे जीवन के कठिनतम वर्षों में एक साल था। दुर्भाग्यपूर्ण। राजस्थान वैभव और वीरता की भूमि है। वहां जाने की बहुत इच्छा थी। लेकिन जिन परिस्थितियों में राजस्थान की यात्रा करनी पड़ी उसकी कड़वाहटें आज भी महसूस करता हूं। एक मेडिकल इमरजेंसी में मुझे और मेरे एक अनुज को राजस्थान की यात्रा करनी पड़ी।वो मेरे गुरु पुत्र थे। दोनों एक ही दर्द से गुजर रहे थे। दोनों की मंजिल एक थी। फिर क्या था... ईश्वर को स्मरण करके ठान लिया लक्ष्य तक पहुंचने का। लक्ष्य तक पहुंचना आसान नहीं था। राजस्थान छत्तीसगढ़ से लगभग 1200 किमी दूर था। सड़क मार्ग से होकर जाना दुष्कर हो सकता था। प्लानिंग थी कि रेल से जाएं। लेकिन जो वक्त हमने चुना था वो शीतकालीन छुट्टियां मनाने का समय था।दूर दूर तक टिकट मिलने की कोई संभावना नहीं थी। फिर...

दिन चारी मइहरवा में....सुरता स्व.मिथलेश सर के

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  लोकगीतों की अपनी एक अलग मिठास होती है।बिना संगीत के भी लोकगीत मन मोह लेता है,और परंपरागत वाद्य यंत्रों की संगत हो जाए, फिर क्या कहने!! आज छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोकगायक स्व. मिथलेश साहू जी की पुण्यतिथि है।5 वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 2019 को वे छत्तीसगढ़ी लोककला जगत में कभी ना भरने वाली रिक्तता छोड़कर परलोक गमन कर गए।उनके गायन में माधुर्य का आकर्षण था।लोकगीतों के विविध छटाओं को उन्होंने अपने स्वर से सजाया है। प्रेमगीत,हास्यगीत, पारंपरिक उत्सव गीत,विवाह गीत आदि में उनके गायन का अंदाज बेहतरीन था।साल 1977 में उन्होंने सोनहा बिहान लोककला मंच से अपनी कला यात्रा की शुरुआत करी थी। उनके पिता स्व श्री जीवनलाल साहू भी एक लोक कलाकार थे। इसलिए कला के प्रति उनका झुकाव नैसर्गिक था।नाचा के विख्यात कलाकार मदन निषाद की कलाकारी ने उनको लोककला के सम्मोहन में बांधा था।इस सम्मोहन से बंधकर वे कला पथिक बन गए। वर्ष 1978 से वे आकाशवाणी रायपुर से पंजीकृत लोकगायक के रूप में प्रसारित हुए।फिर कभी रुके नहीं। श्रोताओं का प्यार उन्हें सदैव मिला। पिछले कुछ सालों में मैं निरंतर दुखद प्रसंगों का साक्षी रहा हूं। इसलिए ऊप...

उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई....

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  पिछले दिनों एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया तो उनके दशगात्र कार्यक्रम में शामिल हुआ। छत्तीसगढ़ में दशगात्र के दिन मृतक की आत्मशांति के लिए विशिष्ट पूजा किया जाता है। निकटतम परिजनों और ग्रामीणों के द्वारा तालाब में जाकर 5 अंजुरी पानी अर्पित कर देह त्यागने वाली आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।इस अवसर पर कहीं कहीं भजन कीर्तन आदि का कार्यक्रम रखा जाता है। लोकजीवन में परंपरागत लोकभजन के माध्यम से शरीर की नश्वरता और प्रभु भक्ति की श्रेष्ठता का गायन किया जाता है। वहां पर भी ऐसा ही कुछ गीत लोकधुन में खंजरी,तमूरा और झांझ की मधुर आवाज़ के साथ कुछ बुजुर्ग गा रहे थे... उमरिया ला धोखा धोखा मा खोई डारे भाई...।बिना तामझाम के ताली की थाप और तीन वाद्ययंत्रों का संगम गीत को सरस बना रहा था।भजन के बाद एक बुजुर्ग दृष्टांत और कथा का वाचन करता था। तत्पश्चात पुनः वही भजन चल पड़ता था। मैं भी कुछ समय के लिए उनके पास बैठ गया।जो बुजुर्ग टीका कहकर दृष्टांत वाचन कर रहे थे वो भक्ति की श्रेष्ठता और संत सेवा की महानता के बारे में बता रहे थे। उसने कथा प्रसंग में शबरी की गुरुवचनों के प्रति आस्था के बा...

कोणार्क.. अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य

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      पुरी में रात्रि विश्राम पश्चात लगभग सुबह साढ़े बजे हमने होटल छोड़ दिया और चल पड़े भगवान साक्षी गोपाल के दर्शन के लिए। वहां पर पंडे पहुंचने के बाद तुरंत बही खाता में नाम दर्ज करवाने के लिए बोलने लगे। उसके लिए कुछ दानराशि देनी पड़ती है। मैंने और घनश्याम ने नहीं लिखवाया। भगवान हमको यहां तक लाए हैं वो खुद साक्षी हैं करके। वहां की मूर्ति बहुत सुंदर हैं। कहते हैं बांके बिहारी जी खुद चलकर जगन्नाथ धाम में पहुंचे हैं।कथा लंबी है इसलिए नहीं लिख रहा हूं।साक्षी गोपाल जी के दर्शन पश्चात हम लोग कोणार्क सूर्य मंदिर देखने चले गए। अद्भुत अद्वितीय स्थापत्य है। कोणार्क का मेरा ये पहला दर्शन था। उससे पहले 20 रु के नोट में ही कोणार्क मंदिर के चक्के का दर्शन किया था। शिकार, कामक्रीड़ा और जीवन के विविध प्रसंगों को बहुत ही सुन्दर ढंग से कलाकारों ने पत्थर पर उकेरा है। बताते हैं कि 12 साल तक 1200 श्रमिकों ने दिन रात एक करके इस मंदिर को तैयार किया था।अकबर के इतिहासकार अबुल फजल के मुताबिक इन 12 वर्षों में उत्कल राज्य के संपूर्ण राजस्व को इसके निर्माण में लगा दिया गया था। दोपहर 2 बजे के लगभग को...

हरि बोलो....जय जगन्नाथ!!!

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 एक लंबी और नानस्टाप यात्रा से थकान स्वाभाविक थी।रात भर का रात्रि जागरण भी हुआ था तो धाम में पहुंचने के बाद जल्दी से कोई ठहरने की जगह खोजने कार्यक्रम था। तीर्थ क्षेत्र में धर्मशाला,यात्री लाॅज और होटलों की कमी नहीं होती।इन विकल्पों का विचार करने के बजाय पूर्व अनुभवियों के मतानुसार होटल में ठहरना तय हुआ और वो भी समुद्र के किनारे। हालांकि समुद्री बीच के किनारे के होटल थोड़े महंगे होते हैं  बताए लेकिन समुद्र में स्नान पश्चात सादे पानी से स्नान करने की सुविधा को देखते हुए वहीं ठहरना ज्यादा उचित लगा।अब हमारी गाड़ी गोल्डन बीच की ओर दौड़ पड़ी। गोल्डन बीच का नजारा अद्भुत था चारों तरफ दुकान समुद्री उत्पाद बेचने वालों की भीड़ और लोगों का जमावड़ा। मैं पहली बार सागर के दर्शन कर रहा था। इसलिए उतरते ही थोड़ी देर खड़ा होकर दृश्य को निहारने लगा।चार सदस्य होटल ढूंढने निकल पड़े और घनश्याम भाई गाड़ी को किनारे कर वहीं खड़े रहे। बमुश्किल 2 मिनट नजारों का दर्शन करके लौटा तब तक एक कर्तव्यनिष्ठ ट्रैफिक आफिसर हमारी गाड़ी की फोटो खींच रहा था।पता चला वहां बीच के किनारे गाड़ी खड़ी करने की अनुमति नहीं है।...

रात का सफर

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 जैसा कि मैंने पिछले पोस्ट में बताया था कि छत्तीसगढ़ से निकलते निकलते ही शाम ढलने लगा था। लगभग सवा 7 बजे के आसपास हम लोग खरियार रोड पहुंचे।खरियार रोड छत्तीसगढ़ और ओड़िशा दोनों के लिए महत्वपूर्ण कस्बा है। यहां दोनों जगहों से लोग खरीददारी करने आते हैं।कभी खरियाररोड अविभाजित दक्षिण कौसल का हिस्सा रहा है।जब सिरपुर दक्षिण कौसल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की राजधानी थी तब खरियार, नुआपड़ा  और कालाहांडी का क्षेत्र छत्तीसगढ़ में  समाहित था। वर्तमान में अब ये सारे ओडिशा राज्य के अंतर्गत आते है। यहां हमारी छत्तीसगढ़ी बोली और समझी जाती है। हालांकि उनकी स्थानीय मातृभाषा ओडिया का भी यहां चलन है। शासकीय प्रक्रिया भले ही दो प्रांतों में सीमा निर्धारण कर देती है, लेकिन सांस्कृतिक मेल मिलाप उनको जोड़े रहती है। यहां की दशहरा विख्यात है। छत्तीसगढ़ के बड़े बड़े लोककला मंचों का उस दिन यहां प्रदर्शन होता है। रामलीला होती है।रावण दहन में खूब आतिशबाजी होती है। जैसा कि आपको ज्ञात है यात्रा के शुरुआत में निकलते ही हमारी गाड़ी पंचर हो गई थी इसलिए उसकी मरम्मत कराना जरुरी था।खरियार रोड पहुंचते ही सर्वप्रथ...

पुरी धाम की ओर

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 जय जगन्नाथ!!! कल विश्व पर्यटन दिवस था।ये पोस्ट मैं कल ही डालने वाला था लेकिन कुछ कारण से नहीं हो पाया। पर्यटन का मतलब होता है घूमना।नये नये जगहों की सैर।ये स्थान धार्मिक स्थल भी हो सकते हैं या प्राकृतिक या कृत्रिम भी। कुछ लोग कुदरत की बनाई चीजें देखकर आनंदित होते हैं तो कुछ लोग मानव निर्मित कलाकृति देखकर खुश हो जाते हैं।वैसे मैं स्वभाव से ज्यादा घुमक्कड़ नहीं हूं। ज्यादातर घर में रहकर ही समय गुजारता हूं। मेरे जैसे प्राणियों के लिए छत्तीसगढ़ी में एक शब्द है घरखुसरा।बस वही समझिए। मेरी हार्दिक इच्छा थी कि भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन से ही घुमक्कड़ी की शुरुआत करुं।लेकिन ये संभव नहीं हो पाया। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की ये संभव नहीं हो पाया।साल 2022-2023 मेरे जीवन में कड़वी यादों का साक्षी बना।मन व्यथित और दुखी था। कड़वी यादों से इतर मन बहलाने के लिए और मानसिक शांति की चाह में मैं भगवान जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए आतुर था।यात्रा के लिए परिचितों से चर्चा किया तो संयोग से मुझे 5 साथियों का सहयोग भी पुरी यात्रा के लिए मिल गया।सड़क मार्ग से नीजी वाहन पर जाने का प्लान बना। जितने लोग जा...

परछी

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  ग्रामीण भारत की बात ही अनूठी होती है। सर्वजनहिताय सर्वजन सुखाय की भावना से भरपूर ग्राम्यांचलों के उच्च आदर्शों को देखकर भारत की ग्राम्य संस्कृति पर गर्व होता है। वैसे भी भारत को गांवों का देश कहा जाता है। छत्तीसगढ़ तो ग्राम्य संस्कृति के उच्च आदर्शों से सराबोर प्रदेश है। कुछ वर्ष पहले तक जब सरकारी योजनाओं से पक्के मकान नहीं बन रहे थे और लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तब ज्यादातर मकान कवेलू(खपरा) वाले होते थे। मिट्टी और लकड़ी से बने इन मकानों में रहने का आनंद पूछिए ही मत।हर दीवाली और तीज त्योहारों पर उसमें मिट्टी का लेपन और उसके बाद सफेद मिट्टी(छुही) से लिपाई पुताई होने के बाद मिट्टी की खुशबू से सराबोर घर की रौनक ही अलग होती थी। दीवारें बातें करती थीं।भले ही अब केमिकल युक्त रंग कंपनियां दीवारें बोल उठेंगी बताकर अपने उत्पाद का प्रचार कर रही है लेकिन उसमें तब वाली बात नहीं है।  घर भले ही मिट्टी की होती थी पर भोले भाले ग्रामीणों के नेक विचार  आसमान की बुलंदियों को छूता था।ऐसे मिट्टी के घरों में सिर्फ परिवार की जरुरतों को ध्यान नहीं रखा जाता था अपितु जानवरों के लिए,घर ...

तीजा के लुगरा

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  भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि हरतालिका तीज के रुप में विख्यात है। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह लोक पर्व तीजा के रुप में जाना जाता है।ये पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है।यह पर्व विवाहित महिलाओं को मायके से जोड़कर रखने वाला पर्व है। जन्माष्टमी के बाद हर बहन अपने भाई का इंतजार करती है।तीजा लेने के लिए जब कोई भाई बहन के ससुराल पहुंचता है तब बहन के साथ उनके बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है।यह इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें सभी गांव और परिवार की बेटी बहनों का एक साथ आगमन होता है। बरसों बाद विवाहित  महिलाओं की अपने हमउम्र सहेलियों से मुलाकात जब होती है तो बचपन की अनेक स्मृतियां ताज़ी हो जाती है जो उनके गृहस्थ जीवन में चल रही उठा पठक के बीच एक नये उत्साह का संचार करती है।तीजा का ये पक्ष सबसे महत्वपूर्ण है। शादी के बाद बहन और बेटियां मायके सिर्फ विशेष अवसरों पर ही आ पाती है। इसलिए अपने बचपन की सहेलियों के साथ वक्त बिताने का अवसर उनको नहीं मिल पाता।तीजा ये अवसर लब्ध कराती है। भाई बहन के बीच के संबंध को भी यह पर्व मजबूती प्रदान करता है।भाई अपनी क्षमता अनुसा  बहनों को खुश ...

कहीं दूर जब दिन ढल जाए....

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  फिल्म आनंद का ये खूबसूरत गीत आप सब ने जरुर सुना होगा। मुझे बेहद पसंद है और हो सकता है आप में से बहुतों को पसंद हो।दिन का निकलना और ढल जाना सृष्टि का नियमित चक्र है। इसमें कभी कोई ढिलाई नहीं होती। हम सबके जीवन में भी रोज उम्मीदों का सवेरा आता है और कामयाबी या नाकामयाबी का तोहफा देके चला जाता है।अक्सर ऐसा होता है कि हम जो योजना भविष्य के लिए बनाते हैं वो ज्यादातर बार पूरा नहीं हो पाता। अनगिनत बार हम असफल हो जाते हैं।ऐसा लगने लगता है कि अब कुछ अच्छा होगा ही नहीं। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमें सतत् प्रयास करना चाहिए।शेष ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए। सिर्फ ध्यान इतना रखना चाहिए कि हमारे काम से किसी का अहित ना होता हो।हताशा के क्षण हर एक व्यक्ति के जीवन में आता है। कभी कभी तो कुछ रास्ता सूझता भी नहीं है।केवल शून्य नजर आता है।ऐसे मुश्किल समय में हमारे परिजन और मित्र ही काम आते हैं। इसलिए रिश्तों की डोर को थाम के रखना चाहिए। सफलता की चकाचौंध भी बहुत घातक होती है।हमको कभी-कभी ऐसा भ्रम भी हो जाता है कि मैं जो भी करुंगा उसमें कामयाबी ही हाथ लगेगी। लेकिन कामयाबी का लगातार स्वाद चखने वाल...

ठठेरा के ठ...

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  फोटो गूगल से साभार  जो लोग अभी मेरे पोस्ट को पढ़ पा रहे हैं उन सभी ने हिंदी वर्णमाला जरुर पढ़ी होगी,और जब वर्णमाला पढ़े होंगे तो ठठेरा के ठ से जरूर परिचित होंगे। लेकिन क्या अब हम अपने बच्चों को दिखा पायेंगे कि ठठेरा क्या होता है? बहुत से कारीगर और कलाकार इस ज़माने की बेतहाशा तरक्की के कारण बेकार हो गये। मशीनीकरण ने पारंपरिक तरीके से काम करने वाले कारीगरों को बेरोजगार कर दिया। इन्हीं में से एक थे ये ठठेरे।ठठेरा कारीगर पुराने हो चुके बर्तनों की कलई करके और मरम्मत करके फिर से नया बना देते थे।आज यूज एंड थ्रो की पालिसी का दौर है।किसी के पास मरम्मत करने और कराने की फुर्सत नहीं है।वैसे अब कलई करना क्या होता है ये प्रश्न आ सकता है? तो मेरी मंद मति के अनुसार बताना चाहूंगा कि कलई करने का मतलब होता है ऐसे बर्तन जिनमें जोड़ होता है उसके जोड़ वाले भाग को एक प्रकार के काले लसदार रसायन से लेपित करके जोड़ा जाता है ताकि उसमें किसी प्रकार का रिसाव ना हो। वैसे कलई खुलना एक मुहावरा भी है जिसका आशय रहस्योद्घाटन होता है। हमारे बचपन के दिनों में आंध्रप्रदेश या तमिलनाडु से एक व्यक्ति आता था।लोग उसे...